चली जा रही थी मैं
अचानक चार लोगों ने मुझे रोका
मुझे घसीटा और दरिन्दे बन बैठे
चीखती रही चिल्लाती रही मैं
अपनी अस्मत की भीख मांगती रही मैं
लेकिन उससे उन्हें कोई फर्क न पड़ा
नोचते रहे वो चील- कौवों की मानिंद
खेलते रहे मेरे जिस्म के साथ हैवानियत का खेल
फिर मरा जानकर छोड़ गए मुझे मेरे हाल पर
मैं लेकिन अब मैं कहाँ रह गयी
मेरे जिस्म पर उन नाखूनों के निशान
हमेशा के लिए हो चुके हरे ज़ख्म
पूछते रहते मुझसे
बताते रहते मुझको
जिस्म नहीं तेरी रूह मसली गयी है
इस तरह से तेरी रूह रो रही है
तू जिंदा नहीं मर चुकी है
पूछते रहते हैं वो निशान
क्या अब तेरी रात ख़त्म होगी कभी
दर्द से अनजान कोई सवेरा देखेगी तू कभी
मेरे हौसलों की सुबह खो गयी
मेरे दुखों की रात में मिल गयी
किस तरह ख़त्म किया है वजूद मेरा
चार पलों की तुच्छ कामपिपासा के लिए
इंसानों ने हैवानियत को भी शर्मसार कर डाला
काश मुझे इंसान समझा होता
खुद इंसान होके भी जानवर न बनते
रक्त,हड्डी,मांस को नोचने में ये कैसी ख़ुशी
आदमियत के क्या मायने रह गए मेरे लिए
ज़िन्दगी के हर मंज़र ग़म की छाँव हो गए
सोचों में भी गहरे ज़ख्म
आखिर सोचूं भी तो क्या
कैसे कहूँ मैं भी कभी इंसान थी
आँख खोलूं या बंद करूँ वोही खौफनाक मंज़र
क्या दिलासा देके खुद को ढाढस बंधाऊं
अपने आने वाले कल में कैसे खुशियाँ लाऊं
हर पल खुद को मरते हुए देखना
हर दिन उदासी से उगा सूरज देखना
और फिर लोगों द्वारा बदचलनी के आरोप
मैं कैसे जवाब दूँ जब हिलते नहीं होंठ
कैसे घर से निकलूं जब हर नज़र सवाल करती है
इंसानी सामाज का ये कैसा रूप है
ये कैसी दरिंदगी ,हवस की कैसी भूख है
बलात्कार इंसानियत को कलंकित करता है
इसका असर जिस्म से ज्यादा रूह पर होता है
आज समाज में नित बलात्कार की घटनाएं बढ़ रहीं
न ही प्रशासन न ही समाज को इसकी चिंता सता रही
बलात्कार पीडिता भी किसी की माँ,.बहन,बेटी होती है
आखिर क्यूँ नहीं बलात्कारी की आत्मा पसीजती है
3 साल की लड़की तो कभी 60 साल की औरत इसका शिकार होती
कितनी तो बलात्कारियों द्वारा जिंदा जला दी जातीं
आखिर कब तक ऐसी ख़बरें अखबारों की शीर्ष पंक्तियाँ बनेंगी
आखिर कब तब टीवी चैनल में आखें ये वहशत देखेंगी
क्यूँ नहीं बलात्कारी को दण्डित करने वाली ख़बरें दिखाई जाती
क्यूँ नहीं समाज को कालिख पोतने वाले इस कुकृत्य पर लगाम लगती
क्यूँ बलात्कारी को बलात्कार के बाद ही बेल दे दी जाती
क्यूँ नहीं बलात्कारी के खिलाफ निश्चित कार्यवाही की जाती
देश का क़स्बा गाँव की कौन कहे जब राजधानी में ही महिलाएं सुरक्षित नहीं
कार में घसीटने की घटनाएं गुंडों द्वारा पुलिस थाने के बगल में हो रही
ये कैसी शासन व्यवस्था जहाँ बलात्कारी जेल जाते ही छूट जाते हैं
ये कैसा समाज जहाँ वो फिर से येही कुकृत्य दोहराते हैं
कई तो बाहुबली बन डंके की चोट पर अपने इलाके में आतंक मचाते हैं
कई तो नेता बनकर जनता से अपनी महिमा गान कराते हैं
कई जिस्मफिरोशी का धंधा जमा बलात्कार को महिमामंडित करते हैं
क्या बलात्कार,चोरी,डकैती,खून सभ्य समाज के आभूषण हो गए हैं
वस्तुवादिता और वासना से ओत-प्रोत हो समाज अपने नैतिक मूल्यों को भूल रहा
सच्चाई,करुणा,प्रेम,दया,सहिष्णुता,मानवता को समाज भूल रहा
इन्ही सद्गुणों को आधार बिंदु मानके ऐसी घृणित सोच रुकेगी
तभी जाके इंसानियत शर्मसार होने से बच सकेगी
तब जाके स्वच्छ,पारदर्शी व नैतिकता प्रधान समाज का निर्माण होगा
तब जाके पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का सच्चा सम्मान होगा