Monday 28 November 2011

परमात्मा परमेश्वर हे शंकर हे शम्भू हे जगतपति जगदीश




परमात्मा परमेश्वर हे शंकर हे शम्भू हे जगतपति जगदीश
हे प्रनतपालक हे दयासिन्धु हे भव भंजक तुम सबके अभीष्ट

तू भोला तू अन्तर्यामी सृष्टिकर्ता पालनकर्ता
हे रूद्र तू तप रूप तू ही तप का आश्रय दाता
समुद्र मंथन में निकले विष से जब जग मिटने लगा
हे नीलकंठ कंठ में धारण कर तूने उसे भी अमृत किया
हे उदार,हे शीघ्र प्रसन्न होने वाले जगतपालनहार
गंगा को पृथ्वी पर लाने हेतु जटाओं पर लिया उतार
हे मायातीत हे कालातीत तुम दक्ष प्रजापति को क्षमा करने वाले
हे गुनातीत तुम काली के भी भीषण क्रोध को रोकने वाले
हे हर हे महेश हे भवानीपति तुम्हे ही भजते हैं प्यारे गणपति
हे उदासीन हे कृपासिंधु दीनजनो पर हमेशा करुणा रहती तुम्हारी
मैं पापी कुबुद्धि कपटी कुटिल तनिक देखो प्रभु एक ओर हमारी

हे मनोज मर्दन, तुम्हारे चरणरज से शोभा पाता है गिरीश
परमात्मा परमेश्वर हे शंकर हे शम्भू हे जगतपति जगदीश  



माता पार्वती संग प्रभु ह्रदय में विराजो मेरे
ह्रदय जो शुद्ध न हो तो हरो पाप सब मेरे
श्रद्धा विश्वास का प्रतिरूप आप दोनों वेदों ने गाया है
करो कृपा प्रभु मैंने तो पाप में ही जीवन गंवाया है
जोग जप तप शम दम नियम न जानू प्रभु पूजन भी
उपासना के वक़्त भी प्रभु छोड़ न पाऊं विषय चिंतन ही
प्रभु आप और माता से ही सीता राम की भक्ति मिलती है
और सियाराम की भक्ति से ही आप दोनों की भक्ति मिलती है
सियाराम के सेवक स्वामी सखा हैं आप और माता
आपकी कृपादृष्टि से निर्मल बुद्धि का द्वार है खुल पाता
प्रभु माता गौरी संग प्रभु कार्तिकेय प्रभु गणेश को ध्यान करता रहूँ
ललाट पर चन्द्रमा धरे पभु आपको ह्रदय में धरे नयनो से सींचता रहूँ

अंतःकरण को शुद्ध करो अपनी भक्ति दो हे ईश हे गौरीश
परमात्मा परमेश्वर हे शंकर हे शम्भू हे जगतपति जगदीश








Sunday 27 November 2011

सत्संग

क्या हम ये चिंतन करते हैं की हम किस दिशा में जा रहे हैं और हमारे किये गए कर्मों का हमारे आध्यात्मिक जीवन में क्या स्थान है ?
क्या हमारे किए गए कर्म हमे आध्यात्मिक मार्ग से विमुख कर रहे हैं या हम ठीक जा रहे हैं ?
क्या हम इस बात को सोचते हैं की कोई भी अमर नहीं है एक न एक दिन सभी को जाना है ?
क्या हमने अपनी मृत्यु के बाद के लिए कुछ सोचा है ?
क्या हमे ये मालूम है की अपने कर्म करते हुए भी हम अपने आध्यात्मिक  पथ पर सफल रह सकते हैं ?
क्या हम अपना व अपने विचारों का आंकलन करते हैं ।
क्या हम इस सोच के साथ जीते हैं की प्रति क्षण ईश्वर प्रदत्त है व सत्कार्यों के लिए मिला है ।
अपने जीवन काल के बाद यदि हमे ईश्वर कहे की हे प्राणी मैं ही तो तेरे बंधू बांधव मित्र रिश्तेदार यहाँ तक की जिनसे तू द्वेष रखता रहा उनमे भासता था वो मैं ही था तो हम ईश्वर को क्या जवाब देंगे ।
 

क्या हम कभी ये सोचते हैं की हम क्या कर रहे हैं ?
यदि सोच भी रहे हैं तो हम क्या सोच रहे हैं क्या ये सोचते हैं ?
क्या इससे हमारा कुछ कल्याण हो सकता है ?
कल्याण की असली परिभाषा क्या है ।


मैं कोई बहुत बड़ा ज्ञानी नहीं पठन-पाठन व नेट आदि के आधार पर व अपने थोड़े से अनुभव के आधार पर ही कुछ लिख रहा हूँ


हमारी सोच हमारा नजरिया ही हमारे जीवन का प्रतिनिधित्व करता है
भौतिक सामाजिक जीवन जिसमे हम अर्थ को ज्यादा प्रधानता देते हैं ।
और पारलौकिक
या फिर आध्यात्मिक जिसमे चिंतन व कर्मों में चिंतन के क्रियान्वन की प्रधानता है ।
मेरा मानना है की ज़्यादातर लोग बिना ये सोचे समझे की किस दिशा में चलना है की जगह चलना है इसलिए चल पड़ते हैं अथार्त जीवन निर्वाह कर देते हैं ।
व्यक्ति अपने अगल बगल की दुनिया को देखके बस उसे अनुसरण करने लगता है ।
बस इसी में उसका जीवन निकल जाता है और इस बीच यदा कदा किसी से ज्ञान सम्बन्धी बात सुनके अथवा टीवी आदि पर किसी माध्यम से सत्संग थोडा बहुत पाके भी अपने मन को चिंतन में नहीं लगा पाता क्यूंकि उसे इसकी अहमियत का भान नहीं होता व वो इन्हें प्राथमिकता पर भी नहीं रखता ।
सच्चाई ये है की चार प्रकार के जीव (जरायुज,अण्डज,स्वदेज,उदि्भज) में ये सिर्फ आदमी को ही प्रभु ने इस तरह चिंतन करने योग्य बनाया है की वो विवेक की प्रधानता से अपने जीवनकाल में ही जीवन्मुक्त हो सकता है।

रामायण में आया है


एही तन कर फल विषय न भाई
स्वर्गाऊ स्वल्प अंत दुखदायी
नर तन पाई विषय मन देहि पलटी सुधा ते सठ बिष लेहीं      (उत्तरकाण्ड)

अथार्त इस मानव शरीर का उद्देश्य विषय सेवन नहीं है और स्वर्ग भी व्यक्ति के पुण्य फलों तक ही है और अंत वहां भी दुखदायी है क्यूंकि फिर मनुष्यलोक में आना होगा ।
मनुष्य तन पाके भी अगर उद्धार करने की जगह व्यक्ति विषय सेवन में लगता है तो ऐसे मूर्ख ने अमृत के बदले विष ले लिया ।


गीता में भगवान् ने कहा है


अध्यार ४
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥
भावार्थ :  इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मा में पा लेता है॥38॥

ज्ञान अथार्त व्यक्ति का विवेकयुक्त ज्ञान ही व्यक्ति का सबसे बड़ा गुरु होता है ।
गुरु यानी गु (अँधेरा)+ रु (उजाला) अँधेरे से उजाले की ओर उन्मुख कराने वाला ये सत्य है की सतगुरु अथवा गुरु का गान प्रायः वेदों ने भी किया है परन्तु इस कलिकाल में यदि सच्चा गुरु न भी मिल पाए तो भी अपने विवेक का आश्रय लिए रखना चाहिए व स्वाध्याय तथा सत्संग से उसे निरंतर प्रदीप्तमान रखना चाहिए ।

बिनु सत्संग विवेक न होइ (बालकाण्ड)


कई बार व्यक्ति आध्यात्मिक लक्ष्य को सिर्फ मोक्ष (जीवन चक्र अथार्त योनी भ्रमण से मुक्ति) ही मान लेता है
। 
 इस तरह की और भी जानकारियाँ हमे स्वाध्याय व सत्संग से ही मिल सकती हैं ।मोक्ष से भी बढ़के शास्त्रों ने भक्ति को बताया है ।

देखिये भरत जी का ये दोहा जो उन्होंने अयोध्याकाण्ड में कहा है


अर्थ न धरम न काम रूचि गति न चहहूँ निर्बान
जनम जनम रति राम पद ये बरदान न आन


इनके साथ साथ अथार्त स्वाध्याय व सत्संग के पठन -पाठन  के साथ साथ श्रवण का भी बहुत महत्व है क्यूंकि कई बार कोई ब्रह्मज्ञानी टीवी अथवा कहीं भी कुछ ऐसी बात बता जाता है जिसे जागरूक व जिज्ञासु

