Monday 30 July 2012

जनलोकपाल




 





आज देश में,समाज में भ्रष्टाचार का दीमक बहुत अन्दर तक घुस चुका है व खोखला कर चुका है
यही नहीं आज समाज में नैतिकता का मूल्य काफी कम हो चुका है इतना की जो सच बोलता है,सच की पैरवी करता है उसे ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है सरकार  द्वारा  काली कमाई ,काले कारनामो का दौर  चालु  है जहाँ  अन्ना जी  व अरविन्द जी जैसे देशभक्तों  व समाजसुधारकों  के लिए सिर्फ एक जवाब  है की अपनी  ही जांच कराओ । 
 ये संवेदनहीनता और बेशर्मी की हद है पहले भी अन्ना जब अनशन में बैठे तो झूठा आश्वासन देके उन्हें धोखा दिया गया
परन्तु  सच्चाई के साथ  आज भी कई  लोग  हैं और सच्चाई तो सच्चाई है सूरज की तरह है
 क्यूंकि ये उजाला है जिसके रहते झूठ रुपी अँधेरा नहीं रह सकता

चंद पंक्तियाँ ऐसे लोगों के लिए जो निस्वार्थ भाव से व निर्भीक भाव से जीते हैं और समाज को भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर खड़ा रहने को सदा आवाहन करते हैं








भ्रष्ट तंत्र अब नहीं सहेंगे
भ्रष्ट के आगे नहीं झुकेंगे
जनता हैं  हम लोकतंत्र ये
जिसे सही हम उसे चुनेंगे

गोली की बौछार चलाओ

या तोपों में उड़ा हमे दो
राष्ट्र हित में कहने की भी
चाहे जितनी सजा हमे दो

घोटालेबाजी नहीं सहेंगे

भ्रष्टों की हम नहीं सुनेंगे
जनता है हम लोकतंत्र ये
जिसे सही हम उसे चुनेंगे


लगा रहे हैं कालिख देखो

नेता जी अपने ही देश को
काली कमाई कर कर के अब
छुपा रहे हैं काले धन को

गर सच्चाई नहीं सुनेंगे

लोकपाल गर नहीं लायेंगे
फिर पछताना चाहेंगे भी
पर पछता वो नहीं सकेंगे

जनता हैं हम लोकतंत्र ये

जिसे सही हम उसे चुनेंगे

धन्य हैं अन्ना धन्य हैं अरविन्द

जिनकी बदौलत है देश ये हिंद
देश के लिए प्राण दे रहे ये
रक्षा करना इनकी गोविन्द

ऐसे लोगों से है रौशन

सच्चाई का सारा गुलशन
उजियारे का भान कराते
कितने पावन इनके जीवन

भ्रष्टाचार नहीं सहेंगे

भ्रष्टाचारी नहीं सहेंगे
घोटालों की जांच करेंगे
जनता हैं हम लोकतंत्र ये
जिसे सही हम उसे चुनेंगे 



Thursday 26 July 2012

ध्यानयोग 10

ध्यान योग की पिछली पोस्ट जो की सांख्य द्वारा ध्यान पर आधारित थी(ध्यानयोग 9) पर योग द्वारा ध्यान पर अगली पोस्ट के लिए कहा गया था
थोडा योग शब्द को और स्पष्ट कर दूँ की इसका अर्थ होता है जोड़ना अथार्त जीव को शिव की प्राप्ति अथार्त आत्मा का परमात्मा,परमात्म तत्व से साक्षात्कार
यहाँ फिर ये प्रश्न आ जाता है की फिर साँख्य द्वारा ध्यान में भी तो जीव परमात्मा को ही,परमात्म तत्व से ही जुड़ता है फिर दुबारा योग कहने की क्या आवश्यकता ?
यानी साँख्य ध्यान व योग ध्यान में शाब्दिक व मौलिक अंतर क्या है ?
इस पर फिर से स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की दोनों साधन वस्तुतः परमात्म प्राप्ति के लिए हैं अंतर सिर्फ करण का है करण अथार्त ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ
एक करण निरपेक्ष  है और एक करण सापेक्ष है
करण निरपेक्ष जिसमे करण की आवश्यकता नहीं यानी सांख्य द्वारा ध्यान में हम मात्र श्रवण द्वारा ध्यान को उपलब्ध हो जाते हैं
दूसरा करण सापेक्ष यानी योग द्वारा जिसमे हम अपने कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करके ध्यान को और फिर समाधि को उपलब्ध होते हैं
दोनों साधनाओं में मूल अंतर सिर्फ ये है की सांख्य में हम अपने ज्ञान को और वैराग्य को इतना बढ़ा लेते हैं की फिर स्वयं ही ध्यान रूप हो जाते हैं और योग में हम धीरे धीरे व संयम से अपनी इन्द्रियों को और मन,बुद्धि को साधते हुए व प्राणों को निश्चित आसनों द्वारा आयाम देते हुए ध्यान को प्राप्त होते हैं
एक बार बहुत गौर करने की है और वो ये की दोनों ही साधनाओं में करण का उपयोग भले कम ज्यादा मगर होता ही है परन्तु ध्यान तक पहुँचते पहुँचते दोनों ही साधनाएं करण निरपेक्ष हो जाती हैं यानी वहां किसी भी करण चाहे कर्मेन्द्रियाँ हों,ज्ञानेन्द्रियाँ हों,मन,बुद्धि,चित्त व अहंकार (अंतःकरण) हों इनमे से कुछ भी नहीं रह जाता


हम जानते हैंआष्टागिक योग के आठ  चरण हैं
यम नियम आसन प्राणयाम प्रत्याहार ध्यान धारणा समाधि
इनके बारें में विस्तार से लिखा गया है । 


गंभीरता से समझने वाली बात ये है की ध्यान को हम जितना तनाव पूर्ण ढंग से लेंगे ये उतना ही कठिन हो जायेगा
वास्तव में ध्यान से आसान कुछ भी नहीं है और इसका इतना आसान होना ही इसे मुश्किल बना देता है
जैसे किसी बड़े से कहें हम की बच्चे की भाँति हो जाएँ तो ये आसान होते हुए भी कठिन हो जाता है क्यूंकि बच्चे जैसा होने के लिए हममे वैसा ही सरलपन,मासूमियत,भोलापन होना चाहिए जो की देखा जाए तो बहुत आसान है किन्तु हमने स्वयं को राग द्वेष में इतना बाँध दिया है की हम कभी सोच भी नहीं पाते की बचपन में हम कैसे थे
हम सभी बचपन में इतने सरल थे की कभी ये सोच भी नहीं पाते थे की बचपन के इलावा भी कुछ दुनिया होती है
धन,पद,प्रतिष्ठा,मान,सम्मान से दूर,छल,प्रपंच की अंधाधुंध दौड़ और किसी भी प्रकार स्वयं को आगे रखने से बिलकुल अलग और अनोखा जहाँ होता है बचपन का और बस यही स्थितियाँ चाहिए होती हैं ध्यान के लिए
तो ध्यान में हमे बिना तनाव के और ये सोच के जाना होता है की मैं कुछ करने नहीं जा रहा हूँ
ध्यान में वो सबकुछ छोड़ना होता है जो भी हम पकडे हुए हैं
ध्यान में वो सब कुछ छोड़ना होता है जो भी हम सीखे हुए हैं,पढ़े हुए हैं

खाली स्लेट की भाँती होके ही ध्यान में व्यक्ति जा सकता है वहां कुछ भी लिखा हुआ अवरोध उत्पन्न कर देगा
 
ध्यान में हमे बिलकुल खाली हाथ जाना होता है,जो भी हमे संसार से मिला है वो सब छोड़कर हमे ध्यान में जाना होता है सांसारिक बुद्धि लेके आज तक कोई भी ध्यान को उपलब्ध नहीं हो सका है
या ये कहें तो और उपयुक्त होगा की सांसारिक बुद्धि से परे हो जाना ही ध्यान है
ध्यान परमात्म तत्व के साक्षात्कार का,परमात्मा को जाने का पहला द्वार है और उस द्वार तक हम तभी पहुँच सकते हैं जब सहज रहें और सांसारिक बुद्धि से परे हो जाना ही सहजता है
जैसे ही हम बिना दिखावे के होते हैं,सहज होते हैं ध्यान में प्रवेश कर जाते हैं

