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Wednesday, 23 November 2011

आदमी आदमियत से मुंह मोड़ रहा है



आदमी आदमियत से मुंह मोड़ रहा है
और खुद को इंसान कहला रहा है

परमाणु बम की खेप सजाये हर देश
जोर शोर से शान्ति का सन्देश दे रहा है

धर्म मज़हब के नाम पर क़त्ल-ओ-आम
और अल्लाह को ईश्वर को रिझा रहा है

देश के नेता देश को बेच रहे हैं
जनता को फिर भी चुनाव भा रहा है

घर में अच्छे संस्कार देने की जगह
वृद्धा आश्रम की नीव बना रहा है

मंहगाई ने तोड़ दिए कितने आशियाने
स्विस बैंक नेताओं की रकम बता रहा है

थानों के बगल में गुनाह हो रहे है
आदमी १५ अगस्त की परेड में जा रहा है

आस्था संस्कार को ब्लाक करके
ऍफ़ टीवी पर वासना दर्शन कर रहा है

घर पर गाय के दूध की जगह डिब्बे का
स्वयं शराब-बिअर का ग्रास बन रहा है

सत्संग से मन बुद्धि महकाने की जगह
बीडी सिगरेट से आत्म हनन कर रहा है

अपने में सुधार करने की जगह
औरों की खामियों का बखान कर रहा है
 

उपासना के वक़्त भी विषयों का चिंतन 
साधन को ही साधना समझ रहा है 

आत्म तत्त्व प्रखर हो भी कैसे
राग द्वेष में नित स्वयं को बाँध रहा है

परमानन्द मिलता है उसे 'प्रताप'
जो स्वयं का स्वरुप शरीर नहीं मान रहा है

Wednesday, 16 November 2011

औचित्यहीन होती मीडिया और दिशाहीन होती पत्रकारिता




 
मीडिया समाज की स्वतंत्रता और नैतिकता को पुष्ट करता है
पत्रकारिता द्वारा भी इसी तरह समाज का हित होता है
इसीलिए ये लोकतंत्र का चौथा खम्बा कहलाते हैं
न्याय,समता से ये समाज का नेतृत्व करते हैं
ऐसे पत्रकारों को दिल से नमन दिल से सलाम
ऐसे मीडियाकर्मियों को भी  ह्रदय से प्रणाम

परन्तु क्या आज मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहा

कहीं लोकतंत्र का ये खम्बा खोखला तो नहीं हो रहा
वास्तविकता ये है सच्चाई पर लिखने वाले कम हो गए हैं
अधिकतर स्वार्थ व वस्तुवादिता की आंधी में बह गए हैं
आज की मीडिया समाज को सही दिशा दे भी तो कैसे
जब खुद ही वो सही रास्ते पर नहीं चल रही है 

अपने मानकों को छोड़कर व्यापार का केंद्र हो गयी है
जनता मंहगाई,गरीबी,अशिक्षा,आतंकवाद,बुखमरी से मर रही
लेकिन मीडिया तो विज्ञापनों से जेब भर रही 
देश वैमनस्यता,बिखराव,विभाजन की राह पर है  
कोई तेलंगाना,कोई उत्तरप्रदेश को तोड़ने पर आमादा है
कोई कश्मीर,कोई महाराष्ट्र में अलगाववाद फैला रहे
कोई नक्सलियों के साथ मिलकर देश को बेच रहे
ऐसे लोगों पर ऐसे कृत्यों पर मीडिया क्यूँ चुप है
आखिर समाज हित के मुद्दों पर कलम खाती क्यूँ जंग है
 

आज पूरे देश में अराजकता व अपराध की बाढ़ सी आई है
बलात्कार,अपहरण,चोरी-डकैती,हत्या वालों की बन आई है
कहीं छुप के तो कहीं खुलेआम बहु बेटियों की इज्ज़त लूटी जा रही 
कहीं जिस्म के सौदागरों द्वारा रोज़ ही ये बेचीं जा रही
बाल-श्रम,दहेज़-हत्या,कन्या-भ्रूण हत्या समाज को अभिशापित कर रहे 
सामाजिक हित से जुड़े मुद्दे कलम से सियाही नहीं पा पा रहे 
मीडिया की प्राथमिकता से ये जैसे खोते जा रहे    
समाज सेवा ही मीडिया का धर्म मीडियाकर्मी नहीं जान पा रहे
भ्रष्टाचार पर भी मीडिया का रुख गोल मोल सा ही लगता 
अन्ना,रामदेव के मुद्दों की जगह इनका ध्यान इनके व्यक्तित्व की तरफ ज्यादा रहता   