व्यक्ति खूब अच्छी तरह मनन करके  उसके तत्त्व को समझके अपने जीवन में अमल करके परमानन्द की अनुभूति कर सकता है ।

हमारा आत्म तत्त्व जितना ज्यादा प्रबल होगा हम उतना ही अविकारी भाव से संसार को देखेंगे व सांसारिक मान आदि की उतनी कम इच्छा करेंगे

विवेक की समीक्षा हम अपने अंतरमन में अपने द्वारा लोगों व संसार के प्रति किये गए कर्मों से कर सकते हैं

जितना ज्यादा हम तत्त्व ज्ञान (हमारा स्वरुप आत्मा है जो की अविनाशी है अविकारी है ) में स्थित रहेंगे हम दुनिया में अहिंसा,दया,प्रेम,सहिष्णुता,मानवता,शान्ति जैसे सद्गुणों का सन्देश सहज व निष्कामभाव रूप से देंगे  ।परन्तु जितना हम स्वयं को शरीर मानेंगे हम तीनो गुण (सत्व,रज,तम) में से तम गुण प्रधान होते जायेंगे व काम,क्रोध,मद लोभ अहंकार को बढ़ावा देंगे व दंभ,इर्ष्या,परनिंदा,हिंसा,असहिष्णुता व  द्वेष आदि में ही पड़े रहेंगे व निरंतर बीत रहे समय का सदुपयोग नहीं कर पायेंगे प्रत्युत दुरूपयोग करने के कारण पतनोंमुख रहेंगे इस तरह से स्वयं ही आनंद व परमानन्द का स्रोत होते हुए भी हम देहाभिमान से निवृत्त नहीं हो पाएंगे व अपने जैसे ही जीवधारियों से राग अथवा द्वेष में जीवन बिता देंगे अथार्त उनमे मौजूद एक ही तत्त्व आत्मा का अविद्या व अज्ञान से ग्रसित होने के कारण निरूपण नहीं कर पाएंगे व पतनशील रहेंगे


आत्म तत्त्व की कसौटी ज्ञान तो है परन्तु ज्ञान के साथ ज्ञान का अभिमान होने से भी आत्म-तत्त्व क्षीण होने लगता है इसलिए व्यक्ति को ज्ञान के अभिमान से बचना चाहिए


कबीरदास जी ने इस पर कहा है


कबीरा गर्व न कीजिये कबहूँ न हंसिये कोये

अजहूँ नाव समुद्र में का जाने का होये

अथार्त कभी भी ज्ञान पाके व्यक्ति को अभिमान नहीं करना चाहिए व किसी की हंसी नहीं उडानी चाहिए क्यूंकि आज भी नाव पानी में है यानी ज़रा सी भी असावधानी व्यक्ति की मन बुद्धि को पतंग्रस्त कर सकती है व
अब तक के उसके सद्कर्मों व सदमार्ग से विमुख कर सकती है

गीता में भी दूसरे अध्याय में भगवान् कहते हैं -


इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥

 भावार्थ :   क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु 
हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय व्यक्ति की बुद्धि को हर लेती है॥67॥

इसी तरह से संपूर्ण सृष्टि भगवान् का ही अंग है व समभाव में स्थित रहने को भगवान् श्रेष्ठतम संज्ञा देते हुए तेरहवें अध्याय में कह रहे हैं 


यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥

भावार्थ :  जिस क्षण यह पुरुष भूतों (जीवों )के पृथक-पृथक भाव को एक परमात्मा में ही स्थित तथा उस परमात्मा से ही सम्पूर्ण भूतों(जीव,सृष्टि) का विस्तार देखता है, उसी क्षण वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है॥30॥


तत्त्व ज्ञान निरन्तर बढ़ता रहे अथार्त उसमे हमारी बुद्धि निरंतर दृढ रहे ये हमारे उपासना करने के ऊपर भी निर्भर करता है क्यूंकि उपासना रुपी पानी का क्षेत्र तो प्रभु ने प्रदान किया परन्तु क्या हम बुद्धि रुपी औज़ार से भक्ति रुपी पानी निकाल कर मन को निर्मल कर पा रहे हैं


भगवान् के सामने मात्र दिखावा करके या सांसारिक व विषय चिंतन करते हुए काफी देर पूजा-पाठ करने से अच्छा है व्यक्ति कुछ समय ही लगाये परन्तु श्रद्धायुक्त होके प्रभु का स्मरण करे

और ऐसा करते हुए यदि वो पूजा-पाठ करे तो वो उपासना पथ पर सफल है इतना ही नहीं स्वयं व्यक्ति को भी लगता है की आज प्रभु का सुमिरन या उपासना अच्छी हुई प्रसाद लगाते समय भी
उसका भाव ये होना चाहिए की स्वयं प्रभु आये हुए हैं
। 
 भगवान् ने कहा भी
 

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
भावार्थ :  जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुणरूप से प्रकट होकर प्रीतिसहित खाता हूँ॥26॥

इसी तरह से पाठ करते हुए उसे समझते भी जाना चाहिए व इन सबसे अधिक ज़रूरी है की सद्ग्रंथों के वचनों का जीवन में अमल भी करना चाहिए

विषय चिंतन के अलावा उपासना में सबसे अधिक व्यक्ति को प्रभु से विमुख करते हैं दुःख,ग्लानी व मायिक मन बुद्धि द्वारा प्रभु चिंतन कैसे हो ये सोच

मन बुद्धि मायिक भी होते हैं और अलौकिक भी व्यक्ति को वैसे हर वक़्त प्रभु का सुमिरन करते रहना चाहिए परन्तु पूजन करते समय खासकर प्रभु से आर्तभाव से शरणागति की विनती करनी चाहिए क्यूंकि बिना हरि कृपा के माया नहीं जाती

क्रोध मनोज लोभ मद माया
छूटहीं सकल राम की दाया(अरण्यकाण्ड)

इसके साथ साथ इस श्लोक का मनन सदैव करता रहे


तीसरा अध्याय -



इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ 
भावार्थ :  इन्द्रियों को स्थूल शरीर से पर यानी श्रेष्ठ, बलवान और सूक्ष्म कहते हैं। इन इन्द्रियों से पर मन है, मन से भी पर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है॥42॥  

एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्‌ ॥ 
भावार्थ :  इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म, बलवान और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो! तू इस कामरूप (कामना रूप )दुर्जय शत्रु को  मार डाल(वश में कर)॥43॥

जैसे ही हमे ये भान होता है की आत्मा ही चेतन है व आत्मा की ही सत्ता है और मन बुद्धि जो हमेशा व्यक्ति को मूर्खता रुपी मोह माया से बद्ध रखते हैं आत्मा से ही प्रकाशित होते हैं हम अपने स्वरुप में स्थित हो जाते हैं और तभी अध्यात्मिक जगत में सही दिशा में हम अपना पहला सफल कदम बढ़ा पाते हैं
।  इसके बाद धीरे धीरे स्वतः आत्म-तत्त्व निरंतर सदचिंतन,स्वाध्याय व सत्संग करते रहने से प्रखर होता जाता है ।

Friday 25 November 2011

मोह माया तृष्णा काम क्रोध मद इनमे फंसा है ये प्राणी


मोह माया तृष्णा काम क्रोध
मद इनमे फंसा है ये  प्राणी
प्रभु तेरी कृपा बिना अज्ञानी है स्वयं अँधेरा है ये प्राणी

