Friday, 8 July, 2011

Boodha chaand

बूढा चांद

बूढा चांद
कला की गोरी बाहों में
क्षण भर सोया है

यह अमृत कला है

शोभा असि,
वह बूढा प्रहरी
प्रेम की ढाल!

हाथी दांत की

स्‍वप्‍नों की मीनार
सुलभ नहीं,-
न सही!
ओ बाहरी
खोखली समते,
नाग दंतों
विष दंतों की खेती
मत उगा!

राख की ढेरी से ढंका

अंगार सा
बूढा चांद
कला के विछोह में
म्‍लान था,
नये अधरों का अमृत पीकर
अमर हो गया!

पतझर की ठूंठी टहनी में

कुहासों के नीड़ में
कला की कृश बांहों में झूलता
पुराना चांद ही
नूतन आशा
समग्र प्रकाश है!

वही कला,

राका शशि,-
वही बूढा चांद,
छाया शशि है! 


- सुमित्रानंदन पंत (Sumitranandan Pant)

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