खुलके के शराब बेचीं जा रही,जुओं की मंडली सज रही
कहीं तस्करी की छाँव में ए क ४७,कहीं अफीम मिल रही
कहीं नेता की गाडी के चक्कर में बीमार अस्पताल नहीं पहुँच पाता

कितने शहर बाढ़ से डूबे हुए हैं

कितने शहर सूखे में पड़े हुए है
कहीं चीन ने खिलौनों की मार्केट पर भी कब्ज़ा कर लिया है
और उसी ने अरुणाचल में गोरखधंधा किया हुआ है
सीमापार आतंकी कैंप चल रहे हैं
देशवासियों को मारने के प्लान बन रहे हैं
हर कुछ दिन पर धमाके हो रहे
अब तो अदालत के सामने ही लोग मर रहे
किसानो की ज़मीन नेता ही छीने जा रहे
लेकिन अखबारवाले इसे छाप नहीं पा रहे
प्रिंस के गड्ढे में गिरने पर ढाई दिन लगातार कवरेज किया जाता
लेकिन गंगापुत्र निगमानंद को मीडिया ढाई मिनट नहीं दिखा पाता
देश व समाज से से जुड़े मुद्दों पर अधिकतर पत्रकार लिख नहीं पा रहे
क्यूंकि शायद इससे वो अपना निजी फायदा होता नहीं देख रहे
निडरता की जगह बेशर्मी ने ले ली है और कुशलता की जगह चाटुकारिता ने
खबर की जगह अहमियत स्वार्थ ने और संवेदनशीलता की संवेदनहीनता ने

अधिकतर न्यूज़ चैनेल्स के प्रोडूसर जैसे पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड हो गए  

पैसा नहीं समाज हित है पत्रकारिता इस सिद्धांत को भूल चुके हैं
कभी पुराने पत्रकारों के कौशल का ग़लत फायदा उठाके
कभी नेताओं को आपस में ही टीवी पर लड़ा के
जोर रखते हैं टी आर पी की रेटिंग  पर
बार बार ब्रेक लेते हैं ये विज्ञापन के लिए
तरसता है आम इंसान अदद खबर के लिए
अखबार भी ख़बरों की गुणवत्ता बाद में पहले विज्ञापन की लिस्ट देखते हैं
किसी मंत्री या पुलिस अधिकारी वाले के फ़ोन पर ही खबर छुपा जाते हैं
इसी तरह न्यूज़ चैनेल्स भी राजनीति के प्रभाव में दिखते हैं
समाज हित की ख़बरें तो ये बहुत बाद में रखते हैं 

 

क्यूँ नहीं दिखा पाते ये देश में बढ़ते हुए अपराधों का ग्राफ
क्यूँ नहीं बता पाते कारण कैसे रुक सकेगा अपराध
क्यूँ मीडिया आत्मदाह से रोकने के बजाय उसे शूट करता
क्यूँ नहीं पत्रकार निगमानंद जैसे लोगों के अनशन पर  लिखते
निज स्वार्थ हेतु गंगापुत्र कहते हैं जब वो जान दे चुके होते
आज पत्रकारिता  का समाज की बुराइयों को दूर करने में कितना योगदान है
सोचना होगा क्या लोकतंत्र का ये चौथा खम्बा अपने पथ पर महान है
देश में बाढ़,सूखे,मंहगाई,बेरोज़गारी की जगह मीडिया में चमक दमक ने ले ली
आज कौन से फिल्म स्टार को आना है स्टूडियो में बाकी क्रिकेट की कवरेज ने ले ली
आज अधिकतर नाम और रौब पाने के चक्कर में मीडिया लाइन से जुड़ते हैं
पत्रकारिता कम लोग करते हैं अधिकतर तो आम जनता पर ही रौब कसते हैं
कोई पैसों के चक्कर में पड़ा रहता है कोई झूठे अहम्  से बाहर नहीं निकल पाता है
कोई देश व समाज के दुश्मनों से ही इन वजह से सांठ - गाँठ कर जाता है
कोई अन्दर ही अन्दर धर्म,जाति की राजनीति में लगा होता है
कोई किसी नेता या पार्टी की ही जय जयकार में लगा होता है
कोई किसी हवलदार से पेट्रोल डलवाता कोई किसी व्यापारी को पकड़ता
बड़ी आसानी से तुच्छ दामों पर अमूल्य ख़बरों का सौदा हो जाता
वस्तुवादिता व वासना का निडरता से मुकाबला एक सच्चा पत्रकार करता है
धन,बल,दंभ,अहम्,कंचन,कामिनी में पड़कर अपने उद्देश्य से नहीं भटकता है        
सच्ची पत्रकारिता का सिर्फ एक उद्देश्य होता है समाज हित व समाज सेवा
अच्छी मीडिया का आंकलन तो समाज में घटते अपराध से ही होगा
इसके लिए व्यक्तिगत स्तर पर समीक्षा व क्रियान्वन की आवश्यकता है
सत्य,इमानदारी,निडरता,निस्वार्थता,सौहार्द व समाज हित ही पत्रकारिता के आधार हैं
येही बिंदु मीडिया की दिशा व दशा तय करने के आधार हैं,इन्ही से होना उद्धार है  

