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Sunday, 29 April 2012

विवेक के द्वारा ही अध्यात्म बढ़ता है

यदि हम सोचें की आज से दस साल पहले क्या हमारे साथ समस्या अथवा चिंता नहीं थी ? ज़रूर थी लेकिन क्या वो आज है ? निश्चित ही नहीं है । परन्तु क्या आज समस्या अथवा चिंता दूसरे रूप में नहीं है ? निश्चित ही है ।
क्या आज से दस साल बाद ये समस्या ये चिंता हमारे पास नहीं रहेगी? निश्चित ही नहीं रहेगी ।
लेकिन हम अपनी मानसिक ऊर्जा को इसी में लगाए रखते हैं और जीवन तत्त्व  को अथार्त तत्वज्ञान को प्राप्त ही नहीं कर पाते ।फिर तत्वज्ञ बने रहना अथवा दूसरों को तत्व ज्ञान की तरफ उन्मुख करना तो अलग ही बात है ।

हम इस बात को जानके भी अनजान बने रहते हैं और बस निरंतर इसी तरह से एक बाद एक नयी चिंताओं में उलझे रहते हैं या स्वयं को उलझाए रखते हैं । हम ये जान ही नहीं पाते की हमारा जीवन हमे क्यूँ मिला है ?
हम ये मान ही नहीं पाते की जीवन में नित्य कुछ भी नहीं खासकर हमारे उद्देश्य से सम्बंधित (धन,मान,संपत्ति) । ये सबकुछ हमारे साथ नहीं रह पायेगा या हम इन सारी चीज़ों के साथ नहीं रह पायेंगे यहाँ तक हम इस प्रश्न का अर्थ ही नहीं समझ पाते । व्यक्ति स्वयं को और संसार को एक जैसा ही समझता है और अपनी इसी ग़लत बुद्धिमानी के चलते निरंतर दुखित होता है । हम देखते हैं कई बड़े बुज़ुर्ग हमारे घर के ही या आस पास के हमारे सामने ही चले गए हमने क्या किया चार दिन रोये और फिर बाकी जो जीवन में संसार में हमारा बचा हुआ हमे लगा उसे दोनों हाथ से कस के पकड़ लिया की नहीं अब बाकी कुछ नहीं जाने देंगे लेकिन समय आया और फिर अनित्य(शरीर,संसार) हमारे सामने चला गया लेकिन फिर हम वोही करते हैं ।
आखिर हम अपना विवेक जगा क्यूँ नहीं पाते ?
यदि हमारा विवेक थोडा सा जाग्रत हो जाता है तो हम उस पर कायम क्यूँ नहीं रह पाते ?
यदि हमे भूले से कोई ज्ञान दे जाता है तो भी क्यूँ हम उस पर भी संदेह करने लगते हैं ?

 
बहुधा हम अपने आप को दिलासा देते हैं की ये सब बहुत मुश्किल है अथवा तो ये तो भगवान् की माया है ।
हम कोई साधू महात्मा नहीं है जो दिन भर भगवान् का नाम जपते रहें और इस तरह संसार को छोड़े रहें व माया से बचे रहें ।
नहीं ऐसी बात नहीं है, ऐसी बात कदापि नहीं है क्यूंकि ये सच नहीं है । व्यक्ति अपना सामान्य जीवन जीते हुए भी इश्वर प्राप्ति कर सकता है ।
तो फिर सच क्या है ? सच ये है की हममे अज्ञान इतनी अन्दर तक पैठा है जिसका हम अंदाजा तक नहीं लगा सकते ।
 यदि हम गंभीरता से सोचे तो हममे से अधिकतर ये पायेंगे की वाकई हम एक दिखावे की ज़िन्दगी से ज्यादा नहीं जी रहे जहाँ औरों के मुताबिक उन्हें अच्छा लगे इस मुताबिक हमे जीना पड़ता है ।
यदि गंभीरता से हम सोचें तो पायेंगे की राग-द्वेष में बंधकर कितना ज्यादा हमने अपने आपको अथार्त अपनी ज़िन्दगी को दूसरों के हाथ में सौंप रखा है अथार्त हम अपना जीवन अपने हिसाब से अथवा अपने जीवन के हिसाब से नहीं जीते बल्कि लोगों के साथ राग(प्रेम,दोस्ती,रिश्तेदारी) में अथवा द्वेष(शत्रुता,प्रतिद्वंदिता,साजिश,नफरत,भेदभाव) के हिसाब से जीते हैं ।
यदि हम सच्चाई से अपने आप से पूछे और ये हमारे लिए ही अत्यंत आवश्यक है क्यूंकि अज्ञान इसी तरह से जाता है और एक बार अज्ञान शुन्यता पर पहुँचता है की ज्ञान स्वयं व्याप्त होने लगता है तो अपने आप से पूछे की क्या हम अपनी आत्मा को भी अनसुना नहीं करते?
क्या हम अपने शास्त्रों,वेदों में पूरी निष्ठा रखते हैं ?
क्या ये सच नहीं है की हम भगवान् में ही पूरी निष्ठां नहीं रखते तभी तो धार्मिक ग्रन्थ नहीं पढ़ते,तभी तो धार्मिक चिंतन नहीं नहीं करते ।
क्या हमे ये मालूम है की जिस तरह कपड़ा गन्दा हो जाने के बाद साफ़ करने पर ही साफ़ होता है उसी तरह हमारी आत्मा भी सत्संग से ही और निखरती है और जितना ज्यादा हम इससे ज्यादा अपने मन,बुद्धि को अहमियत देंगे अथार्त संसार को अहमियत देंगे उतना ही हमारी आत्मा प्रकाशमय होने से रुकेगी व परिणामतः हम उतना ही अज्ञान में चलते चले जायेंगे ।
 क्या जितना ज्यादा हम स्वयं को नास्तिक करने में लगाते हैं अथार्त भगवत वचन में,भगवत आस्तित्व में भगवत कृपा में भगवत भजन में संदेह करने में लगाते हैं उतना ही आस्तिक होने में और इन सबमे रस लेने लगाते हैं ?
यदि नहीं लगा पाते तो क्या हम जानते हैं की ऐसा हमारी आत्मा के कम बलवान होने के कारण ही होता है ?
क्या हमे मालूम है हम जितना ज्यादा अपने आत्म स्वरुप को महत्व देंगे उतना ही आत्मा हमारी शक्तिशाली होती है ?
जितना हम अपने मन के वश में होते हैं हमारी आत्म-शक्ति छीन सी होती है और जितना हमारा मन हमारे नियंत्रण में होता है हमारी आत्म शक्ति उतना जाग्रत रहती है ।


अतः हमे सबसे पहले ये जानना और मानना आवश्यक है की भगवान् की अनुभूति के लिए हमारे सांसारिक और आध्यात्मिक सिद्धांत एक होने चाहिए और उसके लिए सबसे ज्यादा ज़रूरी मैं समझता हूँ जो है वो है संसार में हमारी आसक्ति का कम होना अथार्त हमे संसार का ज्ञान होना ।
दूसरा ज्ञान का महत्व  ।
तीसरा हमारे अन्दर श्रद्धा होनी चाहिए ।
और चौथी और महत्त्वपूर्ण बात की व्यक्ति का मन उसके नियंत्रण में होना चाहिए न की व्यक्ति अपने मन के और उसमे उत्पन्न होने वाली विभिन्न प्रकार की इच्छाओं के बस में हो ।