Sunday 22 July 2012

अध्यात्म

अभी कुछ दिन हुए एक कविता या यूँ कहिये एक ग़ज़ल लिखी और फिर सोचा उसे यहाँ भी शेयर करूँ । कभी कभी कुछ चीज़ें ऐसी हो जाती हैं ऐसी लिख जाती हैं की उसे जब तक हम ठीक से न पढ़ें ठीक से न जाने,उसे अमल में नहीं ला सकते
और ऐसी चीज़ें जो संसार की नहीं संसार वाले के लिए होती हैं ज़रूरी हैं की समझी जाएँ
। भगवान् से सम्बंधित हम कुछ भी करें,कहें वो मैं मानता हूँ उसकी उपासना ही है,बंदगी ही है
एक शेर लिख रहा हूँ
प्रभु की बंदगी से फुर्सत न मिले यही चाहत है
हम जानते हैं बाग़-ए-दुनिया में काग़ज़ के फूल खिलते हैं

ये जो संसार हम देख रहे हैं ये जिस संसार में हम रहते हैं क्या हम कभी ये महसूस करते हैं की हम हमेशा संसार में संसार की ही बात करते रहते हैं

ओब्विअस सी बात है की संसार में हम हैं तो संसार की ही बात करेंगे लेकिन फिर आप मेरा मतलब नहीं समझ पाए या ये कहूँ तो ज्यादा उचित होगा की मैं नहीं समझा पाया
। हमे संसार के साथ संसार वाले के लिए भी थोडा समय निकालना चाहिए यानी उस परमात्मा,परमेश्वर,अल्लाह,गाड,ओंकार के लिए वैसी ही शिद्दत रखनी चाहिए जैसी हम इस विनाशशील दुनिया के लिए निकालते हैं
प्रभु की कृपा ही माननी चाहिए की जो हम किसी भी तरह उससे जुड़ते हैं,उसे याद करते हैं,उससे बात करते हैं
। ये बहुत ध्यान में रखने वाली बात है की हमे मालूम नहीं चलता लेकिन अधिकतर लोग अधिकतर अपना बेस्ट इस दुनिया के लिए रखते हैं,इस दुनिया से धन,मान,पद,प्रतिष्ठा आदि पाने के लिए परन्तु सच्चाई ये है की ये कुछ भी हमारे काम नहीं आने वाले,क्यूंकि संसार से एक न एक दिन साथ सभी का छूट जाने वाला है परन्तु भगवान् से कभी नहीं छूटेगा । एक परमेश्वर ही है जो जीव के साथ जन्म से पहले भी था और मृत्यु के बाद भी रहेगा और ये अवश्यम्भावी है की जीव उसे जीवन में भी अपने साथ माने क्यूंकि जीवन में भी वो हमारे साथ ही है  । लेकिन हम सांसारिक राग द्वेष में ऐसा फंसते हैं की इसे ही सबकुछ मान लेते हैं क्यूंकि हम शरीर को ही स्वयं का स्वरुप माने बैठे हैं और दूसरे शरीर जो हमारी तरह ही मांस,हड्डी,मज्जा,मेद, मल,मूत्र से भरे हैं और नष्ट हो जाने वाले हैं उनमे आसक्त होके अपने अमूल्य जीवन को उनसे मिलने वाली प्रशंसा,अप्रशंसा में समाप्त कर देते हैं । इन्फेक्ट अधिकतर लोग तो अपने जीवन को इसी का उद्देश्य मान लेते हैं । धन्य हैं खुसरो,तुलसी,सूर,रविदास,कबीर,तुकाराम,मीरा,नामदेव जैसे संत कवि जिन्होंने अँधेरे में जाते समाज को उजाले का पथ बताया,उजाले का पथ दिखाया । ये कविता भी प्रभु को सुमिरते हुए ही लिखी गयी है । सूफी कवियों या भक्त कवियों के साथ समस्या ये होती है की वो संसार से बात करते हुए भी परमात्मा से ही बात करते हैं और संसार उन्हें समझ नहीं पाता,उनकी बातों को कई बार ग़लत ढंग से ले लेता है लेकिन इससे उन्हें कुछ भी फर्क नहीं पड़ता क्यूंकि वो तो इसमें भी परमात्मा ही देखते हैं । 
प्रभु की कृपा पर मैं नाचीज़ इतना ही कहना चाहूँगा,किसी शायर ने क्या बात कही है :

जब तक बिका न था कोई पूछता न था

तुने मुझे खरीदकर अनमोल कर दिया

ग़ज़ल में शायर ने प्रभु प्रेम में डूबते हुए कहा है

जिंदा है जो ज़िन्दगी में वोही सच्चा है 
मर मर कर जीना कहीं जीना होता है 


हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई और हर मज़हब बराबर
हर धर्म है लहर और आदमी सफीना है


नहीं मानता मैं डर से होने वाली इबादत को
जब से यारी है हमारा खुदा से याराना है 


वो और होंगे जो फ़क़त किताबों में उसे ढूंढे
हमने जब भी पुकारा परवरदिगार को आना है 


प्रभु की दुनिया में अहम् नहीं,नहीं हसरतें चलतीं
उसका दरबार तो खुद को मिटाके ही मिलता है

पहले शेर में ही शायर ने अपने अंदाज़ स्पष्ट कर दिए अथार्त ग़ज़ल के मकसद को पूरी तरह खोल के रख दिया की ज़िन्दगी क्या है और ज़िन्दगी वोही है जिसमे जिंदादिली है और जिंदादिली बहुत बड़ा शब्द है,गहरा शब्द है मेरे हिसाब से

जिंदादिली का अर्थ है की हम अपने साथ साथ अपने आस-पास के वातावरण को कितना जिंदादिल रखते हैं
और जो जिंदादिल है वोही सच्चा है बाकी शायर के मुताबिक़ जो जिंदादिल नहीं हैं वो जीवन के असली सलीके से महरूम रह गए अथार्त उन्हें अभी जीवन को समझना होगा,जीना समझना होगा । 

हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई और हर मज़हब बराबर
हर धर्म है लहर और आदमी सफीना है

इस दूसरे शेर में शायर ने साफ़ साफ़ कहना चाहा है की साधन को साधना समझने की भूल न समझ लेना

इस मुग़ालते में अच्छे अच्छे अपनी साधना पथ से च्युत हो जाते हैं

मतलब क्या है कहने का ? मतलब ये है की मंदिर में घंटा बजाने से,नमाज़ पढने से,गिरजाघर जाने से,शबद गुनगुनाने से ही साधना पूर्ण नहीं हो जाती
। उसे समझना होगा यानी जैसा हम पवित्र जगहों पर करते हैं अथार्त स्वयं को पवित्र रखते हैं वैसा ही हमे अपने दिल के मंदिर,अपने ज़हन के मस्जिद,अपने मन के चर्च,और अपने ह्रदय के गुरुद्वारे को भी पवित्र रखना होगा और इस जगत को भी प्रभुमय सोचना होगा,मानना होगा और सबके साथ सद्भाव रखना होगा
इसके साथ साथ शायर ने इस बात की ओर इशारा किया है की हमे अपने धर्म के साथ साथ दूसरे धर्मों की भी इज्ज़त करनी चाहिए वरना इसका मतलब यही है की हम अपने धर्म की भी दिल से इज्ज़त नहीं करते


इसे समझिये की जैसे हम अपने दोस्त के घर से निकलें और उसके भाई को उल्टा सीधा कहें तो इसका मतलब यही हुआ की हम अपने दोस्त की भी इज्ज़त नहीं करते
। यानी हम मंदिर से निकले और मस्जिद से निकलने वाले को हेय दृष्टी से देखने लगे या हम मस्जिद से नमाज़ पढके निकल रहे हैं और किसी मंदिर से निकलने वाले को देखते ही उससे मुंह मोड़ लेते हैं तो हमारी साधना का क्या अर्थ हुआ ? यानी ऐसा ही अगर गिरजाघर से निकलने वाला और गुरुद्वारे से निकलने वाला करे तो उनके वहां जाना न जाना बराबर ही हुआ
हम अपने प्रभु के एक नाम की उपासना करके निकले और दूसरे नाम की निंदा करने लगे तो हम जहाँ थे वहीँ रहे यानी हमारे धार्मिक होने और न होने में कोई फर्क नहीं है
। यही शायर कह रहा है की सभी बराबर हैं और सभी धर्म बराबर हैं क्यूंकि धर्म तो लहर है मात्र जो नाव को समुन्दर से मिलाती है और आदमी ही तो कश्ती है