चौरासी लाख योनी के बाद मानव तन है मुझको मिला

अबकी भी न जीवन गवा दूँ प्रभु डरता है ये प्राणी

मैं कपटी परनिंदा अपनी प्रशंसा में जीवन बिता रहा

हे गुनातीत कब जपूंगा तुझे पूछता है ये प्राणी

जीवन क्या है पानी का बुलबुला कब न ख़त्म हो जाए

देना मुझे विवेक प्रभु येही चाहता है ये प्राणी

नहीं चाहिए धन दौलत नहीं चाहिए ये मायिक मान

हो तेरे चरणकमल में प्रेम मांगता है ये प्राणी

जगत मिथ्या है ये सोचकर ही जगत में रहूँ प्रभु

संसार केवल भटकाता है और भटकता है ये प्राणी

हे सृष्टिकर्ता हे सर्वव्यापक तुने ही संसार रचा है

दुनिया को सत माना अविधा का पुलिंदा है ये प्राणी

हे प्रभु राम राम कृष्ण कृष्ण में जिंदगानी ये बीते मेरी

तू परमात्मा है हे अन्तर्यामी और आत्मा है ये प्राणी

हे कौशल्यानंदन हे यशोदानंदन अपना दास बना लो

चाहता अपनी कविताओं में तुम्हे भरना है ये प्राणी

प्रभु निर्गुण सगुन में भेद ना मानु ऐसी भक्ति पाऊं

प्रशंसा से भटकूँ न नहीं चाहता प्रशंसा है ये प्राणी



Wednesday 23 November 2011

आदमी आदमियत से मुंह मोड़ रहा है



आदमी आदमियत से मुंह मोड़ रहा है
और खुद को इंसान कहला रहा है

परमाणु बम की खेप सजाये हर देश
जोर शोर से शान्ति का सन्देश दे रहा है

धर्म मज़हब के नाम पर क़त्ल-ओ-आम
और अल्लाह को ईश्वर को रिझा रहा है

देश के नेता देश को बेच रहे हैं
जनता को फिर भी चुनाव भा रहा है

घर में अच्छे संस्कार देने की जगह
वृद्धा आश्रम की नीव बना रहा है

मंहगाई ने तोड़ दिए कितने आशियाने
स्विस बैंक नेताओं की रकम बता रहा है

थानों के बगल में गुनाह हो रहे है
आदमी १५ अगस्त की परेड में जा रहा है

आस्था संस्कार को ब्लाक करके
ऍफ़ टीवी पर वासना दर्शन कर रहा है

घर पर गाय के दूध की जगह डिब्बे का
स्वयं शराब-बिअर का ग्रास बन रहा है

सत्संग से मन बुद्धि महकाने की जगह
बीडी सिगरेट से आत्म हनन कर रहा है

अपने में सुधार करने की जगह
औरों की खामियों का बखान कर रहा है
 

उपासना के वक़्त भी विषयों का चिंतन 
साधन को ही साधना समझ रहा है 

आत्म तत्त्व प्रखर हो भी कैसे
राग द्वेष में नित स्वयं को बाँध रहा है

परमानन्द मिलता है उसे 'प्रताप'
जो स्वयं का स्वरुप शरीर नहीं मान रहा है

Monday 21 November 2011

माँ



रमेश आज फिर ऑफिस के लिए देर हो रहा था
रात देर तक ऑफिस के काम ही निपटाता रहा और इस समय उसे सिर्फ ऑफिस जल्स से जल्द पहुँचने की देरी थी
तभी माँ ने कहा- बेटा !
रमेश - माँ ! कल गाडी बनवाने लगा था आज दवाई ले आऊंगा
माँ- अच्छा बेटा
तभी उसकी पत्नी सविता ने आकर उसे एक बड़ा थैला पकडाया
सुनो जी सर्दी आ गयी है इसे लानडरी में देते आना और हाँ  आज राहुल के स्कूल में पेरेंट्स मीटिंग है तो मैं चली जाउंगी आप ऐसा करना की जेवेलर के यहाँ से जो हार पड़ा है लेते आइयेगा
सविता को शायद इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता था की वो रमेश को माँ की दवाई के बारें में भी कह दे या कदाचित सविता अधिकतर रमेश को उसकी माँ के सामने ऐसे ही अपने काम बताती थी
उसका अहम् पुष्ट होता था और वो अपनी सास को ये दिखा देती थी की रमेश पहले उसका काम करेगा और घर की मालकिन सास नहीं बहू है इसलिए घर भी सविता के अनुसार ही चलेगा । रमेश की माँ तो इसे भी बहू की नादानी समझती थी
शाम होते होते रमेश के पास सविता के तीन फ़ोन आ चुके थे और तीनो अलग अलग कामों के
रमेश घर पहुँचने वाला था लेकिन उसे लग रहा था की वो कुछ भूल रहा है
जैसे ही घर के आँगन में कदम रखा की माँ को देखा और उसे याद आ गया की वो दवाई फिर से भूल चूका था
रमेश सीधे माँ के कमरे में गया और दवाई की पोटली देखने लगा
माँ - बेटा क्या हुआ
रमेश -माँ इसमें देखो वो दवाई थोड़ी बची हो तो काम चला लो ,कल ले आऊंगा
माँ - कोई बात नहीं बेटा,कल ले आना
रमेश की पिता को गुज़रे कुछ ही महीने हुए थे उनके रहते हुए रमेश को कभी माँ की इस तरह सुध नहीं लेनी पड़ी पिता स्वयं ही अपना व माँ का ख्याल रखते थे
उनके बाद रमेश पर ही ये ज़िम्मेदारी आ गयी थे जिससे अभ्यस्त होने में शायद उसे कुछ वक़्त की दरकार थी
बहरहाल रमेश ने बड़े ही आत्मविश्वासी ढंग से माँ को आश्वस्त किया की कल वो दवाई ज़रूर ले आएगा
रमेश को भी इस बात का भान था की माँ की दमा की दवाई घर में ना होने पर रात बिरात तबियत खराब होने पर बहुत मुश्किल सामने आ सकती है
अगले दिन रमेश का ऑफिस बहुत सजा हुआ था उसके यहाँ कंपनी के सबसे बड़े अधिकारी आये थे
शाम देर तक मीटिंग्स चलती रहीं लेकिन उस बीच भी बीवी के कामों की फेहरिस्त  एस मेस द्वारा फ़ोन पर पहुँच रही  थे जिनमे से सन्डे को अभी से सिनेमा की टिकटें खरीदना भी था
खैर शाम को घर पहुंचा तो बीवी गेट पर ही प्रतीक्षारत थी आते ही रमेश का हाथ पकड़कर बड़े ही मनोहारी ढंग से कमरे की तरफ ले जाने लगी और उससे पूछने भी लगी -
क्यूँ जी टिकटें ले आये हो न
रमेश - हाँ, लेकिन आज बड़ा स्पेशल ट्रीटमेंट दे रही हो
बीवी - हां,अभी बताती हूँ चलिए चाय पानी कर लीजिये आज आपके पसंद का खाना बना है
तभी रमेश ने माँ के कमरे की तरफ देखा तो बीवी का हाथ छुड़ाके समझा के की अभी आता हूँ माँ के पास जाने लगा
रमेश अपने रुमाल से अपने चेहरे के पसीने को पोछते हुए पहुंचा
माँ अभी सात बजे हैं मैं नौ बजे तक तुम्हारी दवाई ले आऊंगा
माँ- कोई बात नहीं बेटा कल ला देना
रमेश जाने लगा तो माँ बोली - बेटा,कुछ देर रुक जा फिर चले जाना  
माँ उठी और एक कटोरी में कुछ निकाल के ले आई
रमेश- अरे वाह गाज़र का  हलुवा वो भी तेरे हाथ का माँ, क्या बात है
तभी रमेश ने माँ की आखों में देखा और उसे कुछ याद आया
माँ ये तो तुम ख़ास मेरे जन्मदिन पर ही बनाती हो
माँ- हाँ बेटा वोही दिन तो है आज
रमेश की आखें भीग चुकी थी
तभी पत्नी सविता की आवाज़ आई- ऐजी,चाय ठंडी हो रही है
रमेश बड़े आत्मविश्वास से बोला- सविता,खाना भी यहीं ले आना

Friday 18 November 2011

क्या हम अपना ज्ञान दूसरों को आहत करने में भी लगाते हैं ?


आज से सौ साल पहले कैसा था ये जहाँ ?
आज से सौ साल बाद क्या होगा और उसी तरह पांच सौ साल पहले और बाद ?
ये सवाल मेरे ख्याल से बहुत मायने रखता है इसलिए की मेरे हिसाब से ये विवेक को जाग्रत करता प्रश्न है जो स्वयं में ही उत्तर लिए हुए है ।
क्या हम ये सोचते हैं की आज से सौ दो सौ साल बाद हमारे किए गए कर्म की क्या अहमियत होगी ?
हमने जो भी किया अपने जीवन क्या उसका कुछ आगे भी जाएगा ? यहाँ तक की हमारी लिखी कापी नोट-बुक्स के पन्ने पुराने होंगे और फिर राख में मिल जायेंगे ।
क्या हम ऐसा सोचकर अपने कर्मों को करते हैं ?
क्या हमे ऐसा सोचकर अपने कर्मों को करना चाहिए?
ये प्रश्न नहीं है देखा जाए तो ये ही उत्तर है ।

एक सामान्य व्यक्ति अपना जीवन कैसे जीता है - बचपन,जवानी और बुढापा
ब्रह्मचर्य,गृहस्थ,वानप्रस्थ और संन्यास
आश्रम व्यवस्था भी येही कहती है
लेकिन मुद्दा ये नहीं मुद्दा ये है की कैसे जीते हैं
क्या हम विवेकपूर्ण ढंग से जीते हैं ?
यदि विवेकपूर्ण  ढंग से जीते हैं तो कैसा जीते हैं?
और यदि अविवेकपूर्ण ढंग से जीते हैं तो कैसा?