हम स्वयं परमात्मा परमेश्वर के शब्दों को भी देखें तो भगवद्गीता में उन्होंने विभिन्न स्थानों पर यही कहा है :



१. संसार में हमारी आसक्ति का कम होना अथार्त हमे संसार का ज्ञान होना


ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ 
भावार्थ :  जो ये इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं, यद्यपि विषयी पुरुषों को सुखरूप भासते हैं, तो भी दुःख के ही हेतु हैं और आदि-अन्तवाले अर्थात अनित्य हैं। इसलिए हे अर्जुन! बुद्धिमान विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता ॥ ५/२२ ॥ 
२.  ज्ञान का महत्व 
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥
भावार्थ :  क्योंकि हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देता है॥ ४/३७ ॥ 
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥
भावार्थ :  इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मा में पा लेता है॥ ४/३८ ॥ 
३. श्रद्धा
  

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्धवा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ 
भावार्थ :  जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के- तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है॥४/३९ ॥
अज्ञश्चश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ 
भावार्थ :  विवेकहीन और श्रद्धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है॥४/४० ॥ 
४. मन पर नियंत्रण  


कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌ ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥
भावार्थ :  जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है॥३/६ ॥ 

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌ ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ 
भावार्थ :  श्री भगवान बोले- हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। परन्तु हे कुंतीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है॥६/३५॥



अथ चित्तं समाधातुं न शक्रोषि मयि स्थिरम्‌ ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥
भावार्थ :  यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापन करने के लिए समर्थ नहीं है, तो हे अर्जुन! अभ्यासरूप (भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन, मनन तथा श्वास द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविषयक शास्त्रों का पठन-पाठन इत्यादि चेष्टाएँ भगवत्प्राप्ति के लिए बारंबार करने का नाम 'अभ्यास' है) योग द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए इच्छा कर॥१२/९ ॥
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ 
भावार्थ :  यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के ही परायण (स्वार्थ को त्यागकर तथा परमेश्वर को ही परम आश्रय और परम गति समझकर, निष्काम प्रेमभाव से सती-शिरोमणि, पतिव्रता स्त्री की भाँति मन, वाणी और शरीर द्वारा परमेश्वर के ही लिए यज्ञ, दान और तपादि सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों के करने का नाम 'भगवदर्थ कर्म करने के परायण होना' है) हो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा॥१२/१०॥
 अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्‌ ॥
भावार्थ :  यदि मेरी प्राप्ति रूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है, तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग (गीता अध्याय 9 श्लोक 27 में विस्तार देखना चाहिए) कर॥१२/११ ॥
 

Sunday, 22 January 2012

अंतर्मुखी होना तत्वज्ञान के उन्मुख होना,विवेकप्रधान होना है

अंतर्मुखी होना और बहिर्मुखी होने की परिभाषा सबकी अलग अलग होती है । कुछ मित्रों का सन्देश आया की अंतर्मुखी प्रायः मौन होते हैं,अंतर्मुखी व्यक्ति समाज मे समाज की बढ़ोत्तरी(अच्छी) में उतना योगदान नहीं दे पाता,कुछ ये भी मानते हैं की अंतर्मुखी व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेता है,अन्याय सह लेता है,दब्बू किस्म का हो जाता है  इत्यादि ।
सबसे पहले मैं इन दोस्तों का शुक्रिया करूँगा अपने विचार रखने के लिए । आगे ये ही कहना चाहूँगा की हम हर चीज़ की परिभाषा अधिकतर अपने अनुसार करते हैं जो की ग़लत नहीं बशर्ते हम उसमे कोई शर्त न रखे अथार्त उसमे अपना कोई स्वार्थ या सहूलियत न रखे ।
किसी शब्द की परिभाषा सार्थक सिद्ध तभी होती है जब हम उसे संयत व निष्पक्ष भाव से समझें व उसमे अपनी चतुराई (अपनी सुविधा के लिए )आक्षेपित न करते हुए बुद्धिमानी से यथार्थः समझें ।
शब्द या उसका अर्थ हमसे ये कभी नहीं कहता की उस जैसा बनो वो तो बस अपना अर्थ ही बताता है उसका निरूपण कैसे करना है ये प्राणीविशेष पर निर्भर होता है ।
कई बार व्यक्ति समभाव से अपने द्रष्टिकोण से भी शब्द की परिभाषा अथवा उसकी व्याख्या करता है जिससे शब्द की परिभाषा और सरल व स्पष्ट हो जाती है जो की बहुत अच्छी बात है ।


जीव स्वभावत: दो प्रकार के होते हैं -अंतर्मुखी तथा बहिर्मुखी। अंतर्मुखी प्रतिभा के व्यक्ति बाहरी संसार से तथा भौतिक सुखों से विरक्त रहते हुए अपनी अंतरात्मा के सम्यक विकास के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। 

बहिर्मुखी प्रतिभा का व्यक्ति भौतिकता में आसक्त होकर विविध सांसारिक कार्यों में लिप्त रहता है। 
यथार्थ में ये दोनों मार्ग एक दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि कोई भी मनुष्य न पूर्णतया अंतर्मुखी हो सकता है और न पूर्णतया बहिर्मुखी। प्राय: सभी प्राणी कुछ अंशों में बहिर्मुखी होते हैं।


मेरे विचार से अंतर्मुखी होने का तात्पर्य अनासक्त होने से है अथार्त संसार अनित्य है आत्मा नित्य है ये तत्वज्ञान होने से है,अपने अन्दर झाकने से है,निर्विकार होने से है अथार्त हम अपने विकारों को समझें उनका निरीक्षण करें और साथ ही साथ अपने स्वरुप को अथार्त आत्मा को अविकारी व अविनाशी समझें और इस तरह से  स्वयं को स्वरूपतः शुद्ध अविनाशी,निर्विकार जानें शुद्ध भक्ति के लिए ये अत्यंत आवश्यक है की हम अपने को निष्काम(ईश्वर से कुछ भी मांगने की अभिलाषा न)  रखें,साथ ही काम,क्रोध,लोभ,दंभ,मोह आदि विकारों से अंतःकरण को शुद्ध रखें ।इस तरह से मननशीलता ही अंतर्मुखी होना है तभी व्यक्ति ये समझ सकता है या ये समझने की चेष्टा कर सकता है की वास्तव में विकार तो उसके मन द्वारा हो रहे हैं जिसका संकल्प बुद्धि द्वारा हो रहा वस्तुतः विचार ही व्यक्ति को बाँध रहे हैं जिससे जीव शुद्ध आत्मा में भी विकार देखने लगता है ।यदि व्यक्ति कुविचार की जगह सुविचार को प्रधानता दे तो इसी बुद्धि को सात्विक करके मन में सात्विक भावों को बढ़ाके अपना आत्मिक कल्याण कर सकता है जिसके लिए सबसे अधिक आवश्यक ये है की वो विकारों को अपना न माने व स्वयं के स्वरुप(आत्मा) को ही मन,बुद्धि,इन्द्रियों का प्रकाशक माने और अपने कल्याण के साधन हेतु (अविकारी भाव) इनका सदुपयोग करे ।