तीसरे शेर
नहीं मानता मैं डर से होने वाली इबादत को
जब से यारी है हमारा खुदा से याराना है 

में शायर ने साफगोई से कहा है की भगवान् से डरके ही इबादत नहीं की जाती यहाँ उसका अर्थ ऐसे डर से है जो भगवान् से दूरी बढाता है,भगवान् को बहुत बड़ा बताता है इतना की भगवान् के करीब जाने को रोकता है

शायर का कहना है की प्रभु ने ये दुनिया इंसानों को उससे दूर रहने के लिए नहीं बनायी बल्कि उससे प्रेम करने के लिए बनायी है क्यूंकि तभी तो उसने दोस्ती भी बनायी है
। यहाँ भक्त ने भगवान् से सख्य भक्ति में रूचि दिखाई है

वो और होंगे जो फ़क़त किताबों में उसे ढूंढे
हमने जब भी पुकारा परवरदिगार को आना है 

इस शेर में शायर ने कहा है की भगवान्,अल्लाह,गोंड,ओंकार को सिर्फ शास्त्रों में,गीता,रामायण,कुरआन,बाईबल,गुरुवाणी में ढूँढने वाले उसे नहीं पा सकते

इसे ध्यान से समझें यदि कोई गूंगा है और वो आपको कुछ बताना चाहे तो क्या आप समझ लेंगे

यदि किसी गूंगे ने खूब अच्छी मिठाई खायी है और वो उसका रस समझाना चाहे तो एक तो वो कैसे समझा सकेगा और दूसरा आप कैसे समझ सकेंगे

परमात्मा,परमेश्वर शब्दातीत है यानी शब्दों से परे जो मानसिक जगत है वहां ध्यान द्वारा पहुँचने पर ईश्वर का,ईश्वर तत्व का अनुभव होता है और जैसे ही हम उसे व्यक्त करने लगते हैं वैसे ही उसे शब्दों के दायरे में ले आते हैं और वैसे ही वो अवर्णनीय हो जाता है
। जो शब्दों से परे है,ऊपर है उसे शब्दों द्वारा व्यक्त कैसे कर सकते हैं इसे ही कबीर ने गूंगे का गुड कहा है
हमने जब भी पुकारा परवरदिगार को आना है ये कहने का अभिप्राय कवि का यही है की ध्यान में प्रभु के डूबे नहीं की प्रभु का आभास होने लगता है


प्रभु की दुनिया में अहम् नहीं,नहीं हसरतें चलतीं
उसका दरबार तो खुद को मिटाके ही मिलता है

इस शेर पर बस इतना ही कहना चाहूँगा जो कबीर दास जी ने कहा था

जब मैं था तब हरी नाही अब हरी है मैं नाय
प्रेम गली अति सांकरी जेमे दो न समय

भगवान् बिना मांगे ही भक्तों को सबकुछ दे देते हैं इसलिए उनसे कुछ मांगने का मतलब उनकी कृपा में दोष देखना है
और परमेश्वर को आज तक जिसने भी पाया है स्वयं को मिटाके ही,समर्पण से ही,स्वयं के अहम् को उसे सौंप के ही


आज मैं कुछ सूफी कलाम पेश करना चाहूँगा एक तो हज़रत अमीर खुसरो के द्वारा लिखी गयी है और दूसरे के रचनाकार है
भक्त सूरदास जी । बेहद गहरे अर्थ लिए हुए कलाम  हैं जिन्हें संसार से हटके सोचने पर ही समझा जा सकता है,आनंद लिया जा सकता है । आनंद लें !


छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके
प्रेम भटी का मदवा पिलाइके
मतवारी कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
गोरी गोरी बईयाँ, हरी हरी चूड़ियाँ
बईयाँ पकड़ धर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
बल बल जाऊं मैं तोरे रंग रजवा
अपनी सी रंग दीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
खुसरो निजाम के बल बल जाए
मोहे सुहागन कीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके 

English Translation


You've taken away my looks, my identity, by just a glance.
By making me drink the wine of love-potion,
You've intoxicated me by just a glance;
My fair, delicate wrists with green bangles in them,
Have been held tightly by you with just a glance.
I give my life to you, Oh my cloth-dyer,
You've dyed me in yourself, by just a glance.
I give my whole life to you Oh, Nijam,
You've made me your bride, by just a glance.









हमारे प्रभु, औगुन चित न धरौ।
समदरसी है नाम तुहारौ, सोई पार करौ॥
इक लोहा पूजा में राखत, इक घर बधिक परौ।
सो दुबिधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरौ॥
इक नदिया इक नार कहावत, मैलौ नीर भरौ।
जब मिलि गए तब एक-वरन ह्वै, सुरसरि नाम परौ॥
तन माया, ज्यौ ब्रह्म कहावत, सूर सु मिलि बिगरौ।
कै इनकौ निरधार कीजियै कै प्रन जात टरौ॥

भक्त और भगवान् के बीच कितना मधुर संबंध दर्शाया है इस पद के माध्यम से सूरदास जी ने। यह सर्वविदित है कि पूर्णता केवल ईश्वर को प्राप्त है। अपूर्णता के कारण मनुष्य से त्रुटि स्वाभाविक है। इसलिये सूरदास ने भगवान् से अवगुण समाप्त करने नहीं बल्कि इसे हृदय में न धरने की प्रार्थना की है। सूरदासजी कहते हैं - मेरे स्वामी! मेरे दुर्गुणों पर ध्यान मत दीजिये! आपका नाम समदर्शी है, उस नाम के कारण ही मेरा उद्धार कीजिये। एक लोहा पूजा में रखा जाता है (तलवार की पूजा होती है) और एक लोहा (छुरी) कसाई के घर पड़ा रहता है, किंतु (समदर्शी) पारस इस भेद को नहीं जानता, वह तो दोनों को ही अपना स्पर्श होने पर सच्चा सोना बना देता है। एक नदी कहलाती है और एक नाला, जिसमें गंदा पानी भरा है, किंतु जब दोनों गङ्गाजी में मिल जाते हैं, तब उनका एक-सा रूप होकर गङ्गा नाम पड़ जाता है। इसी प्रकार सूरदासजी कहते हैं- यह शरीर माया (माया का कार्य) और जीव ब्रह्म (ब्रह्म का अंश) कहा जाता है, किंतु माया के साथ तादात्म्य हो जाने के कारण वह (ब्रह्मरूप जीव) बिगड़ गया (अपने स्वरूप से च्युत हो गया।) अब या तो आप इनको पृथक् कर दीजिये (जीव की अहंता-ममता मिटाकर उसे मुक्त कर दीजिये), नहीं तो आपकी (पतितों का उद्धार करने की) प्रतिज्ञा टली (मिटी) जाती है।


 

Thursday 19 July 2012

चिंतन 3

टी.वी पर राजेश खन्ना जी  के देहावसान के  में देख सुन रहा था ।  भगवान उनकी आत्मा को शांति और सद्गति प्रदान करे ।
मौत को लेके अभी कुछ ख्याल उभरे तो कुछ लिखा सोचा उसे यहाँ भी शेयर करूँ ।

 
मौत कभी होती नहीं ज़िन्दगी कभी जाती नहीं 
ज़िन्दगी है एक लहर और लहर कभी खोती  नहीं 

आती जाती हवाएं कहती हैं यही बातें 
आते जाते मौसम यही हमको सुनाते 

ज़िन्दगी में कभी कुछ भी बीतता नहीं 
बीता हुआ कुछ भी ज़िन्दगी रखती नहीं 


मौत कभी होती नहीं ज़िन्दगी कभी जाती नहीं 


मरने का शब्द ही झूठा है और ग़लत है 
ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी की होती मतलब है 