कई बार हम विवेक और ज्ञान पा जाते हैं लेकिन उस पर सही ढंग से अमल नहीं कर पाते या करना चाहते और मैं स्वयं को भी इसी में गिनता हूँ ।

क्या हम अपने थोड़े से सुख के लिए किसी को भी दुःख पहुंचा देते हैं?
क्या हम किसी को आहत करके आनंदित महसूस करते है?
क्या आहत करने से अथार्त किसी को दुःख देने से आनंद मिलता है ?
क्या हम निंदा और दोष्द्रष्टि रखते हैं ?
क्या हम ये जानते हैं की दूसरों के दोषों को देखने पर हमारा नुकसान है व उनकी खूबियों को देखने पर हमारा फायदा होता है?

सभ्य व सभ्रांत समाज में क्या अपने ज्ञान और कौशल से शब्दों द्वारा आहत करना बुद्धिमत्ता पूर्ण माना जाता है।

क्या ऐसे कृत्य को बुद्धिमत्ता पूर्ण मानना चाहिए?


क्या ऐसे कृत्य कायरता या भीरूपन के पर्याय हैं ?

हमने अपने मानक क्या बना लिए है ?
क्या हम अपनी क्षमता और रूचि से अधिक दूसरे को देखके अपना जीवन बनाते हैं ?
क्या हम अपनी कमियों से ज्यादा दूसरे में कमी देखते हैं?
क्या हम अपनी प्रतिस्पर्द्धा अपने साथ रखने के बजाय दूसरों के साथ रखते हैं?

ये प्रश्न हमारे व्यक्तित्व को दर्शाते हैं व हमे आगाह करते हैं येही हमारा आंकलन भी करते हैं ।

क्या किसी व्यक्ति को या समूह की प्रशंसा प्राप्त करके हम अपना कल्याण कर सकते हैं ?
यहाँ तक की कोई बड़ा उद्योगपति है और उसके यहाँ हजारों लोग काम करते हैं लेकिन सच्चाई ये है की उसका असली फायदा उसके स्वयं की भावनाओं और उसके जीवन जीने पर निर्भर करता है ।
व्यक्ति को धन,बल,संपत्ति,सम्पदा उसके भौतिक जीवन में सुख पहुंचा सकती हैं लेकिन उसके आध्यात्मिक जीवन में नहीं । 

मुझे जगद्गुरु कृपालु जी महाराज की ये पंक्तियाँ याद आती हैं जब वो कहते हैं की 'यहाँ सभी भिखारी हैं एक भिखारी दूसरे भिखारी को क्या देगा' 
ये पंक्तियाँ कितनी आध्यात्मिक हैं जो ये बताती हैं की देह,संसार नश्वर (समाप्त होने वाले )है इनमे आनंद नहीं आनंद तो अविनाशितत्व में निहित है ।


सीधी सी बात है की आत्मा जब अविनाशी है,हमेशा के लिए है हमेशा से है तो उसे उसे देह व संसार के सुख जो की प्रतिक्षण घटने वाले व अंत में समाप्त होने वाले हैं उनसे सुख कैसे मिल सकता है उसे तो परमात्मतत्त्व से ही आनंद मिल सकता है जो अविनाशी है व हमेशा के लिए है

कबीर साहब और बुल्लेशाह जैसे संत भी इसी पर जोर देते हैं की हममे अविकारिपन होना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए ।

हमे किसी को दुःख नहीं पहुचाना चाहिए ।वास्तविकता में दूसरों को आहत करके सुख या मान की प्रवृत्ति कायरता भरी सोच है जबकि अहिंसा,परोपकार,सहिष्णुता सद्गुणों को दर्शाते हैं व शौर्य तथा वीरता के लक्षण हैं
 


गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामायण में कहा है-

परहित सरिस धर्म नहीं भाई। परपीड़ा सम नहीं अधमाई  ।।

(दूसरों को सुख पहुचाने के सामान कोई पुण्य नहीं है व दूसरों को कष्ट पहुचाने के सामान कोई पाप नहीं )

वहीँ दोषद्रष्टि न रखने पर नवधा भक्ति के अंतर्गत इसे आंठवी भक्ति बताते हैं -

आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा

(जैसा कर्म फल मिले उसमे संतोष करना चाहिए व दूसरों के दोष सपने में भी नहीं देखने चाहिए )

कबीरदास जी भी कहते हैं   बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिल्या कोय । जो मन खोजा आपना, तो मुझसे बुरा न कोय।।

अथार्त मैं दूसरों में दोष देखता रहा लेकिन मुझे दोष नहीं मिले लेकिन जब मैंने स्वयं का विश्लेषण किया तो जाना की दोष तो मेरी द्रष्टि मेरी सोच अथार्त मेरे में निहित है

इसलिए हमे किसी में दोष नहीं देखने चाहिए व मन,वचन,कर्म से कभी भी किसी को दुःख नहीं पहुचाना चाहिए

 

व्यक्ति के हाथ में उसकी इन्द्रियाँ है जो मन बुद्धि द्वारा संचालित होती हैं
यदि हम सिर्फ मन बुद्धि को ही आनंद का पैमाना मानेंगे तो फिर निश्चित ही तमोगुणी होंगे अथार्त हमारे में विकार आते जायेंगे
यही विवेकपूर्ण तथ्य है जो सुनने में आसान लगता है पर समझने व अनुभव करने में थोड़ी देर में समझ में आता है
मूलतः मैं यही कहना चाहता हूँ की हमारा स्वरुप आत्मा है जो की अविनाशी है इसलिए उसे इन्द्रिय सुख से सुख मिलेगा ऐसा समझना ही नासमझी है
क्यूंकि अविनाशी को अविनाशी से ही सुख मिल सकता है अथार्त आत्मा (अंश)को परमात्मा(अंशी) से ही सुख मिल सकता है
हम जितना विकाररहित तत्त्व की तरफ बढ़ेंगे अपने आत्म-तत्त्व को प्रखर करेंगे व जितना विकार (काम,क्रोध,द्वेष,इर्ष्या,दंभ) की तरफ बढ़ेंगे उतना ही हमारा आत्म-तत्व दर्पण पर लगे धूल की भांति होगा |
हम अपने कर्मों को करते हुए कर्मफल की चिंता से यदि मुक्त रहें व अपनी आत्मा को प्रकाशक जानकर की समस्त इन्द्रिय,मन,बुद्धि आत्मा से ही संचालित(प्रकाशित) होते हैं आसानी से स्वयं पर संयम रख सकते हैं 
व कर्म करते हुए भी कर्मफल के बंधन से मुक्त रह सकते हैं

Wednesday 16 November 2011

औचित्यहीन होती मीडिया और दिशाहीन होती पत्रकारिता




 
मीडिया समाज की स्वतंत्रता और नैतिकता को पुष्ट करता है
पत्रकारिता द्वारा भी इसी तरह समाज का हित होता है
इसीलिए ये लोकतंत्र का चौथा खम्बा कहलाते हैं
न्याय,समता से ये समाज का नेतृत्व करते हैं
ऐसे पत्रकारों को दिल से नमन दिल से सलाम
ऐसे मीडियाकर्मियों को भी  ह्रदय से प्रणाम

परन्तु क्या आज मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहा

कहीं लोकतंत्र का ये खम्बा खोखला तो नहीं हो रहा
वास्तविकता ये है सच्चाई पर लिखने वाले कम हो गए हैं
अधिकतर स्वार्थ व वस्तुवादिता की आंधी में बह गए हैं
आज की मीडिया समाज को सही दिशा दे भी तो कैसे
जब खुद ही वो सही रास्ते पर नहीं चल रही है 