रामचरिमानस में आया है :

उत्तरकाण्ड 
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥1॥
सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥2॥
अथार्त जीव की आत्मा ईश्वर का अंश है जो की स्वरुप से ही चेतन,विकाररहित और आनंद मय
है परन्तु जीव अपने को ईश्वर से अलग मानके माया के वशीभूत होकर तोते और वानर की भाँति अपने आप ही बँध गया। इस प्रकार जड़ और चेतन में ग्रंथि (गाँठ) पड़ गई। यद्यपि वह ग्रंथि मिथ्या ही है, तथापि उसके छूटने में कठिनता है॥ 

 मेरा उद्देश्य इसी बात को अनगित करना था तत्वज्ञान के लिए व्यक्ति का अंतर्मुखी होना अथार्त अपनी इन्द्रियों को अपनी वृत्तियों को बाहर(संसार) की तरफ न ले जाके आत्मा की तरफ करना ही अंतर्मुखी होना होता है ।
अंतर्मुखी व्यक्ति कम बोले ज्यादा बोले इससे कोई प्रयोजन नहीं परन्तु तत्वज्ञान के बाद स्वतः ही व्यक्ति गंभीर हो जाता है हालाँकि चूँकि संसार में रहना है तो उसे कई मौकों पर विनोद,सुख दुःख  आदि से गुज़रना होता है और वो ऐसा करता भी है परन्तु अन्दर से संसार के प्रति उसकी आसक्ति नहीं होती ।
लौकिक भाषा में जो हम बहिर्मुखी को यानी खुले विचार वालों या स्पष्टतः बोलने वालों को ये समझें की इन्हें तत्वज्ञान के लिए कम बोलना चाहिए तो ये बात निरर्थक है व्यक्ति को अपनी प्रकृति बदले बिना अपनी प्रवृत्ति अनासक्ति के उन्मुख करनी चाहिए बस इतनी सी बात है । अथार्त बहिर्मुखी भी तत्वज्ञानी हो सकते हैं परन्तु उन्हें अंतर्मुखी (अनासक्त) रहने से ही तत्वज्ञान सही अर्थों में प्राप्त होगा ।
 
मूल उद्देश्य यही है की शब्द से ज्यादा हम उसके अर्थ पर ध्यान दें जो की यही है की व्यक्ति के अन्दर दो तरह की बुद्धि होती है विवेक प्रधान और अविवेकप्रधान । हम जितना ज्यादा विवेक प्रधान होने हमे जगत उतना ही विकार रहित नज़र आएगा उतना ही हम अहिंसा,प्रेम,सहिष्णुता,निस्वार्थता,मानवता का सन्देश देंगे,ऊर्ध्वमुखी होंगे  व हम जितना अविवेक को महत्व देंगे उतना ही काम,क्रोध के ग्रास बनेंगे व अच्छी से अच्छी बात में दोष देखेंगे,सुखदायी परिस्थति में भी दुःख देखेंगे व जाने अनजाने विकार को अपने में और समाज में बढाते जायेंगे और इस तरह आत्मिक पतन के पथ पर अग्रसर होते जायेंगे।

श्री भगवान् ने श्रीमद भगवदगीता में सोलहवें अध्याय में विस्तार से विवेक और अविवेकप्रधान वृत्ति पर कहा है :


द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ में श्रृणु॥ 

भावार्थ :  हे अर्जुन! इस लोक में भूतों की सृष्टि यानी मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है, एक तो दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला। उनमें से दैवी प्रकृति वाला तो विस्तारपूर्वक कहा गया, अब तू आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य समुदाय को भी विस्तारपूर्वक मुझसे सुन॥6॥ 

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥ 



भावार्थ :  आसुर स्वभाव वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति- इन दोनों को ही नहीं जानते। इसलिए उनमें न तो बाहर-भीतर की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्य भाषण ही है॥7॥

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्‌।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्‌॥

भावार्थ :  वे आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य कहा करते हैं कि जगत्‌ आश्रयरहित, सर्वथा असत्य और बिना ईश्वर के, अपने-आप केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न है, अतएव केवल काम ही इसका कारण है। इसके सिवा और क्या है?॥8॥
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥

भावार्थ :  इस मिथ्या ज्ञान को अवलम्बन करके- जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है तथा जिनकी बुद्धि मन्द है, वे सब अपकार करने वाले क्रूरकर्मी मनुष्य केवल जगत्‌ के नाश के लिए ही समर्थ होते हैं॥9॥
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्‍गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥ 

भावार्थ :  वे दम्भ, मान और मद से युक्त मनुष्य किसी प्रकार भी पूर्ण न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर, अज्ञान से मिथ्या सिद्धांतों को ग्रहण करके भ्रष्ट आचरणों को धारण करके संसार में विचरते हैं॥10॥
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥

भावार्थ :  तथा वे मृत्युपर्यन्त रहने वाली असंख्य चिन्ताओं का आश्रय लेने वाले, विषयभोगों के भोगने में तत्पर रहने वाले और 'इतना ही सुख है' इस प्रकार मानने वाले होते हैं॥11॥
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्‌॥

भावार्थ :  वे कामना की सैकड़ों फाँसियों से बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोध के परायण होकर विषय भोगों के लिए अन्यायपूर्वक धनादि पदार्थों का संग्रह करने की चेष्टा करते हैं॥12॥

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्‌।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्‌॥

भावार्थ :  वे सोचा करते हैं कि मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस मनोरथ को प्राप्त कर लूँगा। मेरे पास यह इतना धन है और फिर भी यह हो जाएगा॥13॥

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥

भावार्थ :  वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओं को भी मैं मार डालूँगा। मैं ईश्वर हूँ, ऐश्र्वर्य को भोगने वाला हूँ। मै सब सिद्धियों से युक्त हूँ और बलवान्‌ तथा सुखी हूँ॥14॥

आढयोऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥
 
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥



भावार्थ :  मैं बड़ा धनी और बड़े कुटुम्ब वाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आमोद-प्रमोद करूँगा। इस प्रकार अज्ञान से मोहित रहने वाले तथा अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले मोहरूप जाल से समावृत और विषयभोगों में अत्यन्त आसक्त आसुरलोग महान्‌ अपवित्र नरक में गिरते हैं॥15-16॥ 



आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्‌॥


भावार्थ :  वे अपने-आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले घमण्डी पुरुष धन और मान के मद से युक्त होकर केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा पाखण्ड से शास्त्रविधिरहित यजन करते हैं॥17॥

अहङ्‍कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥

भावार्थ :  वे अहंकार, बल, घमण्ड, कामना और क्रोधादि के परायण और दूसरों की निन्दा करने वाले पुरुष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अन्तर्यामी से द्वेष करने वाले होते हैं॥18॥