खिज़ा का रंग बहार पर कभी चढ़ता नहीं 
ज़िन्दगी कभी धुंधलापन ढोती नहीं 

मौत कभी होती नहीं ज़िन्दगी कभी जाती नहीं 


जीवन यात्रा में जिस्म ऐसा है जैसे 
दिन और रात के लिए आसमान जैसे 

नदी का पानी कभी भी सड़ता नहीं 
जीवन यात्रा कभी कहीं थमती नहीं  

मौत कभी होती नहीं ज़िन्दगी कभी जाती नहीं 









हम मौत को लेके जानते नहीं की क्या क्या सोचते हैं

जी हाँ, मैं फिर से दोहरा रहा हूँ की हममें से अधिकतर लोग ऐसे हैं जिन्हें ये नहीं मालूम की वो मौत को लेके क्या सोचते हैं कुछ बहुत डरे रहते हैं,कुछ मौत पर बात ही नहीं करना चाहते?
कुछ तो मौत के बारें में सोच भी नहीं पाते
। यहाँ तक की जब आसपास का कोई मरता है तो उन्हें एकबारगी झटका सा
लगता है और फिर वो अपनी उसी मूर्छित दुनिया में लौट जाते हैं जहाँ मौत को सभी भूले रहते हैं

लेकिन ये तो ऊपरी बात हो गयी अंदरूनी बात थोड़ी और है और उसे समझने की ज़रूरत है तब जाके हमे पता चलता है की हम कितने सघन मूर्छा की दुनिया में रहते हैं

बात ये है की हम दूसरे के मौत पर जब आंसू बहाते हैं या दुखित होते हैं तो हम उस समय इस बात से भी दुखित रहते हैं की हम स्वयं भी कभी न कभी मरेंगे

अपने जीवन की भाग दौड़ में हम इस सत्य को भूल जाते हैं की हमे मरना होगा और जब कोई मरता है तो हमे झटका लगता है की अरे ये क्या ?थोडा सा विवेक जाग्रत होता है,मन कहता है नहीं सिर्फ जानवरों की तरह जीना कोई जीना नहीं
। नहीं सिर्फ धन मान रिश्ते-नाते दोस्त पद-प्रतिष्ठा के लिए ये जीवन नहीं मिला । लेकिन वाह री बुद्धि वाह री किस्मत भला हम दिमाग पर दिल की क्यूँ चलने दें परिणामतः हम फिर उसी जंगल में चले जाते हैं और पशुवत जीवन जीने लगते हैं
परन्तु प्रश्न ये भी है की हम मौत को मौत मान क्यूँ लेते हैं ? मौत सत्य नहीं है सत्यता चेतन तत्व है । सत्य तो जीवन है
प्रस्तुत कविता में कवि यही कहना चाह रहा है की जीवन कभी ख़त्म ही नहीं होता फिर मौत कैसे और किसकी ?
जिसे हम मौत कहते हैं वो तो मात्र एक पड़ाव है उस यात्री का जिसे अब अपने सफ़र का दूसरा मुकाम तय करना है

इसके बाद जीवन को लहर बताया गया और कह रहा है की लहर अगर स्वयं को नष्ट हुआ मान ले तो ये उसका अज्ञान है क्यूंकि वो तो वस्तुतः समुद्र से ही है और इसलिए लहर कभी ख़त्म नहीं होती,कभी नहीं खोती
। वो सदैव समुद्र में विद्यमान है अथार्त आत्मा हमेशा ही परमात्मा में विद्यमान है,सदैव अमर है
फिर आखिरी में जो कहा गया की नदी का पानी कभी सड़ता नहीं,कविता का यही सार तत्व है


सरोवर का पानी मरता है,सड़ता है क्यूंकि वो ठहरा हुआ है
। हमे मालुम नहीं चल पाता लेकिन 90 %
व्यक्ति इसलिए दुखी होता है क्यूंकि वो सरोवर बन गया
। उसे ये मालूम ही नहीं चल पाता की वो नदी है,कभी सड़ नहीं सकता लेकिन अपने को सरोवर मानके वो स्वयं को दुर्गन्ध में डाल देता है अथार्त स्वयं को दुःख में डाल देता है

इसे गौर से समझिये की जो बीत गया है वो बह चुका है उसे पकड़ना ही नासमझी है

नदी कभी किसी मैदान से अच्छे से बहती है,कहीं पर पथ ऐसा दुर्गम होता है की वो टेड़ी मेडी होके बहती है लेकिन यदि वो अपने को इस उतार चढ़ाव,इस सुख दुःख के साथ बाँध ले तो फिर नदी न रह जाएगी

सरोवर हो जायेगी,सड़ने लगेगी इसी तरह हमे भी ज़िन्दगी के साथ बहना होता है उसी में सच्चा आनंद है परन्तु हमारी पकड़ हमे कमज़ोर बनाती है
। बीता हुआ कल बीता हुआ वर्तमान है और वो बीत चुका है उसे पकड़ना ही हमारे दुःख का कारण है और यही नहीं हमे जीवन के सार तत्व तक न पहुँचने देने की सबसे बड़ी रुकावटों में ये भी एक कारण निहित है
असल में बीता हुआ समय ही मरता है उसमे बीते सारे लम्हे मरते हैं और हम अपनी चेतनता को,अपने जीवन की चेतनता को अपने बीते हुए जीवन वो अच्छा हो खराब हो परन्तु जड़ता से जोड़ के देखते हैं

ये एक बहुत बड़ा कारण है हमारे जीवन में हमे मौत से डर लगने का,मौत के आगे झुकने का,जीवन के मधुर,अलौकिक,अमर संगीत से वंचित होने का

अब ध्यान दीजिये यही बात भविष्य के साथ भी लागू हो सकती है यदि हम वैसे ही प्रभात की अपेक्षा जैसा आज था कल के सूरज से भी करें तो फिर से ग़लत हो जायेंगे,फिर से सरोवर का,सड़ने वाले पानी बीज बोने लगेंगे

जो आज सुबह बीती बढ़िया थी लेकिन कल भी वैसी रहे तो इसका मतलब हमने प्रकृति को सिमित कर डाला
। प्रकृति से अच्छी कला,सोच और प्रकृति से अच्छा कार्य कोई कर ही नहीं सकता और प्रकृति हमेशा ही बीते हुए से अच्छा ही करती है वो अलग बात है हम समझ न पायें
इसलिए यदि हम उसके कृत्य का आनंद नहीं ले सकते तो हमे उसके कृत्य पर दुखी भी नहीं होना चाहिए

इस बात के अलावा ये भी समझना आवश्यक  है की हम जैसा अपने भूतकाल को लेते हैं हम वैसा  ही  अपने भविष्यकाल के बारें में सोचने लगते हैं यानी यदि हम भूतकाल से दुःख महसूस करते हैं तो हम वैसा ही अपने भविष्यकाल में भी पायेंगे


इसके साथ साथ हम भूतकाल और भविष्यकाल में बंधे रहने के कारण अपने वर्तमान को जी ही नहीं पाते और वर्तमान में जीना ही जीना है,नदी को नदी की तरह ही बहना चाहिए क्यूंकि वोही सहजता है वो हो नदी को प्रकृति की देन है 


Sunday 15 July 2012

चिंतन 2



अभी नेट पर आया था ब्लॉग पर लिखने जा ही रहा था की याद आया की गुवाहाटी में बीस लोगों द्वारा एक घिनौना कुकृत्य किया गया है
मैंने इस पर कभी एक कविता लिखी थी
 

 //poetry-kavita.blogspot.in/2011/11/blog-post_13.html
आज चिंतन के प्रसंग को बढाने से पहले इस काण्ड पर कुछ चिंतन प्रकट करना चाहता हूँ
। तीन बात कहूँगा

पहली बात

सबसे पहले मैं ऐसे लोगों की भर्त्सना करना चाहूँगा जो सिर्फ ध्यान पाने के लिए ऐसे मुद्दों पर हाथ साफ़ करते हैं उनका इसके पीछे के दर्द से कुछ लेना देना नहीं होता

उन्हें सिर्फ इस बहाने अपनी वाह वाही और की वो बहुत संवेदनशील हैं ये दिखाना होता है
। ऐसे लोग चाहे मीडिया से जुड़े हों,ब्लॉग से जुड़े,किसी अच्छे पद पर हों या प्रतिष्ठित हों  हों लेकिन यदि वो मात्र किसी स्वार्थ हेतु अथवा दिखावे के लिए ऐसे मुद्दों को उछालते हैं तो वो भी उन्ही बीस आदमियों की तरह हैं जो इस कुकृत्य में शामिल थे

दूसरी बात
ऐसा क्यूँ होता की जब एक्सिडेंट हो जाता है तभी उस चौराहे पर सिपाही खड़ा किया जाता है यानि हम पहले से ही सावधान क्यूँ नहीं होते । ऐसा क्यूँ होता है जब आग लग जाती है नुक्सान  उठा लिया जाता है तभी आग बुझाने वाला यंत्र रखा जाता है ?
आखिर ऐसी जगहों पर सिपाही या सेकुरिटी वाले तैनात क्यूँ नहीं थे?