Sunday, 13 November 2011

बलात्कार







चली  जा  रही  थी  मैं  
अचानक चार  लोगों  ने  मुझे  रोका 
मुझे  घसीटा  और   दरिन्दे  बन  बैठे  
चीखती  रही  चिल्लाती  रही  मैं 
अपनी अस्मत की भीख मांगती रही मैं  
लेकिन  उससे  उन्हें  कोई फर्क न पड़ा  
नोचते  रहे  वो  चील- कौवों  की  मानिंद 
खेलते  रहे  मेरे  जिस्म  के  साथ  हैवानियत  का  खेल 
फिर मरा जानकर  छोड़ गए मुझे  मेरे  हाल  पर 

मैं  लेकिन  अब  मैं  कहाँ  रह  गयी 
मेरे  जिस्म  पर  उन  नाखूनों  के  निशान
हमेशा  के  लिए  हो  चुके  हरे  ज़ख्म 
पूछते  रहते  मुझसे 
बताते  रहते  मुझको 
जिस्म  नहीं  तेरी  रूह  मसली  गयी  है 
इस तरह से तेरी रूह रो रही है 
तू  जिंदा  नहीं  मर  चुकी  है 
पूछते  रहते  हैं  वो  निशान   
क्या  अब  तेरी  रात  ख़त्म  होगी कभी 
दर्द  से  अनजान  कोई  सवेरा  देखेगी तू कभी 


मेरे  हौसलों  की  सुबह  खो  गयी 
मेरे  दुखों  की  रात  में  मिल  गयी 
किस  तरह  ख़त्म  किया  है  वजूद  मेरा 
चार  पलों  की  तुच्छ  कामपिपासा  के  लिए
इंसानों  ने  हैवानियत  को  भी  शर्मसार कर डाला 
काश मुझे इंसान समझा होता
खुद इंसान होके भी जानवर न बनते 
रक्त,हड्डी,मांस को नोचने में ये कैसी ख़ुशी 
आदमियत के क्या मायने रह गए मेरे लिए 
ज़िन्दगी के हर मंज़र ग़म की छाँव हो गए 
सोचों में भी गहरे ज़ख्म 
आखिर सोचूं भी तो क्या 
कैसे कहूँ मैं भी कभी इंसान थी 
आँख खोलूं या बंद करूँ वोही खौफनाक मंज़र 
क्या दिलासा देके खुद को ढाढस बंधाऊं
अपने आने वाले कल में कैसे खुशियाँ लाऊं
हर  पल  खुद  को  मरते  हुए  देखना  
हर  दिन  उदासी  से  उगा  सूरज  देखना 
और  फिर  लोगों  द्वारा  बदचलनी  के आरोप  
मैं  कैसे  जवाब  दूँ  जब  हिलते  नहीं  होंठ 
कैसे घर से निकलूं जब हर नज़र सवाल करती है