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌॥
भावार्थ :  काम, क्रोध तथा लोभ- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार ( सर्व अनर्थों के मूल और नरक की प्राप्ति में हेतु होने से यहाँ काम, क्रोध और लोभ को 'नरक के द्वार' कहा है) आत्मा का नाश करने वाले अर्थात्‌ उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए॥21॥

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्‌॥

भावार्थ :  हे अर्जुन! इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है (अपने उद्धार के लिए भगवदाज्ञानुसार बरतना ही 'अपने कल्याण का आचरण करना' है), इससे वह परमगति को जाता है अर्थात्‌ मुझको प्राप्त हो जाता है॥22॥ 

और फिर अठारहवें अध्याय में विशुद्ध भाव को प्राप्त हुए जीव के लिए भगवान् कहते हैं:


बुद्ध्‌या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥
अहङकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्‌।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ 


भावार्थ :  विशुद्ध बुद्धि से युक्त तथा हलका, सात्त्विक और नियमित भोजन करने वाला, शब्दादि विषयों का त्याग करके एकांत और शुद्ध देश का सेवन करने वाला, सात्त्विक धारण शक्ति के (इसी अध्याय के श्लोक 33 में जिसका विस्तार है) द्वारा अंतःकरण और इंद्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला, राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके भलीभाँति दृढ़ वैराग्य का आश्रय लेने वाला तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरंतर ध्यान योग के परायण रहने वाला, ममतारहित और शांतियुक्त पुरुष सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में अभिन्नभाव से स्थित होने का पात्र होता है॥51-53॥ 


ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्‌॥ 

भावार्थ :  फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसी के लिए शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है। ऐसा समस्त प्राणियों में समभाव वाला (गीता अध्याय 6 श्लोक 29 में देखना चाहिए) योगी मेरी पराभक्ति को ( जो तत्त्व ज्ञान की पराकाष्ठा है तथा जिसको प्राप्त होकर और कुछ जानना बाकी नहीं रहता वही यहाँ पराभक्ति, ज्ञान की परानिष्ठा, परम नैष्कर्म्यसिद्धि और परमसिद्धि इत्यादि नामों से कही गई है) प्राप्त हो जाता है॥54॥

Sunday, 15 January 2012

जीव का स्वरुप आत्मा है जो की मन,बुद्धि इन्द्रियों का प्रकाशक है


जीव अपना स्वरुप शरीर क्यूँ मानता है ?
क्यूँ हम शान्ति सौहाद्र की अपेक्षा काम क्रोध लोभ में आसक्त होते हैं ?
आखिर ऐसा क्यूँ होता है की हम अच्छा सोचते सोचते ग़लत सोचने लगते हैं ?
समाज में शुरू से ही अच्छाई की अपेक्षा बुराई ज्यादा क्यूँ रहती है ?
आखिर क्यूँ आदमी बुराई के प्रति जल्दी आकृष्ट होता है ?
क्यूँ हम अच्छाई के पथ पर चलने को बहुत कठिन मानते हैं ?
क्यूँ हमे लगता है की दंभ,घमंड,अहम् ही जीवन के सार तत्त्व हैं ?
क्या हमे ऐसा लगता है की चालाकी,धूर्तता,दुष्टता,क्रोध,हिंसा व दूसरों को कष्ट देने के लिए ही ये जीवन मिला है ?
क्या हमे ऐसा लगता है की ऐसा बहादुर व्यक्ति ही कर सकता है ?
क्यूँ हमे लगता है की सहिष्णुता,शान्ति,प्रेम,सौहाद्र,सरलता,दम्भ रहित होना कायरता और भीरूपन के परिचायक हैं ?
क्यूँ हमे कई बार ऐसा भी लगता है की भगवान् है ही नहीं ?
क्या हम जाने अनजाने अपने अवचेतन मन में भी ये नहीं सोच पाते की ये जीवन क्षणभंगुर  है?
क्या हम सदैव ये विवेक जाग्रत रखते हैं की संसार असत है और हम हमारे मिलने वाले एक न एक दिन काल में समा जायेंगे? कोई भी व्यक्ति अमर नहीं है ?
क्या हमे मालूम है सारे कार्य तीन गुणों अथार्त सत्व,रज और तम गुणों के द्वारा होते हैं और हमारा स्वरुप वास्तव में निर्लिप्त रहता है ?
क्या हमे ये अनुभव है अथवा क्या हम ये जानते हैं की इन गुणों को ही कर्ता देखना चाहिए स्वयं (आत्मा)  को नहीं ?
आखिर क्यूँ खराब सोचना अथवा विषय चिंतन अच्छा लगता है जबकि अच्छा सोचना या विषयों के प्रति वैराग्य जगाना कष्टदायी प्रतीत होता है ?
क्या हमे ये मालूम है की विषय भोग का आनंद शुरू में आनंददायी  अंत में विषदायी है व अनासक्त होना शुरू में कष्टकारी परन्तु  परिणाम  में अमृततुल्य  है ?
क्या हम प्रशंसा के अभिलाषी हैं और दूसरे के प्रमाणपत्र को पाना ही सार तत्त्व मानते हैं ?
क्या प्रशंसा की लालसा के कारण हम आत्मिक रूप से अपना आत्म कल्याण नहीं कर पाते ?
क्या ग्यानी होने के बाद भी प्रशंसा पाने की उत्कंठा हमे वही परिणाम अथार्त गति दे सकती है जो अज्ञानी को मिलती है ?
क्या स्वयं को शरीर मानने के कारण ही हम विषय-भोग,इन्द्रिय-सुख,धन,बल मान आदि को ही जीवन की प्राथमिकता मान लेते है?  
क्या हम स्वयं से भी बात करते हैं ? क्या स्वयं का अध्ययन अथार्त आत्म अध्ययन के लिए ही हमे ये जीवन मिला है ?
क्या स्वयं का स्वरुप शरीर मानने के कारण हम नित अविद्धा और अज्ञान को जाने अनजाने बढाते जाते हैं ?
जिन रक्त, मेद मज्जा इत्यादि से बने हुए अपने ही तरह के इंसानों में सुख ढूंढते हुए जीव बन्दर की तरह अथार्त मनाने,रुसने,दुखी होने खुश होने अथार्त नाच आदि में लगा रहता है उनका व स्वयं का सबसे बड़ा हित आत्मज्ञान अथार्त आत्मिक हित ही होता है क्या हमे ऐसा लगता है ?