तीसरी बात

ये सबसे अहम् है बहुत गौर से पढने और समझने वाली बात है और वो ये है की हममे से अधिकतर लोग आज भी और अभी भी उन्ही 20 जानवरों जैसा जीवन जीते हैं जो उस लड़की के साथ हैवान हुए
। हमारे अन्दर कैसा जानवर छुपा है या तो हम जानते नहीं या तो हम मानते नहीं । लेकिन इससे सच्चाई नहीं बदल जाती और डंके की चोट पर मैं कहता हूँ की हममे से लगभग 75% चाहे वो मेल हों या फीमेल ऐसी ही जानवरों जैसी प्रवृत्ति रखते हैं और यही नहीं रोज़ हम ऐसे ही कृत्य करते हैं कर रहे हैं । जी हाँ, हम लोग रोज़ ऐसे ही बलात्कार कर  रहे हैं अंतर सिर्फ इतना है की गुवाहाटी में जो हुआ वो शारीरिक हिंसा थी (हालाँकि वो भी मानसिक हिंसा से उपजी ) और हम मानसिक हिंसा करते हैं ऐसी ही घृणित हम माने या न माने लेकिन इस सत्य को हम झुठला  नहीं सकते । वो जो भीड़ देख रही थी इस कुकृत्य को वो कोई और नहीं थी हम ही लोग थे अंतर सिर्फ चेहरे का ही तो था

पेश है कुछ सवाल यदि ज़रा भी हिम्मत हो तो इन प्रश्नों की सच्चाई को तौलियेगा

1 . क्या हम मानसिक हिंसा नहीं करते ?
2 . क्या हम स्वयं मानसिक रूप से दूसरों की इज्ज़त तार तार करने में नहीं लगे रहते ?
3 . जैसे उस लड़की को २० लोगों ने घेर कर अपने जानवर होने का सबूत दे दिया क्या हम भी दूसरों को नीचा दिखाने के लिए अपने दोस्तों किए साथ ऐसी घटिया साजिशें नहीं रचते और क्या इस तरह से किसी की इज्ज़त तार तार नहीं करते ?
4 . क्या हमारे समाज में जब कोई सही मुद्दे पर आवाज़ उठाता है तो क्या हम चुप नहीं लगा जाते तो फिर क्या हम उस घृणित भीड़ से अलग हैं जो किसी अबला की इज्ज़त तार तार होते देखती रही ?
5. क्या हम ऐसे लोगों को शरीफ लोगों से ज्यादा नहीं अपनाते जो आपराधिक वृत्ति के होते हैं और इस तरह से क्या स्वयं हम हिंसक सोच के नहीं हैं ?
6. क्या हम मात्र अपने थोड़े से स्वार्थ के लिए उन नेताओं जैसे नहीं हो जाते जिन्होंने ऐसे न जाने कितने केस दबा दिए ?
7. क्या हम अपने झूठे अहम् को बढाने के लिए किसी अनजान के वजूद के साथ नहीं खेल जाते यानि जैसा उन बीस लोगों ने किया क्या उसी तरह हम अपने थोड़े से स्वार्थ को (धन,यश,मान ) पाने के लिए ग़लत काम के लिए हामी नहीं भरते ?
8. क्या हम अपनी ग़लतियों के लिए क्षमा मांगते हैं ? क्या हम ऐसी मानसिक हिंसाएँ करना बंद करते हैं ?
9. क्या हम वस्तुवादिता के गुलाम नहीं हैं ? क्या हम वासना के गुलाम नहीं हैं ?
 क्या हम दूसरों को उनकी धन,संपत्ति और शारीरिक दृष्टि से नहीं तौलते ?
10. क्या हम कभी ये निश्चय करते हैं की हम अपनी मानसिक हिंसा घटाएंगे ?
11. क्या हम अपने निश्चय पर अटल रह पाते हैं ?
१२. हममे से कितने लोग अपना स्वरुप शरीर मानते हैं ?
१३. हममे से कितने लोग अपना स्वरुप आत्मा जानते हैं ?
१४. क्या समाज में सारी ग़लत बात सिर्फ स्वयं को शरीर मानने से नहीं होतीं ?
१५. क्या स्वयं को आत्मा समझने के बाद हम स्वयं ही आसुरी गुणों के अपेक्षा दैवीय गुणों की तरफ नहीं बढ़ते ?
१६. हममे से कितने प्रतिशत लोग सांसारिक दिखावे की ज़िन्दगी जीते हैं और कितने ऐसे हैं जो परमात्मा से कुछ नहीं छुपाते अथार्त भगवान् को साक्षी मानके जीते हैं ?

अब पुनः चिंतन की पिछली कड़ी पर आता हूँ और वहीँ से शुरू करता हूँ जो मैं कहना चाहता था


हमने चिंतन से सम्बंधित कुछ मूलभूत प्रश्नों पर गौर किया था
। मैंने एक बात कही थी की हम एक बार में एक ही बात सोच सकते हैं मैं फिर अनुरोध करूँगा की और गौर से समझें । यानि की हमे भले लगे की हमारे मन में कई विचार चल रहे हैं लेकिन सच्चाई ये होती है की हम एक ही विचार को सोच रहे होते हैं
मतलब हम देखते हैं की आपराधिक लोग जल्दी क्यूँ नहीं सुधर पाते उसका कारण सिर्फ इतना है की वो अपने चित्त की दूसरी दिशा की तरफ जा नहीं सकते या ये कहें की जा नहीं पाते
। उसी तरह से उनके ऊपर जो सामान्य सोच वाले लोग हैं यानि की जो आम जनता है वो पढ़ाई-लिखाई,नौकरी,बच्चे और उनकी शादी इसी को जीवन की इति समझे है और वो भी सोच के और आयामों के बारें में सोच नहीं पाती । आम जनता येही सोचती की उसका स्वरुप शरीर है और मरने से पहले उसे इस शरीर को विभिन्न तरह से सुख पहुचाना है । मगर मैं ये कहना चाहूँगा की अध्यात्म की तरफ सोचने का हौसला हम क्यूँ नहीं जुटा पाते ?
आखिर हमे ऐसा क्यूँ लगता है की परमात्मा कोई पाने की चीज़ है ? हम क्यूँ नहीं मान पाते की परमेश्वर हमे मिला ही हुआ है,हमे बस उसे अनुभूत करना है


एक कहानी सुनिए

दो दोस्त थे दोनों अलग अलग सामुद्रिक यात्रा पर निकले
। पहले दोस्त जब निकला तो सफ़र के दौरान एक तूफ़ान में पानी का जहाज़ फंस गया और फिर पानी में उभरी चट्टान से टकराके छिन्न भिन्न हो गया । वो व्यक्ति किसी तरह बच गया एक टापू पर आ गया वहां उसने देखा की कोई भी नहीं है । उसने वापस लौटने की आशा छोड़ दी और वहीँ पर एक झोपडी बना कर रहने लगा । इस तरह से उसने अपना जीवन वहीँ गुज़ार दिया

जो दूसरा दोस्त था वो भी दूसरी सामुद्रिक यात्रा पर निकला था
। उसके साथ भी वही हुआ उसका जहाज़ टूट गया सभी यात्री बिखर गए और वो स्वयं किसी लकड़ी के बड़े तख्ते को पकडे हुए एक निर्जन वीरान द्वीप से आ लगा । परन्तु उसने सोचा की यदि वो यहाँ आ पड़ा है तो निकल भी सकता है । उसने तुरंत ही किसी तरह से एक झंडा बनाया और एक पेड़ के ऊपर जाके बाँध दिया । नित्य वो रोज़ जाके उस झंडे को हिलाता था और कोशिश करता था की यदि कोई जहाज़ निकले आस पास से तो उसके झंडे को देख ले और ऐसा ही हुआ कुछ हफ़्तों के बाद एक जहाज़ उस द्वीप के पास से गुज़रा और उसका झंडा देखके रुक गया । और इस तरह से वो दूसरा दोस्त वापस अपने गाँव लौट गया