अपने मानकों को छोड़कर व्यापार का केंद्र हो गयी है
जनता मंहगाई,गरीबी,अशिक्षा,आतंकवाद,बुखमरी से मर रही
लेकिन मीडिया तो विज्ञापनों से जेब भर रही 
देश वैमनस्यता,बिखराव,विभाजन की राह पर है  
कोई तेलंगाना,कोई उत्तरप्रदेश को तोड़ने पर आमादा है
कोई कश्मीर,कोई महाराष्ट्र में अलगाववाद फैला रहे
कोई नक्सलियों के साथ मिलकर देश को बेच रहे
ऐसे लोगों पर ऐसे कृत्यों पर मीडिया क्यूँ चुप है
आखिर समाज हित के मुद्दों पर कलम खाती क्यूँ जंग है
 

आज पूरे देश में अराजकता व अपराध की बाढ़ सी आई है
बलात्कार,अपहरण,चोरी-डकैती,हत्या वालों की बन आई है
कहीं छुप के तो कहीं खुलेआम बहु बेटियों की इज्ज़त लूटी जा रही 
कहीं जिस्म के सौदागरों द्वारा रोज़ ही ये बेचीं जा रही
बाल-श्रम,दहेज़-हत्या,कन्या-भ्रूण हत्या समाज को अभिशापित कर रहे 
सामाजिक हित से जुड़े मुद्दे कलम से सियाही नहीं पा पा रहे 
मीडिया की प्राथमिकता से ये जैसे खोते जा रहे    
समाज सेवा ही मीडिया का धर्म मीडियाकर्मी नहीं जान पा रहे
भ्रष्टाचार पर भी मीडिया का रुख गोल मोल सा ही लगता 
अन्ना,रामदेव के मुद्दों की जगह इनका ध्यान इनके व्यक्तित्व की तरफ ज्यादा रहता   


खुलके के शराब बेचीं जा रही,जुओं की मंडली सज रही
कहीं तस्करी की छाँव में ए क ४७,कहीं अफीम मिल रही
कहीं नेता की गाडी के चक्कर में बीमार अस्पताल नहीं पहुँच पाता

कितने शहर बाढ़ से डूबे हुए हैं

कितने शहर सूखे में पड़े हुए है
कहीं चीन ने खिलौनों की मार्केट पर भी कब्ज़ा कर लिया है
और उसी ने अरुणाचल में गोरखधंधा किया हुआ है
सीमापार आतंकी कैंप चल रहे हैं
देशवासियों को मारने के प्लान बन रहे हैं
हर कुछ दिन पर धमाके हो रहे
अब तो अदालत के सामने ही लोग मर रहे
किसानो की ज़मीन नेता ही छीने जा रहे
लेकिन अखबारवाले इसे छाप नहीं पा रहे
प्रिंस के गड्ढे में गिरने पर ढाई दिन लगातार कवरेज किया जाता
लेकिन गंगापुत्र निगमानंद को मीडिया ढाई मिनट नहीं दिखा पाता
देश व समाज से से जुड़े मुद्दों पर अधिकतर पत्रकार लिख नहीं पा रहे
क्यूंकि शायद इससे वो अपना निजी फायदा होता नहीं देख रहे
निडरता की जगह बेशर्मी ने ले ली है और कुशलता की जगह चाटुकारिता ने
खबर की जगह अहमियत स्वार्थ ने और संवेदनशीलता की संवेदनहीनता ने

अधिकतर न्यूज़ चैनेल्स के प्रोडूसर जैसे पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड हो गए  

पैसा नहीं समाज हित है पत्रकारिता इस सिद्धांत को भूल चुके हैं
कभी पुराने पत्रकारों के कौशल का ग़लत फायदा उठाके
कभी नेताओं को आपस में ही टीवी पर लड़ा के
जोर रखते हैं टी आर पी की रेटिंग  पर
बार बार ब्रेक लेते हैं ये विज्ञापन के लिए
तरसता है आम इंसान अदद खबर के लिए
अखबार भी ख़बरों की गुणवत्ता बाद में पहले विज्ञापन की लिस्ट देखते हैं
किसी मंत्री या पुलिस अधिकारी वाले के फ़ोन पर ही खबर छुपा जाते हैं
इसी तरह न्यूज़ चैनेल्स भी राजनीति के प्रभाव में दिखते हैं
समाज हित की ख़बरें तो ये बहुत बाद में रखते हैं 

 

क्यूँ नहीं दिखा पाते ये देश में बढ़ते हुए अपराधों का ग्राफ
क्यूँ नहीं बता पाते कारण कैसे रुक सकेगा अपराध
क्यूँ मीडिया आत्मदाह से रोकने के बजाय उसे शूट करता
क्यूँ नहीं पत्रकार निगमानंद जैसे लोगों के अनशन पर  लिखते
निज स्वार्थ हेतु गंगापुत्र कहते हैं जब वो जान दे चुके होते
आज पत्रकारिता  का समाज की बुराइयों को दूर करने में कितना योगदान है
सोचना होगा क्या लोकतंत्र का ये चौथा खम्बा अपने पथ पर महान है
देश में बाढ़,सूखे,मंहगाई,बेरोज़गारी की जगह मीडिया में चमक दमक ने ले ली
आज कौन से फिल्म स्टार को आना है स्टूडियो में बाकी क्रिकेट की कवरेज ने ले ली
आज अधिकतर नाम और रौब पाने के चक्कर में मीडिया लाइन से जुड़ते हैं
पत्रकारिता कम लोग करते हैं अधिकतर तो आम जनता पर ही रौब कसते हैं
कोई पैसों के चक्कर में पड़ा रहता है कोई झूठे अहम्  से बाहर नहीं निकल पाता है
कोई देश व समाज के दुश्मनों से ही इन वजह से सांठ - गाँठ कर जाता है
कोई अन्दर ही अन्दर धर्म,जाति की राजनीति में लगा होता है
कोई किसी नेता या पार्टी की ही जय जयकार में लगा होता है
कोई किसी हवलदार से पेट्रोल डलवाता कोई किसी व्यापारी को पकड़ता
बड़ी आसानी से तुच्छ दामों पर अमूल्य ख़बरों का सौदा हो जाता
वस्तुवादिता व वासना का निडरता से मुकाबला एक सच्चा पत्रकार करता है
धन,बल,दंभ,अहम्,कंचन,कामिनी में पड़कर अपने उद्देश्य से नहीं भटकता है        
सच्ची पत्रकारिता का सिर्फ एक उद्देश्य होता है समाज हित व समाज सेवा
अच्छी मीडिया का आंकलन तो समाज में घटते अपराध से ही होगा
इसके लिए व्यक्तिगत स्तर पर समीक्षा व क्रियान्वन की आवश्यकता है
सत्य,इमानदारी,निडरता,निस्वार्थता,सौहार्द व समाज हित ही पत्रकारिता के आधार हैं
येही बिंदु मीडिया की दिशा व दशा तय करने के आधार हैं,इन्ही से होना उद्धार है  

Sunday 13 November 2011

बलात्कार







चली  जा  रही  थी  मैं  
अचानक चार  लोगों  ने  मुझे  रोका 
मुझे  घसीटा  और   दरिन्दे  बन  बैठे  
चीखती  रही  चिल्लाती  रही  मैं 
अपनी अस्मत की भीख मांगती रही मैं  
लेकिन  उससे  उन्हें  कोई फर्क न पड़ा  
नोचते  रहे  वो  चील- कौवों  की  मानिंद 
खेलते  रहे  मेरे  जिस्म  के  साथ  हैवानियत  का  खेल 
फिर मरा जानकर  छोड़ गए मुझे  मेरे  हाल  पर 

मैं  लेकिन  अब  मैं  कहाँ  रह  गयी 
मेरे  जिस्म  पर  उन  नाखूनों  के  निशान
हमेशा  के  लिए  हो  चुके  हरे  ज़ख्म 
पूछते  रहते  मुझसे 
बताते  रहते  मुझको 
जिस्म  नहीं  तेरी  रूह  मसली  गयी  है 
इस तरह से तेरी रूह रो रही है 
तू  जिंदा  नहीं  मर  चुकी  है 
पूछते  रहते  हैं  वो  निशान   
क्या  अब  तेरी  रात  ख़त्म  होगी कभी 
दर्द  से  अनजान  कोई  सवेरा  देखेगी तू कभी 