ये सभी प्रश्न और इसी तरह के असंख्य प्रश्न जो प्राय अज्ञान,अविद्धा,संशय आदि से उत्पन्न होते हैं  और इन्हें ही बढाते रहते हैं और इस तरह से जीव को मोहित रखते हैं जिससे पूरा जीवन अज्ञान में ही निकल जाता है और सत्संग,आत्मिकज्ञान की चर्चा में कभी रूचि नहीं लगती बल्कि व्यक्ति मोह माया के तम रूप अन्धकार में नित काम क्रोध को बढाता हुए वास्तविकता में उनका ही ग्रास बनता हुआ बहुमूल्य जीवन गँवा देता है ।

बहरहाल क्या ऐसा कोई उत्तर है जो इन सब प्रश्नों का उत्तर हो तो हाँ ऐसा उत्तर है और यदि हम गंभीरता से विचार करने तो इन्ही प्रश्नों को सार प्रश्न बनाते हुए अर्जुन ने भगवान् से पूछा था ।
तीसरा अध्याय :
अर्जुन उवाचः
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ 
भावार्थ :  अर्जुन बोले- हे कृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात्‌ लगाए हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है॥36॥॥
और भगवान् श्रीकृष्ण के उत्तर ने सभी अज्ञान व अज्ञानजनित प्रश्नों को मात्र चंद शब्दों में सारे अज्ञान को समाप्त कर दिया । जैसे रात के वक़्त सारा विश्व अन्धकार में डूबा रहता है परन्तु इतनी बड़ी धरा के अँधेरे को सूर्य देवता छोटे से होते हुए भी प्रात होते ही अपने प्रकाश से दूर कर देते है ।अज्ञान रुपी अँधेरा जितना भी बढ़ जाए उसके लिए थोडा सा उजाला ही काफी है और यहाँ तो परमात्मा परमेश्वर जगताधार स्वयं श्रीकृष्ण की मुख से ये तेज को भी तेज प्रदान करने वाले शब्द प्रस्फुटित हुए ।


श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्‌ ॥
भावार्थ :  श्री भगवान बोले- रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है। इसको ही तू इस विषय में वैरी जान॥37॥
 दूसरे अध्याय में भगवान् ने इसी के मैकेनिस्म(वैज्ञानिक रूप से ) को अथार्त यही बात दूसरे ढंग से भी कही थी बस अंतर ये है की यहाँ तीसरे अध्याय में उन्होंने प्रमाणित रूप से कहा जिससे मनुष्य को बिलकुल भी संदेह न हो । दूसरे अध्याय में भगवान् कहते है :
दूसरा अध्याय 

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ 
भावार्थ :   विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है॥62॥
क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
भावार्थ :   क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है॥63॥ 
यहाँ यदि हम सिलसिलेवार देखें तो पायेंगे की कुछ प्रक्रियाएं है जिनसे व्यक्ति अज्ञान अथवा अधोगति के उन्मुख होता है ।
 १. विषयों का चिंतन 

२. आसक्ति 
३. विषयों की कामना 
४. कामना में विघ्न 
५. विघ्न से क्रोध

६.  मूढ़ भाव 

७. स्मृति में भ्रम 
 ८. बुद्धि अथार्त ज्ञान शक्ति का नाश
 ९. आत्मिक पतन
यहाँ जैसा की भगवान् ने बताया और हम स्वयं भी ऐसा अनुभव करते हैं की सबसे पहले हमसे विषय चिंतन ही होता है और उसके बाद विषयों में आसक्ति उत्पन्न होती है  और उसके बाद विषयों में कामना बढती है परन्तु हर कामना पूरी नहीं होती और विषयों की कामना अतृप्ति पर ही अथार्त और विषय सुख मिले इसी पर ख़त्म होती है। इसलिए जीव क्रोध करने लगता है और इस तरह से अंततोगत्वा स्वयं पतन की तरफ अग्रसर होने लगता है । परन्तु यदि शुरू से अथार्त विषयों का चिंतन करने से पहले ही जीव अपना विवेक जागृत रखे व विषयों में न रमे संयमशील रहे तो वो आत्मिक स्तर पर सदैव कायम रहेगा व स्वयं को निर्लिप्त रखते हुए सारे कार्य करेगा ।  यदि जीव आत्मा को ही सबसे शक्तिशाली व मन बुद्धि का प्रकाशक जानते हुए आत्मा को आप्तकाम नित्यतृप्त जानेगा व मन बुद्धि आत्मा के द्वारा ही संचालित होते हैं ऐसा समझके मन बुद्धि के वश में होने के बजाय उनपर नियंत्रण रखेगा तो आसानी से अपने आत्मिक हित के साथ लौकिक,भौतिक व सामाजिक जीवन में भी मोह माया रुपी दुःख के हेतु को जीत लेगा व सदैव प्रसन्न रहते हुए प्रसन्नता ही बांटेगा। 

यही बात भगवान् इस श्लोक के आगे के श्लोक में कहते हैं :
 
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌ ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ 
भावार्थ :   परंन्तु अपने अधीन किए हुए अन्तःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है॥64॥
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥
भावार्थ :   अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है॥65॥
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌ ॥ 
भावार्थ :   न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?॥66॥ 

Wednesday, 21 December 2011

भगवान के साकार व निराकार रूप

भगवान अथार्त ब्रह्म परमात्मा परमेश्वर निराकार है या साकार है । इस पर हमेशा से ही भिन्न भिन्न विचार लोग रखते आये हैं व प्रायः विद्वान् जनो व भक्तों ने भी इस पर अपनी अपनी राय अपने अपने साधन व साधन की सफलता के अनुरूप दी है ।
यहाँ ये समझना आवश्यक है की ये प्रभु की महान कृपा की उसने सभी को जिसने उसे जिस भी रूप में देखा और राय दी उसे मंडित किया अपने प्रिय भक्तों के विचारों के अनुसार करूणानिधि व भक्तवत्सल प्रभु ने प्रायः सभी रूपों में अपने को प्रदर्शित किया ।
भगवान के लिए कुछ भी असंभव नहीं और वो तो वैसे भी सबकुछ है ही चाहे हम निराकार रूप को लें या साकार रूप को लें ।

परन्तु भगवान क्या साकार व निराकार के अतिरिक्त भी कुछ हो सकते हैं तो जहाँ तक इंसान सोच सकता है भगवान वहां तक हो सकते हैं चाहे वो सगुण साकार की बात हो या निर्गुण निराकार या फिर दोनों का मिश्रित रूप ।


प्राकृतिक मन बुद्धि इन्द्रियों के द्वारा भगवान की विवेचना नहीं हो सकती क्यूंकि परमात्मा चेतन है सबका प्रकाशक है व मन बुद्धि इन्द्रियाँ जड़ हैं वस्तुतः परमेश्वर के लिए ये कहना की वो साकार ही है अथवा निराकार ही है तर्कसंगत नहीं क्यूंकि इस तरह से हम भगवान की क्षमता को कम आंकने लगते हैं क्यूंकि ये तो सर्वविदित है की प्रभु के लिए सब कुछ संभव है और बहुधा निराकार व साकार ब्रह्म के उपासक के साथ साथ  अन्य विद्वान् लोग भी भगवान की दोनों ही रूपों की पुष्टि करते हैं उनका खंडन नहीं ।


किसी संत की प्रभु की प्रभुता के प्रति ये उदगार बहुत  सारगर्भित से हैं की भगवान एक अनंत अगाध समुद्र की भाँती है व हम इंसान प्रभु रुपी समुद्र की गहराई मापने के लिए अपने विचार रुपी छड़ी को समुद्र में डुबोते हैं व उसे उतना ही गहरा मानते हैं परन्तु प्रभु की  प्रभुता को थोडा भी जानने वाले ये मानते हैं की प्रभु अपरिमित असीमित हैं उनका समुचित वर्णन नहीं हो सकता ।