इंसानी  सामाज  का  ये  कैसा  रूप  है 
ये  कैसी  दरिंदगी ,हवस की  कैसी  भूख  है  
बलात्कार  इंसानियत  को  कलंकित  करता  है 
इसका  असर  जिस्म  से  ज्यादा  रूह  पर  होता  है 
आज  समाज  में  नित  बलात्कार  की  घटनाएं  बढ़  रहीं 
न  ही  प्रशासन  न  ही  समाज  को  इसकी  चिंता  सता  रही 
बलात्कार  पीडिता  भी  किसी  की  माँ,.बहन,बेटी  होती  है 
आखिर  क्यूँ  नहीं  बलात्कारी  की  आत्मा  पसीजती  है 
3 साल  की  लड़की  तो  कभी  60 साल  की  औरत  इसका  शिकार  होती 
कितनी  तो  बलात्कारियों  द्वारा  जिंदा  जला  दी  जातीं 
आखिर  कब  तक  ऐसी  ख़बरें अखबारों  की  शीर्ष  पंक्तियाँ  बनेंगी 
आखिर  कब  तब  टीवी  चैनल  में  आखें  ये  वहशत  देखेंगी 
क्यूँ  नहीं  बलात्कारी  को  दण्डित करने  वाली  ख़बरें  दिखाई  जाती 
क्यूँ नहीं समाज को कालिख पोतने वाले इस कुकृत्य पर लगाम लगती 
क्यूँ  बलात्कारी  को  बलात्कार  के  बाद  ही  बेल दे  दी  जाती 
क्यूँ नहीं बलात्कारी के खिलाफ निश्चित कार्यवाही की जाती  
देश का क़स्बा गाँव की कौन कहे जब राजधानी में ही महिलाएं सुरक्षित नहीं 
कार में घसीटने की घटनाएं गुंडों द्वारा पुलिस थाने के बगल में हो रही 
ये कैसी शासन व्यवस्था जहाँ  बलात्कारी जेल जाते ही  छूट  जाते  हैं 
ये  कैसा  समाज  जहाँ  वो  फिर से  येही  कुकृत्य दोहराते  हैं 
कई तो बाहुबली बन डंके की चोट पर अपने इलाके में आतंक मचाते हैं
कई तो नेता बनकर जनता से अपनी महिमा गान कराते हैं
कई जिस्मफिरोशी का धंधा जमा बलात्कार को महिमामंडित करते हैं 
क्या बलात्कार,चोरी,डकैती,खून सभ्य समाज के आभूषण हो गए हैं   
वस्तुवादिता और वासना से ओत-प्रोत हो समाज अपने नैतिक मूल्यों को भूल रहा   
सच्चाई,करुणा,प्रेम,दया,सहिष्णुता,मानवता को समाज भूल रहा 
इन्ही सद्गुणों को आधार बिंदु मानके ऐसी घृणित सोच रुकेगी 
तभी जाके इंसानियत शर्मसार होने से बच सकेगी 
तब जाके स्वच्छ,पारदर्शी व नैतिकता प्रधान समाज का निर्माण होगा 
तब जाके पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का सच्चा सम्मान होगा 






Friday, 11 November 2011

बेटियां


माँ बाप की आँखों का तारा
छोटे भैया का बहन सहारा
बाबुल के आँगन में खेलती हुई
माँ के आँचल में नाक पोंछती हुई
ना उठा पाने पर भी भाई को गोद में लिए
चल देती है बहन कह चल भैया घूमे

बचपन में बहन नहीं जानती ये सवाल


बेटियां क्यूँ चली जाती हैं ससुराल


बेटियां क्यूँ चली जाती हैं ससुराल
 
पढ़ाई लिखाई खुद भी करतीं भैया को भी पढ़ाती

जब परीक्षा आ जाए तो सारे पाठ सुनती
माँ की डांट सुनके भी हंसके गले लग जाती
भैया को डांट पड़े तो बहन नहीं सुन पाती
पिता के आते ही सारे काम काज छोड़ देती  

थके पिता के लिए ले चाय पानी दौड़ पड़ती 


बेटी के रहते जाने कैसे बीत जाते ढेरों साल

बेटियां क्यूँ चली जाती हैं ससुराल


बड़े होते ही माँ बेटी को बताने लगती

जाना है तुझे ससुराल गुण सिखाने लगती
माँ आपको और पापा को छोडके मैं नहीं जाऊँगी
आप भी नहीं रह पायेंगे मैं भी नहीं रह पाऊँगी
लेकिन लेके डोली जब आते हैं दुल्हे राजा
माँ अपने अंक में भर लेती हैं कहके बेटी ना जा