मेरे  हौसलों  की  सुबह  खो  गयी 
मेरे  दुखों  की  रात  में  मिल  गयी 
किस  तरह  ख़त्म  किया  है  वजूद  मेरा 
चार  पलों  की  तुच्छ  कामपिपासा  के  लिए
इंसानों  ने  हैवानियत  को  भी  शर्मसार कर डाला 
काश मुझे इंसान समझा होता
खुद इंसान होके भी जानवर न बनते 
रक्त,हड्डी,मांस को नोचने में ये कैसी ख़ुशी 
आदमियत के क्या मायने रह गए मेरे लिए 
ज़िन्दगी के हर मंज़र ग़म की छाँव हो गए 
सोचों में भी गहरे ज़ख्म 
आखिर सोचूं भी तो क्या 
कैसे कहूँ मैं भी कभी इंसान थी 
आँख खोलूं या बंद करूँ वोही खौफनाक मंज़र 
क्या दिलासा देके खुद को ढाढस बंधाऊं
अपने आने वाले कल में कैसे खुशियाँ लाऊं
हर  पल  खुद  को  मरते  हुए  देखना  
हर  दिन  उदासी  से  उगा  सूरज  देखना 
और  फिर  लोगों  द्वारा  बदचलनी  के आरोप  
मैं  कैसे  जवाब  दूँ  जब  हिलते  नहीं  होंठ 
कैसे घर से निकलूं जब हर नज़र सवाल करती है






इंसानी  सामाज  का  ये  कैसा  रूप  है 
ये  कैसी  दरिंदगी ,हवस की  कैसी  भूख  है  
बलात्कार  इंसानियत  को  कलंकित  करता  है 
इसका  असर  जिस्म  से  ज्यादा  रूह  पर  होता  है 
आज  समाज  में  नित  बलात्कार  की  घटनाएं  बढ़  रहीं 
न  ही  प्रशासन  न  ही  समाज  को  इसकी  चिंता  सता  रही 
बलात्कार  पीडिता  भी  किसी  की  माँ,.बहन,बेटी  होती  है 
आखिर  क्यूँ  नहीं  बलात्कारी  की  आत्मा  पसीजती  है 
3 साल  की  लड़की  तो  कभी  60 साल  की  औरत  इसका  शिकार  होती 
कितनी  तो  बलात्कारियों  द्वारा  जिंदा  जला  दी  जातीं 
आखिर  कब  तक  ऐसी  ख़बरें अखबारों  की  शीर्ष  पंक्तियाँ  बनेंगी 
आखिर  कब  तब  टीवी  चैनल  में  आखें  ये  वहशत  देखेंगी 
क्यूँ  नहीं  बलात्कारी  को  दण्डित करने  वाली  ख़बरें  दिखाई  जाती 
क्यूँ नहीं समाज को कालिख पोतने वाले इस कुकृत्य पर लगाम लगती 
क्यूँ  बलात्कारी  को  बलात्कार  के  बाद  ही  बेल दे  दी  जाती 
क्यूँ नहीं बलात्कारी के खिलाफ निश्चित कार्यवाही की जाती  
देश का क़स्बा गाँव की कौन कहे जब राजधानी में ही महिलाएं सुरक्षित नहीं 
कार में घसीटने की घटनाएं गुंडों द्वारा पुलिस थाने के बगल में हो रही 
ये कैसी शासन व्यवस्था जहाँ  बलात्कारी जेल जाते ही  छूट  जाते  हैं 
ये  कैसा  समाज  जहाँ  वो  फिर से  येही  कुकृत्य दोहराते  हैं 
कई तो बाहुबली बन डंके की चोट पर अपने इलाके में आतंक मचाते हैं
कई तो नेता बनकर जनता से अपनी महिमा गान कराते हैं
कई जिस्मफिरोशी का धंधा जमा बलात्कार को महिमामंडित करते हैं 
क्या बलात्कार,चोरी,डकैती,खून सभ्य समाज के आभूषण हो गए हैं   
वस्तुवादिता और वासना से ओत-प्रोत हो समाज अपने नैतिक मूल्यों को भूल रहा   
सच्चाई,करुणा,प्रेम,दया,सहिष्णुता,मानवता को समाज भूल रहा 
इन्ही सद्गुणों को आधार बिंदु मानके ऐसी घृणित सोच रुकेगी 
तभी जाके इंसानियत शर्मसार होने से बच सकेगी 
तब जाके स्वच्छ,पारदर्शी व नैतिकता प्रधान समाज का निर्माण होगा 
तब जाके पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का सच्चा सम्मान होगा 






Friday 11 November 2011

बेटियां


माँ बाप की आँखों का तारा
छोटे भैया का बहन सहारा
बाबुल के आँगन में खेलती हुई
माँ के आँचल में नाक पोंछती हुई
ना उठा पाने पर भी भाई को गोद में लिए
चल देती है बहन कह चल भैया घूमे

बचपन में बहन नहीं जानती ये सवाल


बेटियां क्यूँ चली जाती हैं ससुराल


बेटियां क्यूँ चली जाती हैं ससुराल
 
पढ़ाई लिखाई खुद भी करतीं भैया को भी पढ़ाती

जब परीक्षा आ जाए तो सारे पाठ सुनती
माँ की डांट सुनके भी हंसके गले लग जाती
भैया को डांट पड़े तो बहन नहीं सुन पाती
पिता के आते ही सारे काम काज छोड़ देती  

थके पिता के लिए ले चाय पानी दौड़ पड़ती 


बेटी के रहते जाने कैसे बीत जाते ढेरों साल

बेटियां क्यूँ चली जाती हैं ससुराल


बड़े होते ही माँ बेटी को बताने लगती

जाना है तुझे ससुराल गुण सिखाने लगती
माँ आपको और पापा को छोडके मैं नहीं जाऊँगी
आप भी नहीं रह पायेंगे मैं भी नहीं रह पाऊँगी
लेकिन लेके डोली जब आते हैं दुल्हे राजा
माँ अपने अंक में भर लेती हैं कहके बेटी ना जा

पिता अपने अश्रुओं को छुपा होता बेहाल


बेटियां क्यूँ चली जाती हैं ससुराल

जब कभी भी मायके का नाम सुनती

बेटी अपने ह्रदय में माँ-बाप का नाम सुनती
जब कभी कोई मायके से आ जाता है
दिन वोही होली दिवाली उसका हो जाता है
माँ से लिपटके रोती है जाने नहीं देती
ससुराल में हूँ ये सोचके आसूं बहने नहीं देती 

आखिर भीग जाते हैं आँखें और गाल


बेटियां क्यूँ चली जाती हैं ससुराल



पिता के लिए बेटी हमेशा बिटिया ही रहती 

दूर होके भी बेटी  हाल चाल ले ही लेती
माँ कुछ भी बेटी के पसंद का बनाती उदास हो जाती 
येही कहती अभी बिटिया होती तो साथ खाती
माता पिता को तो अपना कष्ट बताने की आदत नहीं रहती
लेकिन ससुराल में रहके भी बेटी बिन बताये जान जाती

दवाई की हिदायतों को माँ बाप नहीं पाते टाल

बेटियां क्यूँ चली जाती हैं ससुराल 

Wednesday 9 November 2011

अच्छा ठीक है - 2


सुमित अपने मजदूरी के काम से संतुष्ट था उसे इस बात की ख़ुशी थी की वो चोरी या किसी अपराध द्वारा पैसा नहीं कमा रहा और ना ही किसी का अहित करके
शाम को मजदूरी से लौटने के बाद वो अपने बच्चों के साथ दिन बिताता और उनमे भी वो अच्छे संस्कार डालता
वो हमेशा अपने बच्चों को बताता की शान्ति,दया,प्रसन्नता,मानवता,अहिंसा,सहिष्णुता बहादुर व्यक्ति ही धारण करता है
वो उनमे परोपकार,जिजीविषा और कभी भी किसी का अहित न करने की प्रेरणा भरता था ।

उधर भानु को अपने व्यवसाय को अधिक से अधिक बढाने की जल्दी थी उसे याद नहीं रहता था की उसने आखिरी बार अपने बच्चों से कब बात की ।

पत्नी से भी वो येही कहता था की देखो तुम लोगों के लिए ही जोड़ रहा हूँ ।  भानु की शामें अधिकतर बड़े अफसरों के साथ किसी बार में या अपने ही घर पर  जहाँ वो उनसे पैसे  के लेनदेन की बात करता या फिर क्लब में बीतती थी । भानु ने अपने व्यवसाय को बहुत बढाया व उसके मुताबिक उसने सात पुश्तों के बराबर पैसा जोड़ लिया ।  लेकिन भानु ये कभी न सोच पाया की अपने बच्चों के सामने ही दूसरों को रिश्वत देना,घर में शराब पीना ये कहके की ये तो रईसों के ठाठ हैं,बच्चों की पढ़ाई का मतलब सिर्फ बड़े स्कूल को समझना जाने अनजाने कैसा संस्कार वो अपने बच्चों को दे रहा है ।