हाँ साधना से मन बुद्धि को कर्मयोग भक्तियोग अथवा ज्ञानयोग में लगाकर ईश्वर की अनुकम्पा से ईश्वर को जाना जा सकता है क्यूंकि तब व्यक्ति (जीव) अपने स्वरुप आत्मा(चेतन)  में स्थित होगा ।


रामचरितमानस में भी ऐसी शंका की राम निराकार परमात्मा हैं या राजा दशरथ के पुत्र  (साकार) जिसका  निराकरण भगवान शंकर ने किया है :


बालकाण्ड 




जेहि इमि गावहिं बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान।
सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान॥118॥
अर्थ - जिसका वेद और पंडित इस प्रकार वर्णन करते हैं और मुनि जिसका ध्यान धरते हैं, वही दशरथनंदन, भक्तों के हितकारी, अयोध्या के स्वामी भगवान श्री रामचन्द्रजी हैं॥118॥

आगे बाललीला के समय वो कौशल्या जी को अपनी विराट महिमा भी दिखाते हैं साथ ही गोस्वामी जी ने कई बार स्पष्ट लिखा है 
बालकाण्ड 
ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप।
भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप॥205॥
अर्थ:-जो व्यापक, अकल (निरवयव), इच्छारहित, अजन्मा और निर्गुण है तथा जिनका न नाम है न रूप, वही भगवान भक्तों के लिए नाना प्रकार के अनुपम (अलौकिक) चरित्र करते हैं॥205॥

भगवान शिव ने अगुन अथार्त निराकार व सगुण अथार्त साकार रूप जैसे गूढ़ सन्दर्भ को गोस्वामी जी के माध्यम से अतिसरल करते हुए निर्गुण व सगुण व दोनों की व्याख्या करते हुए कहा है ।
परन्तु इससे पहले उन्होंने श्रीराम अथार्त परमात्मा के स्वरुप को और स्पष्ट किया है की वो आत्मा के भी आत्मा तथा समस्त ब्रह्माण्ड के प्रकाशक है तथा जो माया जीव से ऊपर है व श्रीराम जी की कृपा से ही जिसका निस्तारण हो सकता है वो उस माया के भी स्वामी है अथार्त प्रकाशक हैं ।
बिषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता॥
सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई॥3॥
अर्थ:-विषय, इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के देवता और जीवात्मा- ये सब एक की सहायता से एक चेतन होते हैं। (अर्थात विषयों का प्रकाश इन्द्रियों से, इन्द्रियों का इन्द्रियों के देवताओं से और इन्द्रिय देवताओं का चेतन जीवात्मा से प्रकाश होता है।) इन सबका जो परम प्रकाशक है (अर्थात जिससे इन सबका प्रकाश होता है), वही अनादि ब्रह्म अयोध्या नरेश श्री रामचन्द्रजी हैं॥3॥
जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू॥
जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥4॥
अर्थ:-यह जगत प्रकाश्य है और श्री रामचन्द्रजी इसके प्रकाशक हैं। वे माया के स्वामी और ज्ञान तथा गुणों के धाम हैं। जिनकी सत्ता से, मोह की सहायता पाकर जड़ माया भी सत्य सी भासित होती है॥४
इस तरह से मानो उन्होंने ये स्पष्ट कर दिया की प्रभु को किसी भी परिभाषा में रखना प्रभु की सीमा को कम करना ही है क्यूंकि हो असीमित है जो अवर्णनीय है उसकी सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती। उसे थोड़े शब्दों में थोडा सा समझा जा सकता है परन्तु सारे धार्मिक ग्रंथों में की गयी प्रभु की महिमा मिला कर भी प्रभु का पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता अपितु सबका सार ही येही है की प्रभु का सार नहीं पाया जा सकता ।

निर्गुण व्याख्या  

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥
आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥3॥

भावार्थ:-वह (ब्रह्म) बिना ही पैर के चलता है, बिना ही कान के सुनता है, बिना ही हाथ के नाना प्रकार के काम करता है, बिना मुँह (जिव्हा) के ही सारे (छहों) रसों का आनंद लेता है और बिना ही वाणी के बहुत योग्य वक्ता है॥3॥

तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा॥
असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी॥4॥
भावार्थ:-वह बिना ही शरीर (त्वचा) के स्पर्श करता है, बिना ही आँखों के देखता है और बिना ही नाक के सब गंधों को ग्रहण करता है (सूँघता है)। उस ब्रह्म की करनी सभी प्रकार से ऐसी अलौकिक है कि जिसकी महिमा कही नहीं जा सकती॥4॥

सगुण व्याख्या 

सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥
अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई॥1॥
अर्थ :-सगुण और निर्गुण में कुछ भी भेद नहीं है- मुनि, पुराण, पण्डित और वेद सभी ऐसा कहते हैं। जो निर्गुण, अरूप (निराकार), अलख (अव्यक्त) और अजन्मा है, वही भक्तों के प्रेमवश सगुण हो जाता है॥1॥
जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें॥
जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा। तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा॥2॥
अर्थ :-जो निर्गुण है वही सगुण कैसे है? जैसे जल और ओले में भेद नहीं। (दोनों जल ही हैं, ऐसे ही निर्गुण और सगुण एक ही हैं।) जिसका नाम भ्रम रूपी अंधकार के मिटाने के लिए सूर्य है, उसके लिए मोह का प्रसंग भी कैसे कहा जा सकता है?॥2॥

भगवान ने श्रीमद भगवद्गीता में भी कहा है :-

अध्याय ४ 
यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः ।
अभ्युथानाम्धार्मस्य तदात्मानं स्रुज्याम्यहम ।।७ ।।

अर्थ :- जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अथार्त साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ ।
परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम ।
धर्म्संस्थाप्नाथार्य संभवामि युगे युगे ।।८।।

साधू पुरुषों का उद्धार करने के लिए पाप कर्म करने वालों का नाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना के लिए मैं युग युग में प्रकट हुआ करता हूँ ।
और वस्तुतः येही रामचरितमानस में गोस्वामी जी ने कहा है 
जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥3॥
अर्थ :- जब-जब धर्म का ह्रास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं॥3॥
चौपाई :

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥4॥
अर्थ :-और वे ऐसा अन्याय करते हैं कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता तथा ब्राह्मण, गो, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं, तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भाँति-भाँति के (दिव्य) शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं॥4॥
दोहा :
असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।
जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु॥121॥
अर्थ :-वे असुरों को मारकर देवताओं को स्थापित करते हैं, अपने (श्वास रूप) वेदों की मर्यादा की रक्षा करते हैं और जगत में अपना निर्मल यश फैलाते हैं। श्री रामचन्द्रजी के अवतार का यह कारण है॥121॥

गोस्वामी तुलसीदास जी ने निर्गुण ब्रह्म और सगुण ब्रह्म से भी बढ़कर भगवान के नाम को बताया है और सगुण ब्रह्म व निर्गुण ब्रह्म को तत्वतः जानने के लिए नाम की ही शरण में साधकों को जाने को कहा है ।


ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि।
रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि॥25॥
अर्थ :- इस प्रकार नाम (निर्गुण) ब्रह्म और (सगुण) राम दोनों से बड़ा है। यह वरदान देने वालों को भी वर देने वाला है। श्री शिवजी ने अपने हृदय में यह जानकर ही सौ करोड़ राम चरित्र में से इस 'राम' नाम को (साररूप से चुनकर) ग्रहण किया है॥25॥


Tuesday, 6 December 2011

प्राणायाम

प्राणायाम के शारीरिक लाभ से कहीं अधिक मानसिक व उससे भी अधिक आध्यात्मिक लाभ हैं ।
श्रीमद भगवद्गीता में भगवान् ने बताया है की व्यक्ति प्राणायाम के द्वारा सहजता से अपने सहज रूप में स्थित होने लगता है । प्राणायाम को निरंतर करते रहने से बहुत शीघ्र अंतःकरण शुद्ध होता है व एक तो जीव के मन और बुद्धि से होने वाले कर्मों में विकार भाव कम होने लगते हैं । साथ ही बाहर से मिलने वाले विकारी भाव उसके अविकारी स्वरुप को अव्यवस्थित नहीं कर पाते क्यूंकि तत्वतः वो उसके स्वयं की ही मनोवृत्ति के भाव होते हैं ये जीव तत्त्व से जानने लगता है ।व्यक्ति सहज,सम व शांत अवस्था को प्राप्त रहता है इससे व्यक्ति आनंद में रहता है व भगवत उपासना,भजन आदि अंतःकरण शुद्धि के कारण सहज व स्वाभाविक रूप से आनंददायी लगने लगते हैं ।
ब्रह्म शांत है सम है अविकारी है अविनाशी है शाश्वत है सनातन है सर्वव्याप्त है अनंत है अवर्णनीय है ऐसा तत्त्व से भलीभांति योग से जाना जा सकता है और प्राणायाम इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।

भगवान् ने चौथे अध्याय में कहा है -

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥
भावार्थ : कितने ही योगीजन अपान वायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायु में अपान वायु को हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करने वाले प्राणायाम परायण पुरुष प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों (कर्मों) द्वारा पापों का नाश कर देने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं॥29-30॥


यहाँ भगवान् प्राणायाम के अंतर्गत प्राण वायु व अपान वायु की महत्ता बता रहे हैं व प्राणायाम में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका बता रहे हैं क्यूंकि श्वास पर्श्वास में प्राणवायु व अपानवायु की भूमिका होती है ।प्राण वायु का स्थान ह्रदय  तथा अपान वायु का गुदा है।श्वास को बाहर निकालते समय वायु की गति ऊपर की ओर तथा श्वास को भीतर ले जाते समय वायु की गति नीचे की ओर होती है ।
योगीलोग चन्द्र नाडी अथार्त बायीं नासिका से पूरक करते हैं अथार्त भीतर ले जाते हैं वहां वह वायु ह्रदय में स्थित प्राणवायु को साथ लेकर नाभि से होते हुए अपान में लीन हो जाती है । तदनंतर वे प्राणवायु व अपानवायु दोनों की गति को रोक देते हैं अथार्त कुम्भक करते हैं जिससे श्वास ना तो बाहर जाता है और ना ही अन्दर जाता है ।
इसके बाद वे सूर्य नाडी अथार्त दाहिनी नासिका के द्वारा श्वास को बाहर निकालते हैं यानी रेचक करते हैं ।
वह वायु प्राण वायु के साथ अपानवायु को साथ लेकर बाहर निकलती है यही प्राणवायु में अपानवायु का हवन करना कहा जाता है ।
सामान्यतः  पूरक कुम्भक रेचक में १:४:२ के समय का अनुपात रखा जाता है जैसे भगवान् का नाम या फिर गायत्रीमंत्र जपते हुए पूरक में ४ बार कुम्भक में सोलह बार व रेचक में आठ बार किया जाता है ।
इसी प्रक्रिया को फिर उल्टा किया जाता है सूर्य नाडी (दाहिनी नासिका ) से पूरक,फिर कुम्भक व फिर चन्द्र नाडी से रेचक करते हैं ।
इस तरह से 
पूरक-कुम्भक-रेचक करना 
व रेचक-कुम्भक-पूरक करना ही प्राणायाम है,प्राणायाम रुपी यज्ञ है ।
इसके साथ ही भगवान् नियमित (संतुलित) आहार व संयम (मानसिक) को प्राणायाम में अत्यंत आवश्यक बताते हैं श्रीमद भगवद्गीता(६/१३-१७)  
प्राणों का प्राण में हवन करने का तात्पर्य है प्राणों का प्राण में और अपान का अपान में हवन करना अथार्त प्राण और अपान को अपने अपने स्थान पर रोक देना ना श्वास बाहर निकालना और ना श्वास भीतर लेना इसे स्तम्भवृत्ति प्राणायाम भी कहते हैं ।
इस प्राणायाम से स्वाभाविक ही वृत्तियाँ शांत होती हैं और पापों का नाश होता है साथ ही मानसिक पाप व विकार भी कम होने लगते हैं व एक समय के बाद विकार आते ही नहीं संपूर्ण यज्ञ (कर्म) केवल कर्मों से सम्बन्ध विच्छेद करने के लिए ही हैं भगवान् कहते हैं ऐसा जानने वाले ही यज्ञवित अथार्त यज्ञ रुपी निष्कामभावकर्म  को जानने वाले हैं ।

Friday, 21 October 2011

निर्गुण उपासना और सगुण उपासना (Attribute worship and Attributeless worship)

अध्याय १२ 

Chapter 12


ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्‌ ॥
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ 

भावार्थ :  परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं॥3-4॥


Those who worship the indescribable,all-pervading,inconceivable,immutable,constant,eternal,impersonal absolute devoid of perceptible form and attributes;completely controlling all the senses with spiritual intelligence equally disposed to everything and dedicated to the welfare of all living entities;they certainly achieve me.



निर्गुण उपासना
निर्गुण उपासना में चिंतन का कोई आधार न रहने से इन्द्रियों का सम्यक संयम हुए बिना(आसक्ति रहने पर) विषयों में मन जा सकता है और विषयों का चिंतन होने से पतन (उपासना अपूर्ण)होने की संभावना रहती है । अतः निर्गुनोपासक के लिये सभी इन्द्रियों को विषयों से हटाते हुए सम्यक प्रकार से पूर्णतः वश में करना आवश्यक है । इन्द्रियों को केवल बाहर से ही वश में नहीं करना है,प्रत्युत विषयों के प्रति साधक के अंतःकरण में भी राग नहीं रहना चाहिए क्यूंकि जब तक विषयों में राग है, तब तक ब्रह्म की प्राप्ति कठिन है । इन्द्रियों के विषयों से तात्पर्य है
पांच ज्ञानेन्‍द्रि‍यों के पांच वि‍षय हैं —
ज्ञानेन्‍द्रि‍यां वि‍षय
आंख   रूप
जीभ   रस
नाक   गन्‍ध
त्‍वचा  स्‍पर्श
कान  शब्‍द
(आँख,जीभ,नाक,त्वचा,कान) को अपने विषयों(रूप,रस,गंध,स्पर्श,शब्द ) के प्रति संयम रखना सगुण उपासना और निर्गुण उपासना दोनों में महत्त्वपूर्ण है ।