पिता अपने अश्रुओं को छुपा होता बेहाल


बेटियां क्यूँ चली जाती हैं ससुराल

जब कभी भी मायके का नाम सुनती

बेटी अपने ह्रदय में माँ-बाप का नाम सुनती
जब कभी कोई मायके से आ जाता है
दिन वोही होली दिवाली उसका हो जाता है
माँ से लिपटके रोती है जाने नहीं देती
ससुराल में हूँ ये सोचके आसूं बहने नहीं देती 

आखिर भीग जाते हैं आँखें और गाल


बेटियां क्यूँ चली जाती हैं ससुराल



पिता के लिए बेटी हमेशा बिटिया ही रहती 

दूर होके भी बेटी  हाल चाल ले ही लेती
माँ कुछ भी बेटी के पसंद का बनाती उदास हो जाती 
येही कहती अभी बिटिया होती तो साथ खाती
माता पिता को तो अपना कष्ट बताने की आदत नहीं रहती
लेकिन ससुराल में रहके भी बेटी बिन बताये जान जाती

दवाई की हिदायतों को माँ बाप नहीं पाते टाल

बेटियां क्यूँ चली जाती हैं ससुराल 

Friday, 4 November 2011

ईश्वर भी लड़का लड़की में भेद-भाव नहीं रखता


क्या कुसूर था मेरा
जो मैं दुनिया भी न देख पायी
मम्मी मैं तुमसे पूछती हूँ
क्या बता सकती हो
पापा आप को याद है
कैसे सुहाने नाम आपने रखे थे
मम्मी के साथ मिलके
मेरे और भैया दोनों के
कितने सपनो में खो गए थे
आप दोनों
जानते हैं मैं उस वक़्त हंस रही थी


जब आप और मम्मी
मीठी मीठी लड़ाई कर रहे थे
आप कहते पहले लड़का
और मम्मी कहती क्या पता
और मैं सोच रहती थी
अरे अभी तो मैं आ रही हूँ
आते ही आप दोनों को
ख़ुशी से निरुत्तर कर दुंगी
और फिर भैया को भी ले आउंगी
लेकिन मुझे नहीं मालूम था
जो आप माँ को कह रहे थे
'देखो पहले लड़का ही आना चाहिए'

 
नहीं जानती थी मैं 
आप मेरे आने से पहले मुझसे
ऐसी नफरत करेंगे
दुनिया में ही नहीं आने देंगे
मम्मी तुम दुखी न हो
मुझे भी दुःख होता है
पर माँ तुम चाहती तो मैं
जन्म ले सकती थी
तब तुमने ऐसा क्यूँ नहीं चाहा
माँ तुम्हे याद है
मैं जब पेट में थी
तुम प्यार से मुझे छूती थी
माँ मुझे तुम्हारा स्पर्श
बहुत प्यारा लगता था
मैं सोचती थी एक दिन
इन्ही हाथों में झूला झूलूँगी
माँ आपने पापा ने ऐसा क्यूँ किया
लड़की हूँ इसलिए पैदा नहीं किया
मम्मी आपने मुझे इतने दिन पेट में रखा
मेरे साथ कितनी सारी बातें की 

मेरे लिए वो ख़ुशी भी कम नहीं
मम्मी बातें मैं भी आपके साथ करती थी
आप सुन नहीं पाती थी
जब पापा आपको तैयार होने को कहते
मैं झूम जाती थी घूमने की सोच के
रातों को आप दोनों की प्यारी प्यारी लोरियां
माँ मैं कैसे भूल जाऊं वो थपकियाँ
मुझे लगता था बाहर की दुनिया
कितनी अच्छी प्रेम से सराबोर है
मैं जल्दी से जल्दी
दुनिया में आना चाहती थी
मुझे क्या मालूम था ये दुनिया
मुझे नहीं चाहती थी
माँ मैं दहल गयी थी उस दिन
जब सुना की पापा मुझे मारना चाहते
मर तो मैं उसी वक़्त गयी थी
जीने की इच्छा जो नहीं रह गयी थी
मैं खुद भी इस निर्दयी,क्रूर समाज
को नहीं देखना चाहती थी
मैं खुद भी बनावट और पशुत्व
प्राप्त नहीं करना चाहती थी
माँ वैसे पशु भी ऐसा कहाँ करते हैं
बच्चों में भेदभाव कहाँ रखते हैं
एक तरह से धन्यवाद तुम्हारा माँ
मुझे ऐसे जगत में ना आने देने का
माँ तुम भी तो नारी हो और फिर भी
तुमने मेरी ज़िन्दगी मुझसे छीन ली
माँ-पापा जीवन तो परमात्मा देता है
फिर आप लोगों ने मुझे मृत्यु क्यूँ दे दी
खैर माँ मैं जा रही हूँ
आपको ख़ुशी मिले येही प्राथना है
मैं न आ सकी मेरा भैया आये येही दुआ है
माँ मैंने तो भैया के साथ जाने कितने
सोचे रखे थे खेल जो हमे थे खेलने
माँ पापा हो सके तो एक वायदा करो
जो भैया की जगह बहन आई
तो उसे आने देना
अपने उपवन को महकाने देना
अपने जीवन की फुलवारी में खेलने देना
उसकी तोतली बोली में दुनिया की बनावट भुला देना
मैं समझूंगी मैं ही दुबारा दुनिया में आ गयी
माँ पापा बोलो आप ऐसा करोगे ना
कभी भी लड़के लड़की में भेद नहीं करोगे ना 
नारी के बिना इस सृष्टि  का आस्तित्व नहीं होता
ईश्वर भी लड़का लड़की में भेद-भाव नहीं रखता 