सार क्या है कहानी का की परमात्मा भी हमारे इतने ही पास है जितना वो पानी का जहाज़ उस निर्जन,वीरान द्वीप के पास
। हम मगर उसे आवाज़ नहीं लगाते यहाँ तो कुछ हफ़्तों के बाद वो पानी का जहाज़ गुज़रा परन्तु वास्तव में तो परमात्मा सदा ही हमारे पास से गुज़र रहा है । परन्तु क्या हम उसे आवाज़ लगाते हैं ? हम तो उसकी दिशा में सोच भी नहीं पाते हैं । हम उस पहले व्यक्ति की तरह ज़िन्दगी बिता देते हैं जो ये मान बैठता है की इस टापू से वो निकल नहीं पायेगा
इसलिए ये आवश्यक है की हम क्या सोच रहे हैं इसका भान हमे अवश्य रहे
। अपने दिन का,अपने जीवन का सारा समय तो पशु भी अपने कार्य में लगा देता है परन्तु इंसान और उसमे बहुत फर्क है । बुनियादी बात यही है की सांसारिक सोच के साथ साथ हमें पारमार्थिक सोच के प्रति भी सचेत रहना चाहिए,जागरूक रहना चाहिए   भूले से भी हमे अपने आध्यात्मिक सिद्धांत अपने जीवन के सिद्धांतों से अलग नहीं समझना चाहिए क्यूंकि इस तरह से हम अपने समय और उसकी सदुपयोगिता को व्यर्थ करते हैं । आप माने या न माने लेकिन दिखावे की वजह को प्राथमिकता देने की वजह से हम बिना दिखावे की जो असली चीज़ रहती है उससे चूक जाते हैं

एक चुटकुला सुनिए

एक आदमी था गोलूमल उसके घर उसका मित्र भोलूमल आया

भोलूमल ने देखा की गोलूमल हाथ बंद कर कर के उसकी तरफ खाली फेंक रहा है


भोलूमल : यार! ये क्या कर रहा है तू ?

गोलूमल : अरे यार ! बिजली नहीं आ रही न !!

भोलूमल : वो तो ठीक है लेकिन तू ये क्या कर रहा है !

गोलूमल : अरे ! तुझे गर्मी न लगे इसलिए तुझ पर हवा फेंक रहा हूँ 


भोलूमल : तो क्या तेरे यहाँ हाथ वाला पंखा नहीं है ?

 
गोलूमल : तो क्या तुझे मेरी हाथ से फेंकी हवा नहीं लग रही है ?

भोलूमल : नहीं नहीं भाई ! ऐसी बात नहीं है,ठीक है, अच्छी हवा लग रही है !!

हमे ये तय करना होगा की हम इनमे से कौन हैं ? कहीं परिस्थितियों के अनुसार हम दोनों ही तो समय समय पर नहीं हो जाते
। लेकिन हर सूरत में ये बात दीगर है की हम बेसिरपैर की बातों को भी प्राथमिकता देते हैं दिखावे के लिए इसलिए सांसारिक हवा जो हाथ वाली है खा लेते हैं लेकिन आध्यात्मिक हवा जिसके लिए हमे थोडा आगे बढ़के हाथ का पंखा ही तो उठाना था उसके लिए प्रयास नहीं करते । क्यूँ ? क्यूंकि वो हमारे मित्र को अच्छा नहीं लगेगा । क्यूंकि सत्संग को तो अधिकतर हम बुढापे का विषय मानते हैं इसलिए उसपर चर्चा स्वेच्छा से कभी करना ही नहीं चाहते
चिंतन सकारात्मक सही अर्थों में तभी मानना चाहिए जब थोडा ही सही लेकिन उसमे परमात्म तत्व का ज़िक्र भी आ जाए,थोडा ही सही उसमे वैराग्य की झलक भी हो
। 

वहीँ एक भक्त की आवाज़ क्या होगी जिसने इतना भी मान लिया की प्रभु उसके साथ है


ज़िन्दगी के उजालें क्या ?ज़िन्दगी के अन्धेरें क्या
हमे कुछ भी मालूम नहीं जबसे तुझे सोचा है

अब तक मिट रहा था मैं ज़माने के लिए मेरे मालिक
अब मिट रहा हूँ मैं खुदको तुझसे मिलाने के लिए


पहले शेर में भगवान् के प्रति अनन्यभाव है की प्रभु भक्तों को सब चीज़ स्वयं ही उपलब्ध करा देते हैं,भक्तों को तो सिर्फ उनकी ही चाहना रखनी चाहिए


दूसरा शेर गहरा है वो कहता है की 'मैंपन'
  ही रुकावट है परमात्मप्राप्ति के लिए और इस मैंपन को मिटाके ही साधक साध्य से अथार्त परमात्मा से मिलता है




Wednesday 11 July 2012

चिंतन

हमारे चिंतन का हम पर बहुत प्रभाव पड़ता है ये कह सकते हैं की हम आज जो भी हैं अपने चिंतन की वजह से  और कल जो भी होंगे उसका आधार हमारा आज का चिंतन है । 
चिंतन सदैव एक ही दिशा में हो सकता है यदि हम खराब चिंतन कर रहे हैं तो इसका मतलब यही नहीं की हम स्वयं का कल खराब कर रहे हैं बल्कि इसका और गहरा अर्थ ये हुआ की हम अच्छे  चिंतन से वंचित होते जा रहे हैं
अधिकांशतः हम सांसारिक चिंतन ही कर पाते हैं या ये कहें की सांसारिक चिंतन से ही फुर्सत नहीं मिलती फिर आध्यात्मिक चिंतन शब्द कौन सी बला है इससे सर्वथा हम महरूम ही रह जाते हैं चिंतन की तो बात ही नहीं उठ पाती । 
सांसारिक चिंतन में हम क्या सोचते हैं यदि हम इसको साफगोई से समझें और इमानदारी से माने तो हमे पता चलेगा हम अपना अहित ही सोचते हैं,अहित की करते हैं कभी जाने कभी अनजाने । 
मैंने इस श्रृंखला को इसलिए शुरू किया की अधिकतर हमे पता ही नहीं चल पाता की हम कितने अधिक अँधेरे में हो सकते हैं,कितनी ग़लत दिशा में हो सकते हैं इसका हमे अंदाजा तक नहीं मिल पाता,इसका हमे अंदाजा तक नहीं लग पाता
हम अभी कितने उजालें में हैं ये हमारे बीते हुए कल की सुबहों की ताजगी भरी सोचों पर निर्भर है
और हम जो दुखित होते हैं वो हमारे कल में सोची गयी ग़लत सोच की वजह से है

मेरी आम सोच पर ही ज्यादा लिखने की कोशिश रहेगी । 
कुछ अतिमहत्वपूर्ण प्रश्न हमारी सोच,हमारे नज़रिए के परिपेक्ष्य में -
 
क्या सोचते हैं हम ? 
हमारे जीवन के उद्देश्यों का आधार क्या है ?   
हमारी सोच का आधार क्या है ?
हम स्वतंत्रता पसंद हैं या परतंत्रता ?

एक एक शब्द को बहुत ध्यान से समझना होगा । एक एक शब्द पर बहुत ध्यान देना होगा और उससे ज्यादा इस बात पर की बात कितनी सच है और सही दिशा क्या है ? कैसे सही दिशा पायें ?

तो पहला प्रश्न की क्या सोचते हैं हम ?

यदि हमारी सोच का खाका खींचा जाए तो हम देखेंगे की हमारी सोच हमारे आस पास रहने वाले लोगों के अधीन हैं । ये कैसी सोच है ? ये ऐसी सोच है जिसे विचार जगत में आम सोच से देखा जाता है यानि अधिकतर लोग आस पास के लोगों,दोस्तों,रिश्ते-नातों के प्रति राग-द्वेष में ही अपने जीवन की असली शक्ति अथार्त विचार शक्ति निकाल देते हैं

 ये राग-द्वेष क्या है? अथार्त कुछ लोगों के प्रति हम अच्छा भाव रखते हैं और कुछ के प्रति अच्छा नहीं तो पहला भाव राग और दूसरा द्वेष में आया । यानी हमारा दिन का अधिकतर ग्राफ इसी राग-द्वेष के ग्राफ में सिमट के रह जाता है और हम जान ही नहीं पाते की विचार के नक़्शे में जहाँ विचार की असली परिधि शुरू होती है हम अपने तथाकथित राग-द्वेष के ग्राफ को लेके कहीं किनारे उलटी दिशा में पड़े होते हैं,बढ़ रहे होते हैं

दूसरा प्रश्न  

हमारे जीवन के उद्देश्यों का आधार क्या है ?