इन श्लोकों में भगवान् ने निर्गुण ब्रह्म के आठ विशेषण बताये हैं-
अचिन्त्य(मन, बुद्धि से परे),
सब जगह परिपूर्ण
अनिर्देश्य (जो भाषा,वाणी से नहीं बतलाया जा सकता)
कूटस्थ(सभी समय सभी देश,काल,वस्तु,व्यक्ति में परमात्मतत्त्व निर्विकार और निर्लिप्त रहता है)
अचल (आने जाने की क्रिया से सर्वथा रहित)
ध्रुव (जो नित्य विद्यमान है )
अक्षर (जिसका कभी क्षरण अथार्त विनाश नहीं होता)
अव्यक्त(जो व्यक्त न हो अथार्त मन-बुद्धि-इन्द्रियों का विषय न हो)
इन विशेषणों का लक्ष्य रखकर जो उपासना की जाती है,वह निर्गुण ब्रह्म की ही उपासना है और इसके परिणाम में प्राप्ति भी निर्गुण ब्रह्म की ही होती है ।

परमात्मा को तत्त्व से समझाने के लिए दो प्रकार के विशेषण दी जाते हैं - निषेधात्मक और विध्यात्मक ।

परमात्मा के अक्षर,अनिर्देश्य,अव्यक्त,अचिन्त्य,अचल,अव्यय,असीम,अपार,अविनाशी आदि विशेषण निषेधात्मक हैं और सर्वयापी,कूटस्थ,ध्रुव,सत,चित,आनन्द आदि विशेषण
विध्यात्मक हैं ।
परमात्मा के निषेधात्मक विशेषणों का तात्पर्य प्रकृति से परमात्मा की असंगता बताना है और विध्यात्मक विशेषणों का तात्पर्य परमात्मा की स्वतंत्र सत्ता बताना है ।
परमात्मतत्त्व सांसारिक प्रवृत्ति और निर्वृत्ति- दोनों से परे सहज निवृत्त और दोनों को सामानरूप से प्रकाशित करने वाला है ।
साधक अपनी बुद्धि से परमात्मा को देखने की चेष्टा करता है,जबकि सिद्ध महापुरुषों की बुद्धि में परमात्मा स्वाभाविक रूप से इतनी घनता से परिपूर्ण हैं की उनके लिए परमात्मा के सिवाय और कुछ है ही नहीं। इसलिये उनकी बुद्धि का विषय परमात्मा नहीं हैं , प्रत्युत उनकी बुद्धि ही परमात्मा से परिपूर्ण है । भगवान कहते हैं की ऐसे साधकों को जो निर्गुण ब्रह्म प्राप्त होता है वह मैं ही हूँ। तात्पर्य है की तत्वतः सगुण और निर्गुण एक ही तत्त्व है अथार्त सब कुछ तत्वतः परमात्मा ही है ।




Attributeless Worship


For devotees who worship the attributeless God, having no base for thought,without controlling the senses,can think of the objects of the senses and thus can perish.For such devotees it is necessary to control,not only the senses fully but also the mind,because so long as, there is attachment of the mind with the objects of senses, the Absolute(Brahma), can not be gained.
here God is denoted by eight adjectives as follows

Acintyam (Indescribable) - who is beyond the reach of senses and mind.God can be known one by the self.
Sarvatragam (All pervading)- all pervading and limitless.
Anirdesyam(Inconceivable) - which can not be defined through language or speech.
Kutastham(Immutable) - who while pervading all space,time,things and individuals,remains unvitiated and uncontaminated.
Acalam(Constant) - Totally immovable and free from change.
Dhruvam(Eternal) - Certain and eternal.
Aksaram(Impersonal) - Truth,Consciousness and Bliss,solidified and is never destroyed.
Avyaktam(Incomprehensible)-  to the mind and senses.

In order to explain the existence of God,two kinds of adjectives - in the negative and in the positive,have been given.The negative adjectives,imperishable,indefinable,unmanifest,unthinkable,immovable,unlimited,show that God is different from prakrati(nature) while the posivite adjectives,such as omnipresent,uniform,eternal,and nouns - truth,consciousness and bliss,show the Lord's independent existence.Innate,Inactive,Absolute,beyond the states of activity and non-activity is the illuminator, of activity and non activity.The different adjectives have been used so that the intellect may have a conception about Him, and so it may reflect upon, that Absolute.
A striver tries to behold God everywhere, while for God-realised souls, there is nothing but,God.They are even minded,because they behold only God,everywhere.The intellect of the God-realized soul is naturally influenced by the Absolute.The Lord declares that those who worship attributeless God also attain him.It means, that God with attributes, and God,Who is attributeless,are one and the same.





ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ 
 तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्‌ ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्‌ ॥


भावार्थ :जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं। ॥6॥ हे अर्जुन! उन मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ॥7॥
 
Those who surrendering all activities unto Me, being  attached to Me meditating on Me
 with exclusive worship by the science of uniting the individual consciousness with the Ultimate consciousness in devotion;O Arjuna,of these persons whose minds are absorbed in thoughts of Me,I become deliverer without delay from the ocean of death in the material existence.








 सगुण उपासना 



सगुण उपासना में ध्यान का विषय सगुण भगवान् होने से इन्द्रियां भगवान् में लग सकती हैं क्यूंकि भगवान् के सगुण स्वरुप में इन्द्रियों को अपने विषय प्राप्त हो जाते हैं अतः इन्द्रिय संयम की आवशयकता रहते हुए भी इसकी इतनी अधिक आवशयकता नहीं रहती । `सगुण उपासना में उपास्यतत्व के सगुण साकार होने के कारन साधक के मन,इन्द्रियों के लिये भगवान् के स्वरुप,नाम.लीला कथा आदि का आधार होता है । सांसारिक आसक्ति ही साधन में क्लेश देती है परन्तु सगुणोपासक इसको दूर करने के लिये भगवान् के ही आश्रित रहता है ।वह अपने में भगवान् का ही बल मानता है । इस साधन में विवेक और वैराग्य की उतनी आवशयकता नहीं जितनी प्रेम और विश्वास की।यहाँ साधक अपने सभी कर्म भगवान को अर्पित कर देता है । सगुणोपासक भगवान् का ही लक्ष्य,ध्येय रखकर उपासना अथार्त जप तप ध्यान कीर्तन आदि करते हैं । ये अपनी अनुकूल और प्रतिकूल दोनों वृत्तियाँ जिनसे राग द्वेष उत्पन्न होता है भगवान् में लगा देते हैं और भगवान् को प्राप्त करते हैं ।



Attribute Worship



Such devotees can easily concentrate their senses and mind, on God,because He is with form and attribute.It is attachment of world which causes difficulty in the spiritual path.Such devotees depends totally on God to get rid of worldly attachments.They surrender their all actions to God.In a daily life man,is bound to face both desirable and undesirable circumstances.Feelings of agreeableness and disagreeableness towards him are inherent in a man.Through such feelings a man develops for attachment and aversion.Such devotees surrender their feelings of agreeableness and disagreeableness to the God.






 From- Sadhak Sanjivani ( Gitapress)