बहरहाल वक़्त ने पंख लगाये और फिर से घडी २५ साल आगे घूम गयी ।


इधर भानु ने पढ़ाई में कमज़ोर अपने बेटे अंकित को खूब पैसे लगा के बहार विदेश से पढाई कराई थी और इधर सुमित के लड़के महेंद्र ने प्रतिस्पर्द्धी परीक्षा में प्रदेश में बाज़ी मारी थी ।


भानु के लाख कहने पर की अपने ही व्यवसाय को बढाओ अंकित नहीं माना व नौकरी करने पर ही जोर दिया
एक तो पिता से उसकी बनती नहीं थी दूसरा वो अपने पिता को नौकरी द्वारा ही अधिक से अधिक पैसे कमा के दिखाना चाहता था । उधर महेंद्र को अपनी पढ़ाई के आखिरी सत्र से ही बड़ी बड़ी कंपनियों के प्रस्ताव आने लगे ।

संयोगवश दोनों एक ही कंपनी में एक ही पद पर अलग अलग विभाग में नियुक्त हुए । बहुत बड़ा पद था व उसी तरह से उनकी आय ।

कंपनी ने बहुत ख्याल रखा था अपने उच्च अधिकारियों का दोनों को ही मकान व गाडी आदि सब मिले थे । एक तरफ अंकित को इन सबसे कुछ फर्क न पड़ा वहीँ महेंद्र अपने माता पिता को मिले नए घर में लाके,उन्हें हर तरह की ख़ुशी देके बहुत खुश था । अंकित के लिए कंपनी सिर्फ एक पैसे कमाने का माध्यम थी परन्तु महेंद्र के लिए कंपनी की बढोत्तरी प्राथमिकता थी ।

महेंद्र जहाँ नियत समय से १५ मिनट पहले ऑफिस पहुँचता वहीँ अंकित १५ मिनट बाद ।  महेंद्र जहाँ ऑफिस के काम के बाद भी काफी देर तक रहता व अपने अधिकारियों को कंपनी के लाभ के अधिक से अधिक

उपाय सुझाता रहता वहीँ अंकित ऑफिस से १५ मिनट पहले ही निकल पड़ता ।
अंकित और महेंद्र में बातचीत होना लाजिमी थी दोनों ही कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों में से थे । दोनों में ही परस्पर विरोधी स्वभाव होने पर भी ठीक दोस्ती थी क्यूंकि अपने सीधे सौम्य स्वभाव के कारण महेंद्र
शांत व धैर्य से बात सुनता वहीँ पैसे को ही प्राथमिकता पर रखे अंकित अधिकतर आवेश में ही रहता वह महेंद्र के ऐसे स्वभाव पर मन ही मन हँसता और उसे निरा मूर्ख ही समझता था,वह अधिकतर बातों ही बातों में
महेंद्र को कंपनी को चूना लगा के पैसा बनाने की तरफ इशारा करता लेकिन महेंद्र कुछ तो समझ न पाता और कुछ खुद भी हंसके टाल देता ।

सबकुछ ठीक चल रहा था महेंद्र जहाँ अपनी तनख्वाह को बहुत पर्याप्त मानता था वहीँ उससे कहीं ज्यादा पैसा अंकित रिश्वत लेके रोज़ बनाता था फिर भी असंतुष्ट रहता था ।

लेकिन दिक्कत तब आई जब महेंद्र का भी अंकित के विभाग में स्थानान्तरण हो गया ।
एक बहुत बड़े व्यवसायी से बड़ी रकम ले चुके अंकित को मालूम न था की उस व्यवसायी का माल महेंद्र द्वारा गुणवत्ता में ठीक न होने की वजह से रोक दिया जायेगा ।
अंकित ने अनुनय विनय से महेंद्र को मनाना चाहा लेकिन महेंद्र अपने फैसले पर अडिग था, वो इतना बड़ा धोखा अपनी कंपनी के साथ नहीं कर सकता था ।

उस व्यवसायी ने भी महेंद्र को रिश्वत देने का प्रयत्न किया लेकिन महेंद्र न माना ।

उस व्यवसायी का आर्डर रद्द कर दिया गया आखिर अंकित को लिए गए पैसे वापस देने पड़े और उसने उसी वक़्त से महेंद्र को दुश्मन मान लिया ।

अब अंकित के निशाने पर महेंद्र रहने लगा उसने उच्च अधिकारियों के साथ मिलके सबसे पहले तो उसका ऐसे विभाग में स्थानान्तरण कराया जहाँ से उनकी काली कमाई को ग्रहण न लगे ।

इसके बाद महेंद्र पर झूठे आरोप लगवाए व अधीनस्थ  लोगों को भी मिलाके आरोप साबित भी कर दिए ।

महेंद्र नौकरी से निकाल दिया गया ।


उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी की कैसे अपने सत्यप्रिय पिता से झूठ बोले,वो ये नहीं सोच पाता की कैसे अपने पिता को बताये की उनकी सिखाई इमानदारी के बदले में उसे ये मिला है ।

इतना ही नहीं अंकित ने महेंद्र दूसरी जगह भी आसानी से नौकरी न कर पाए इसलिए सभी समान बड़ी कंपनी में सर्कुलर भिजवाया था जिसमे महेंद्र की बेईमानी का बखान था ।

परन्तु सत्य परेशान हो सकता है कभी भी हार नहीं सकता ।  आखिर महेंद्र को फिर से अपने पदानुरूप नौकरी मिली और वो फिर से प्रगति करने लगा ।

लेकिन विधि ने जैसे कुछ और ही लिखा था ।


इधर बेतहाशा पैसे कमाने के बाद बड़ा घोटाला करके अंकित ने नौकरी छोड़ दी व अपने व्यवसाय पर ध्यान देने लगा ।  उसने  जिस प्रमुख अधिकारी के साथ मिलके काली कामायी करी थी उसे भी अपने व्यवसाय में साझेदार बनाया। शुरू में तो सब ठीक थे लेकिन कुछ ही साल में उसे लगने लगा की उसकी कंपनी घाटे में चल रही है लेकिन जब तक वो समझ पाता कंपनी के अधिकतर शेयर का मालिक उसका साझेदार हो चुका था और उसने अंकित को
जालसाजी करके कंपनी से बाहर कर दिया ।

अंकित की पूरी कमाई उसके इसी व्यवसाय में लगी थी और अब वो सड़क पर आ चुका था ।  पिता से अपना व्यवसाय खोलते ही वो अलग हो चुका था इसलिए उनके पास किस मुंह से जाता

उसके अन्दर ये भाव आ गया था की उसने जिस तरह से धोखे से पैसे बनाये थे वे वैसे ही चले गए । उसे ये लगने लगा था की उसके पिता ने भी अगर उसे अच्छे संस्कार दी होते तो वो कम से कम ऐसे हाल पर न होता

कुछ महीने गुज़र गए और अंकित फिर से किसी नौकरी करने की सोच के निकला लेकिन उसके किए हुए घोटालों का सच सामने आ चुका था अतः कहीं  भी उसे काम न मिलता ।
इसी तरह कई जगह से नाउम्मीद होके वो एक और कंपनी में साक्षातकार हेतु गया ।
वहां अपनी बारी आने पर जिस शख्स को उसने सामने देखा वो महेंद्र था । महेंद्र अब तक अच्छा काम करते हुए उस कंपनी के निदेशक पद पर पहुँच चुका था ।
महेंद्र को देखके वो बिना कुछ बोले शर्मिंदगी से वापस लौटने लगा की तभी महेंद्र ने उसे रोका ।

महेंद्र सब समझ चुका था और उसने कुछ भी देर में उसे उसी कंपनी में उसके पदानुरूप पद देकर नौकरी पर रख लिया ।


कहानी कुछ प्रश्न सामने रखती है :


१. क्या बच्चों के संस्कार का उन पर पूरी उम्र असर रहता है ?


२. क्या महेंद्र के खिलाफ अंकित का प्रतिशोध की भावना रखना ठीक था ?


३. क्या अंकित अब दुबारा धोखा नहीं करेगा ?


४. क्या अंकित के ह्रदय में प्रयाश्चित की भावना उपजेगी ?


५. क्या महेंद्र ने अंकित को दुबारा मौका देके ग़लत किया ?