Thursday, 3 November 2011

जिन माता पिता ने पाला पोसा



 

जिन माता पिता ने पाला पोसा
हम उनको ही भुला देते हैं
जिनके आँचल में पले बढे
हम उसे ही बिसरा देते हैं
जिन्होंने हसना सिखाया हमको
रोये तो मनाया हमको
कितनी आसानी से हम
उनको ही रुला देते हैं

जिन माता पिता ने पाला पोसा
हम उनको ही भुला देते हैं

बचपन में कुछ मालूम न था

ख़याल माँ बाप को रखना था
पर बड़े हुए तो जग देखा
अहम् का नया सवेरा देखा
आखें छोटी सी लगने लगीं
दुनिया इतनी बड़ी जो दिखने लगी
पर बूढी आखों की रेखाएं
न देखी उनकी निश्छल भावनाएं
उनके विश्वास की रातों की
कालिमा हम बढ़ा देते हैं

जिन माता पिता ने पाला पोसा

हम उनको ही भुला देते हैं


बच्चों को पाला पोसा

जो कर सकते थे वो किया
उनकी किलकारी सुन दिल ने
अपने भी माँ बाप को याद किया
लेकिन वस्तुवादिता के सावन में
सच्चे भाव न उष्मित हो पाए
घर पर आया कोई पूछा ये कौन 
गर्व नहीं घृणा दिखा जाते हैं
जिन्होंने अपनी आँख का तारा समझा
उन्हें गाँव से आये हैं बता जाते हैं


जिन माता पिता ने पाला पोसा

हम उनको ही भुला देते हैं


दिन भर दोस्ती यारी में

शाम बीवी के साथ खरीदारी में
माँ -बाप शामिल नहीं दुनियादारी में
ऊंची इमारत बढ़िया गाडी
माँ-बाप लगते हमे कबाड़ी
कैसे चले जाएँ इसी सोच में हम रहते हैं
पर एक नौकर न कम हो जाये जाने नहीं देते हैं
अपने ताने सास को सुना के भी
बीवी चैन नहीं पाती घर के काम करा के भी
बूढ़े पिता का संबल बनने की भी कौन सोचे
जब दुर्गन्ध आती हो सेवा भावना से ही
आखिर बूढ़े माता पिता को हम
घर से जाने को कह देते हैं


जिन माता पिता ने पाला पोसा

हम उनको ही भुला देते हैं


चल देते हैं वो अनजानी,अनचाही राहों पर

फिर भी नज़र रहती है उनकी बच्चों की दुआओं पर
एक दुसरे को देखते हुए अपने आसूं पोछते हुए
कैसे बताये किसी को अपनों द्वारा ही निकाले हुए
कोई बेनामी की ज़िन्दगी में दम तोड़ जाते हैं
कोई किसी वृद्धा आश्रम में शरण पा जाते हैं
अपने चाँद से टुकड़े को माँ तब भी दिल में रखती है
पिता के दिल से भी अपने पूत के लिए बस दुआ उठती है
नित प्राथनाएं करते वो अपनों की खुशहाली के लिए
जिनसे अंधियारा मिला उनकी नित दिवाली के लिए
भगवान् के पास जाके भी वो
अपना दुखड़ा छुपा जाते हैं

जिन माता पिता ने पाला पोसा

हम उनको ही भुला देते हैं