हमारे जीवन के उद्देश्य कई बार तो तो जो बचपन से ही हमारे मन में भर दिया जाता है वोही बनने हम निकल पड़ते हैं या फिर यदि सयाने होने पर हमे चुनना होता है तो हम अधिकतर दूसरे को देखके या दूसरों को देखके ही बनाते हैं


तीसरा प्रश्न 

हमारी सोच का आधार क्या है ?

इसका उत्तर हम आम जनता के लिए आम सोच ही पायेंगे यानि जैसा सोच का आधार (संस्कार रूप में ) हमे मिला है थोड़ा हम उसे बढाते हैं और थोडा हम अपने को होशियार समझके अपनी समझ से उसी होशियार दुनिया से लेते हैं जिसकी सोच आम है । इसे समझना होगा ये प्रश्न बहुत महत्त्वपूर्ण है,सबसे महत्त्वपूर्ण है

एक चुटकुला सुनिए :
एक आदमी दूसरे से : क्यूँ भाई सुना है तुमने बड़ी आलीशान कार खरीदी है ?

दूसरा : हाँ यार ! खरीदी तो है क्या करता बगल वाले ने खरीदी तो मुझे भी खरीदना पड़ा ? बड़ा अकड़  रहा था खरीद के !!

पहला आदमी : अरे चलो ठीक है भाई  अब मिठाई विठाई तो कुछ खिलाओ

दूसरा : खिलाऊंगा यार, अभी कुछ पैसे देना पेट्रोल भराना है


हम दिखावे में ज़िन्दगी बिता रहे हैं और इस तरह से बिता रहे हैं की दिखावा ही हमे ज़िन्दगी लगने लगता है
हम दिखावे को ही ज़िन्दगी मानने लगते हैं
  

चौथा प्रश्न 

हम स्वतंत्रता पसंद हैं या परतंत्रता ?

ये प्रश्न हमारे विचारों के अन्तःरूप को प्रकट करता है । हम कितने कायर हैं,बुजदिल हैं अथवा बहादुर है ये हमारे दूसरों को सम्मान देने और अपमान देने पर निर्भर करता है । एक कायर सोच का सदैव दूसरे को डराने में यकीन होगा और बहादुर सोच वाला दूसरे को बढाने में विश्वास रखेगा
चोर को सब चोर ही नज़र आयेंगे,जेल के कैदी ही दिखाई पड़ेंगे और जो चोरी नहीं करता वो सबको अपने जैसा ही देखेगा । हमारी सोच की संकीड़ता या विस्तारता ही रिफ्लेक्ट करती है की हम दूसरों को बढ़ते हुए देखना पसंद करते हैं या ये हमसे सहा नहीं जाता । हम अन्दर कितने अधिक सुख से भरे हैं या विषाद से ये इस बात से पता चलता है की हम समाज में क्या दे रहे हैं । हम कितने सकारात्मक और नकारात्मक है ये हमारे स्वयं के आस पास के माहौल में स्वयं के किये बर्ताव से ही पता चलता है । आम सोच स्वतंत्रता पसंद है या परतंत्रता तो इसमें कोई दो राय नहीं की परतंत्रता पसंद है । क्यूंकि बड़े स्तर से देखें हम तो पाएंगे की पिछले 5000 सालों में 25000 युद्ध हो चुके हैं ये बात कैसी सोच का प्रतिनिधित्व करने वाले समाज को बताती है । आज भी लगभग सभी देश परमाणु बमों से स्वयं को सुसज्जित करना चाहते हैं और शान्ति पर बात करने वाले कितने देश हैं उनके बारें में हम कहाँ सुन पाते हैं

क्या हमने कभी सोचा है की काल तत्व से अथार्त समय से कोई नहीं जीत सका । क्या हमने सोचा है की जहाँ हम अभी इमारतें देखते हैं कोई लाख साल पहले वहां खंडहर व पहाड़ थे और फिर वोही होंगे परन्तु फिर भी हम ऐसे जीते हैं जैसे हमारी मृत्यु होगी ही नहीं तभी तो हम बेफिक्र होके ग़लत दिशा में सोचते हैं और ज़िन्दगी से कुछ नहीं सीखते हैं,आध्यात्मिक ज्ञान को महत्व नहीं देते । 





 

 

Monday 9 July 2012

ध्यानयोग 9

आध्यात्मिक पथ पर झुकाव और जुड़ाव के बाद मैं अधिक समय नेट को नहीं दे पाता कारण समय की कमी के अलावा स्वयं का संसार से ज्यादा जुड़ाव न चाहना है । संसार से ज्यादा जुड़ाव से अभिप्राय यही है की सत्संग को पसंद तो बहुत लोग करते हैं लेकिन उस पर चर्चा बहुत कम किया जाता है ।
सत्संग के बगैर गया सारा वक़्त मेरा मानना है कूड़े के सामान है निरर्थक है और सत्संग में गया सारा समय एक ऊर्जा है,एक चैतन्यता है एक दीप है जो उर को अथार्त ह्रदय को सदा ज्ञान से प्रकाशमान रखता है ।
 मैं दोष भी नहीं देता की समाज में सत्संग अधिक क्यूँ नहीं होता क्यूंकि गीता में ही भगवान् ने बताया है की समस्त मानव जाति अधिकतर रजोगुण से ही प्रभावित रहती है । सतोगुणी लोग हमेशा से ही समाज में कम रहे है क्यूंकि वो अनासक्त होते हैं,आडम्बरहीन होते हैं ।
रजोगुण का  आधार ही आसक्ति और कामना है और कामना की पूर्ती में हिंसा (मानसिक) पनपेगी ही और अशांत वातावरण में तुरीयातीत अवस्था पर बात हो ये विचार ही हास्यास्पद है ।

तुरीयातीत अवस्था पर लिखी जाने वाली पोस्ट्स पर मौन ही टिप्पड़ी हो सकता है इसलिए मैंने कमेंट्स का ऑप्शन नहीं रखा और कोई वजह नहीं है ।
कुछ समय ही मैं ब्लॉग्गिंग जगत में काफी एक्टिव रहा जिसके फलस्वरूप कई ब्लोग्स पर गया और अब नहीं जा पाने पर भी कुछ ब्लोग्गेर्स ने इसे ग़लत नहीं लिया है क्यूंकि
इनकी सोच का आधार गुणवत्ता है टिप्पड़ी नहीं ।
कुछ सरल लोगों ने अपने उद्गार भेजे हैं जिनमे से एक कमेन्ट आदरणीय श्री अशोक जी का है :
 
आप की पोस्टें ज्ञान बड़ाने के लिए हैं हम जैसों की टिप्पणी पाने के लिए नही शुभकामनाएँ! on ध्यानयोग 8
on 6/24/12

मैं उनका आभार प्रकट करना चाहता हूँ की वो सतत पोस्ट्स को पढ़ते रहते हैं ।

मैं उनसे बहुत छोटा हूँ और यही कहूँगा की आप गुणी,अनुभवी और सत्संगप्रिय लोगों से ही परोक्ष,अपरोक्ष रूप से सीखता रहता हूँ ।
मैं ह्रदय से उनलोगों का भी शुक्रिया करना चाहता हूँ जो इस कलिकाल में जहाँ इंसान विवेक को महत्व नहीं दे पाता निरंतर पोस्ट्स को पढ़ते रहे हैं और आशा है लाभान्वित होते रहे हैं ।
कोई भी प्रश्न ध्यान के सम्बन्ध में प्रबुद्ध पाठकों को यदि है या आये और वो पूछना चाहें तो मुझे मेल कर सकते हैं ।
कुछ लोगों ने एनानीमस बनके कमेंट्स भेजे हैं उनमे एक प्रश्न भी आया है की ध्यान क्यूँ किया जाए ?
मैं अनुरोध करूँगा की हो सके तो वैलिड आई-डी से आये या अपना नाम ज़रूर लिखें । इससे आप और सहजता से सहज प्रश्न कर सकेंगे ।
मेरी कोशिश इन पोस्ट्स के माध्यम से यही है की इस तरह विस्तार से बढूँ की बिना प्रश्न के ही ज्यादा से ज्यादा समाधान लिख दूँ इसीलिए स्वयं भी समय समय पर ध्यान सम्बन्धी प्रश्न उठाकर समाधान लिखता रहा हूँ ।