६. क्या अंकित ने जो ग़लत किया वो भानु द्वारा दी गए संस्कार थे ?


७. क्या ये सत्य  है की सत्य परेशान हो सकता है हार नहीं सकता ?


८. क्या हम सबके अन्दर ये दो चरित्र अंकित और महेंद्र या सुमित और भानु हमेशा रहते हैं ?


९.क्या बुराई को अच्छाई से ही दूर किया जा सकता है ?

Sunday 6 November 2011

अच्छा ठीक है



'अच्छा ठीक है" ये शब्द शायद सुमित के तकियाकलाम से थे
विद्यालय में भी जब उसके कक्षा के बच्चों को कोई विषय न मिलता तो वो आपस में इन्ही शब्दों को बोलके हंसी ठिठोली करते
कई बार तो उसका कालर खींचते,कई बार उसे धक्का दे देते और कई बार मास्टरजी से झूठी शिकायत  करके  मार खिलाते
सांतवी  कक्षा का सुमित हंस के सुन लेता था, सह लेता था बल्कि उसे अपने साथियों को आनंदित देख अच्छा लगता था
लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं थी सुमित एक बहुत गरीब घर से आता था और उनके कसबे में सिर्फ येही एक प्राथमिक विद्यालय था अतः
सभी  बच्चे आते थे और धनाड्य  परिवार के ज्यादा थे
सुमित के मनमे पढने की रूचि बहुत थी और उस रास्ते में ये हंसी ठिठोली उसे बुरी  नहीं लगती थी भले वो हमेशा उस ही लेके कर ही हो
और अब तो सुमित को अपने स्कूल में तीन साल हो रहे थे

स्वभाव से ही शांत व प्रसन्नचित सुमित न विद्यालय में और न ही घर में विद्यालय के काम से निजात पा  पाता  कारण की उसके सहपाठियों के
गृहकार्य का भी ज़िम्मा उसी का होता था ऐसा शिक्षक ने नहीं उसके सहपाठियों ने ही अपने रौबवश किया था

ये शायद उसके शांत रहने का जुरमाना था या एक गरीब होके भी अमीरों के साथ एक स्कूल में पढने का दंड

बहरहाल सुमित इन सब बातों से अनभिज्ञ था या शायद रहना ही चाहता था उसे अपने पिता की मार व ज़बरदस्ती मजदूरी करने जाने
से स्कूल में सबसे दबकर रहना उचित प्रतीत होता था

सुमित पढ़ाई में तेज़ था  जब उसके कक्षा अध्यापक कहते की तू 
बड़ा  आदमी बनेगा  तो ये शब्द उसे ऐसे लगते जैसे  उसे हर ख़ुशी मिल गयी


लेकिन ये ख़ुशी चंद दिनों की थी और सुमित का अंदेशा की कहीं उसकी पढ़ाई छूट न जाए सही निकला
बात वार्षिक परीक्षा के दिन की है सभी विद्यार्थी अपना परीक्षापत्र  हल  कर रहे थे लेकिन जिन्होंने साल भर मस्ती की उन्हें तो बस नक़ल का सहारा था
सबको मालूम था एक अन्य सहपाठी भानू नक़ल ले के आया है और सब मास्टरजी से नज़र बचा बचा कर
किताब ले रहे थे और मेज़ में छुपा कर लिख रहे थे
। सुमित चूँकि बीच की पंक्ति में बैठा था या सहपाठियों द्वारा  बैठाया गया था तो उसे न चाह कर भी नक़ल की किताब एक ओर से दूसरी ओर देनी पड़ रही थी। लेकिन ऐसा कब तक चलता आखिर कक्ष-निरीक्षक नज़र किताब पर पड़ गयी और भानू का नाम सामने आने लगा 
लेकिन भानू ने बड़े आत्मविश्वास से दोष सुमित पर मढ़ दिया
सारी कक्षा अवाक थी,सबकी निगाहें सुमित की तरफ थीं और सुमित ने अपना सर झुकाकर इस कुकृत्य की स्वीकृति दे दी
उसकी परीक्षा रद्द कर दी गयी और कुछ दिनों के बाद सड़क हादसे में पिता की मृत्यु हो गयी
सुमित की प्राथमिकताएं बदल चुकी थी अब उसे पढना नहीं अपनी माँ और छोटे भाई और बहन का भरण पोषण करना था
। उसे जो भी काम मिलता कर देता,उसकी आखों से पढ़ाई बहुत दूर हो चुकी थी,ना ही उसमे पढने की इच्छा थी क्यूंकि उसे लगता था पढ़ाई लिखी तो सभ्रांत होने के लिए की जाती और इसके लिए पढने से ज्यादा सीखने और मनन की आवशयकता होती,वैसे सुमित के दिल में अपने सहपाठियों द्वारा किया हुआ कुकृत्य याद आता रहता था,उसका दिल फिर भी उन्हें दोषी नहीं ठहरता उसे दुःख इस बात का था की उसी साल से छात्रवृत्ति की शुरुआत होनी थी और इसके लिए उसने जी-तोड़ मेहनत की थी
बहरहाल वक़्त रुकता नहीं और पंद्रह साल बीत गए



भानू अमेरिका से  ऊँची पढाई कर लौटा था और अपने पिता के भूमि-गृह निर्माण व्यवसाय में हाथ बटाने लगा । वो खुद भी एक बहुत बड़ा मल्टी- काम्प्लेक्स बनवा रहा था 
एक दिन वो अपनी वर्क-साईट पर आया जहाँ उसने देखा की ठेकेदार सभी मजदूरों को पैसे दे रहा था
। एक आदमी को पैसे देते वक़्त वो थोडा चिल्लाने  लगा भानू पास गया तो माजरा समझा । उस आदमी को ठेकेदार ने पांच  दिन के पैसे बकाये किए थे और आज देते समय ठेकेदार चार दिन की ही दिहाड़ी बाकी है ऐसा कहके चार दिन के ही पैसे दे रहा था और वो आदमी जो अपनी बेतरतीब से उगी दाढ़ी के
कारण अपनी उम्र से अधिक लग रहा था ठेकेदार को याद दिला रहा था। भानू को अपने मलिकपने का एहसास हो आया और वो ठेकेदार का पक्ष लेते हुए बोलने लगा ''इस तरह से कोई भी ज्यादा दिन कहेगा तो क्या सच मान लिया जाएगा,देखो ये ठेकेदार ग़लत क्यूँ बोलेगा, ए तुम चार दिन का पैसा ले सकते हो तो बताओ । तुम्हारे हिसाब से सब चलने लगा तब तो ये प्रोजेक्ट बन चुका सारा पैसा तुम्ही लोगों
में खर्च हो जायेगा
। अरे ज्यादा कमाना था तो ज्यादा पढना चाहिए नहीं तो ज्यादा काम करो । हाँ  तो  बताओ तुम्हे चार दिन के पैसे चाहिए की नहीं ।"
उस मजदूर ने सिर्फ इतना कहा ''अच्छा ठीक है'' । ये कहके वो ठेकेदार से पैसे लेके अपनी झोपडी की तरफ चल पड़ा

 



कुछ प्रश्न जो बरबस ही इस कहानी से निकलते हैं :


१. क्या समाज में समान शिक्षा मात्र शैक्षिक पाठ्य-क्रम समान कर देने से हो जाएगी ?

२. क्या बच्चों को बचपने से ही अमीरी गरीबी का पाठ हम अनजाने में पढ़ा जाते हैं ?


३. क्या सुमित का नक़ल न करने के बावजूद नक़ल स्वीकार करना ग़लत था ?

४. क्या पढ़ाई के आधार बिंदु सभ्रान्तता,सहिष्णुता,धैर्य,संतोष हैं या मान,दंभ,चतुराई,घमंड व वस्तुवादिता ?

५. क्या कई बार अमीर अथवा विरासत से हुए अमीर भानू की तरह जीने वाले जीवन भर जीवन तत्त्व  नहीं जान पाते ? क्या वे नहीं जान पाते जीवन तत्त्व मात्र स्वार्थ,चतुराई,क्रोध,दंभ में नहीं शान्ति,निस्वार्थता,त्याग व मानवता में निहित है ?


६. क्या सत्य अथवा अच्छाई को किसी प्रमाण अथार्त डिग्री की अपेक्षा या आवश्यकता होती है ?या ये स्वयं में प्रमाण है ?

७. क्या सत्य अथवा अच्छाई किसी फल की इच्छा के लिए किए जाते हैं या ये स्वयं ही फल हैं ?