पुनः प्रसंग पर चलते हैं और ध्यान क्यूँ किया जाए इस प्रश्न पर मैं इतना ही कहूँगा की इसी श्रंखला की शुरूआती पोस्ट्स देखें ।

बाकी एक वाक्य में उत्तर यही है की हम अपने सहज स्वरुप को ध्यान द्वारा ही जान सकते हैं,उसमे ध्यान द्वारा ही स्थित हो सकते हैं,ध्यान ही हमारा सहज स्वरुप है ।


विचारशून्यता,कामनाशून्यता की परिणीति ध्यान है अथार्त  विचारशून्यता प्रारंभिक सीढ़ी है,पहला चरण है और दूसरा चरण है कामनाशून्यता ।

यदि हम अनुभव करें अथार्त सोचें तो पायेंगे की विचारशून्यता मतलब निर्विचार चेतना और इस अवस्था के द्वारा अपने आप ही हमारे मन की शुद्धि होने लगती हैं
कलुषित विचार जाने लगते हैं और निर्मलता आने लगती है परन्तु कामना अथार्त विभिन्न सांसारिक इच्छाएं सूक्ष्म स्तर पर विद्यमान रहती है और वो चित्त को स्थिर नहीं रहने देतीं ।
मैं कहूँगा इसकी चिंता छोड़कर आगे तीसरे चरण पर बढ़ जाना चाहिए जो की है अहंकारशून्यता ।
व्यक्ति अहंकारशून्य होकर ही सही अर्थों में कामनाशून्य हो पाता है । अहंकार अथार्त मैं-पन यही आधार है हमारे चित्त का और जब मैं ही न रहा तो हम सोचेंगे क्या ?
व्यक्ति की इच्छाएं उसके वजूद से हैं लेकिन यदि उसने अपने वजूद ही खो डाला,मिटा दिया यानी जब आधार ही न रहा तो इच्छाओं की इमारत किस पर खड़ी होगी ?
नहीं,नहीं खड़ी हो सकेगी ।
यानी हमे ध्यान में बिना भय के अपने आप को खो देना है,मिटा डालना है,परमात्मा में अपनी आत्मा को बिना किसी संदेह के डुबो देना है ।
हमे ये समझना होगा की हम लहर हैं और परमात्मा समुद्र और लहर का वजूद वैसे भी समुद्र के बिना कुछ भी नहीं और अभी हम समुद्र से अलग हैं, अपने आपको समुद्र से अलग समझते हैं जबकि अलग बिलकुल नहीं हैं ।
जैसे बारिश की बूँदें धरती पर गिरें और सोचें की वो आसमान से पृथक हैं तो ऐसा बिलकुल नहीं क्यूंकि तत्वतः आसमान और पृथ्वी एक हैं ।
जैसे सूर्य की छाया पानी पर पड़े और वो छाया अपने को सूर्य से अलग मान ले तो उसके अलग मानने से ये सच नहीं हो जाएगा ।
जैसे अलग अलग घरों में जाने वाली बिजली को हम अलग अलग मान लें लेकिन ऐसा है तो नहीं क्यूंकि मूल स्रोत तो विद्युत का एक ही है,विद्युत ही बल्ब आदि के माध्यम से प्रकाश देती है उसी तरह समस्त जीव परमात्मा के द्वारा ही संचालित हैं और परमात्मा ही उनमे चेतन तत्त्व है वस्तुतः जीव शब्द है ही नहीं,आत्मा ही परमात्मा है,परमात्मा के सिवाय कुछ भी नहीं है ।

जब तत्त्व से हम ये समझ लेते हैं फिर ये भी समझ जाते हैं की स्वयं को परमात्मा से अलग मानने के कारण ही आत्मा का अलग वजूद हुआ जिसे अहंकार कहते हैं और फिर मन बुद्धि के खेल में पड़कर हम अपने अहंकार को और पुष्ट करते रहें । वो भी उस मैं-पन का पोषण करते हैं हम जो तत्वतः विद्यमान ही नहीं है ।


तो स्वयं के इस मैं-पन को हम ध्यान द्वारा ही समाप्त कर सकते हैं । स्वयं की खोज है ध्यान और स्वयं को खोना है समाधि ।

इसमें कुछ भी जल्दी करने की आवश्यकता नहीं है इसे तत्व से समझना ज़रूरी है इसे अनुभव करना पड़ेगा और उसके लिए ध्यान में उतरना पड़ेगा ।
ध्यान कुछ और नहीं स्वयं को खो जाना ही है,स्वयं को मिटा डालना ही है,जीते हुए मृत्यु का अनुभव करना ही है क्यूंकि तब जाकर ही हम वास्तविक जीवन में प्रवेश कर पाते हैं ।

आज मैं सांख्य की इस पोस्ट पर ध्यान के लिए कुछ निर्देश कहूँगा क्यूंकि अब इसका समय आ गया है इसके बाद वाली पोस्ट पर योग द्वारा ध्यान की उपलब्धि का प्रयास करूँगा ।

अभी केवल सांख्य अथार्त श्रवण के द्वारा हम ध्यान को उपलब्ध हो रहे हैं ।



सबसे पहले अपनी आँखें बंद कर लें और 10-15 गहरी सांस ले लें और जो भी विचार आ रहे हैं उनपर ध्यान न दें । स्वयं को आपने ये दस मिनट दिए हैं ऐसा सोचें ।

सोचें की बहुत संसार को सोच लिया संसार में आसक्त हो लिए,संसार में सुख ढूंढ लिया आगे भी ढूंढते रहेंगे लेकिन अभी ये वक़्त मैं अपने आपको दे रहा हूँ और पूरी इमानदारी और तन्मयता से दे रहा हूँ । मुझे सोचना है तो अपनी चेतना को, चेतना जो निर्विचार है । मैं कोई कामना अभी नहीं कर सकता क्यूंकि ये दस मिनट मैंने अपने आपको दिए हैं और मेरा स्वरुप कामनारहित है,सिवाय परमात्मा के संसार की कोई भी कामना मुझे सुख पहुंचा ही नहीं सकती । लेकिन मैंने ऐसा कभी सोचा ही नहीं और अपने मन को ही अपना स्वरुप मानकर मैं इच्छाओं का गुलाम हो गया और लाखों,करोड़ों जन्म निकाल दिए झूठे सुख को ढूढने में और हर जन्म में कुछ नहीं पाया लेकिन हर जन्म में फिर सांसारिक सुख को ही लक्ष्य बनाया । मुझे रास्ता मालुम नहीं था क्यूंकि मैंने खोजा ही नहीं । लेकिन अब मैं असली घर आ गया हूँ,स्वयं का स्वरुप आत्मा है जान चुका हूँ  । आत्मा जो की परमात्मा का अंश है,आत्मा जो की शाश्वत है,अजन्मा और सनातन है । आत्मा हूँ जो स्वभाव से ही सम है,शांत है,निर्विकार है जिसमे राग-द्वेष उत्पन्न ही नहीं हो सकते । मेरा मैं-पन भी मुझसे छूट रहा है,मुझे अपने इस मैं-पन को भूल जाना होगा क्यूंकि इसे छोड़ने के बाद ही वो दरवाज़ा खुलेगा जिसके दूसरी तरफ परमात्मा है । मुझे सबकुछ देने वाला मेरा परमात्मा कितना कृपालु है और अब स्वयं का भान भी करा रहा है,अब स्वयं को भी दे रहा है । मैं कितना कृतघ्न की परमात्मा से परमात्मा को छोड़कर विनाशशील पदार्थ ही मांगता रहा कितनी छुद्रता है मुझमे और ऐसा मैं कितने जन्मों से कर रहा हूँ नहीं अब मुझे कृतज्ञता प्रकट करनी है और स्वयं को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देना है । अब परमात्मा से परमात्मा को भी नहीं मागुंगा क्यूंकि वो तो हमेशा ही मेरे साथ था,मेरे साथ है । हे प्रभु तुमसे करुणा भी करुणा पाती है मैं तुममे समां रहा हूँ ये आत्मा अब परमात्मामय हो रही है ।
अब ये नदी समुद्र में मिल रही है,मिल गयी है मिल चुकी है ।
कुछ समय तक अपने को परमात्मा में डूब जाने दें ।

धीरे धीरे आँख खोलें और अभी के किये अनुभव को अनुभव करें । आपका मन एक अलग ही उल्लास से भर उठेगा ।
  

ॐ शान्ति: ! ॐ शान्ति: ! ॐ शान्ति: !