Tuesday, 28 June, 2011

श्रीमद भगवद गीता (Srimad Bhagwad Gita)

अध्याय 18

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥

 अर्थ :  तुझे यह गीता रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति-(वेद, शास्त्र और परमेश्वर तथा महात्मा और गुरुजनों में श्रद्धा, प्रेम और पूज्य भाव का नाम 'भक्ति' है।)-रहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिए तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिए॥67॥ 


भावार्थ : यहाँ भगवान् हमे बता रहे हैं की अनमोल वस्तु का महत्व उसकी विशेषता जानकारी पर ही होता है,
इसलिए भगवान् बता रहे हैं की ऐसा ज्ञान जो इसका अधिकारी हो उसे ही देना चाहिए और उसे ही मिलना चाहिए । अश्रद्धा और अनमने भाव से सुनने वाला इसके तत्त्व को नहीं प् सकता ।



य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥



अर्थ :  जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा- इसमें कोई संदेह नहीं है॥68॥ 



भावार्थ : यहाँ भगवान् गीता के वचनों को किसी भी प्रकार अधिकारी व्यक्तियों से कहने का महातम्य बता रहे हैं की जैसे व्यक्ति का इसे सुन कर समझ कर मनन कर उद्धार होता है वैसे ही इसे सुनाने वाला अथार्त इसका ज्ञान बाटने वाला भी प्रभु को ही प्राप्त होता है ।



न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥



अर्थ :  उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है तथा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं॥69॥ 



 भावार्थ : यहाँ भगवान् और विस्तार से इस ज्ञान भक्ति को बताने वाली गीता के उपदेशों को बाटने के पुण्य का 
महात्म बता रहे हैं । भगवान् का इस्पष्ट कहना है की गीता का पालन जीवन में करने से व्यक्ति अपने चारो उद्देश्य (धर्म, अर्थ ,काम, मोक्ष  )पा जाता है । चारों तरह के भक्त आर्त, अथार्थी जिज्ञासु और ज्ञानी गीता से अपने अपने मार्गानुसार माढ़दर्शन प्राप्त करते हैं ।इसलिए भगवान् इसके ज्ञान के प्रसाद को वितरित करने वाले को 
अपना अति प्रिय मानते हैं ।

Saturday, 25 June, 2011

Srimad Bhagwad Gita



 अध्याय १८
Chapter 18

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्‌ ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्‌ ॥

 
अर्थ :  कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों के कर्मों का तो अच्छा, बुरा और मिला हुआ- ऐसे तीन प्रकार का फल मरने के पश्चात अवश्य होता है, किन्तु कर्मफल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों के कर्मों का फल किसी काल में भी नहीं होता॥12॥ 
Meaning :  Results of the three kinds of activities accrue after death,leading to hellish planets/leading to heavenly spheres and to the human worlds imbetween for those desiring the results of the actions;but it never happens with renunciate.


 Explanation: A man has to follow a cycle of birth and death, and he is born in good and  evil wombs,because of his nature of assmuming affinity with the matter.A man is free in purifying his nature, by rooting out desire, attachment and identification with matter.
When a man having renounced his egoism,takes reuge in the Lord,his nature is purified.

When a man's nature is purified, he does not incur sins,by performing actions,ordained by his own nature.
Similarly,a karmyogi renounces attachment and aversion,his nature is purified.Then actions by him are performed for the welfare of the world,automatically.He will attain salvation(self realization,benediction) i.e Moksha through his deeds.


ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥ 
अर्थ :  हे अर्जुन! शरीर रूप यंत्र में आरूढ़ हुए संपूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है॥61॥

Meaning: The Lord dwells in the heart of all beings,O Arjuna causing them by his illusive power,in accordance with their nature,as if they are mounted on a wheel of the body.

Explanation: Just as water pervades everywhere under the earth but can be received from a well,similarly, the Lord pervades everywhere,yet heart is his special residence.
All being revolve according to their own nature,by drawing inspiration and energy from the Lord.As per nature persons of good nature performs virtuous deeds and of evil nature performs evil deeds.Thus one's own nature is responsible for the performance of good and evil deeds.Unlike birds,beasts and other creatures,a man is free in purifying his nature or in sullying it. The Lord by his grace has bestowed upon us this human body, so that we can attain salvation.



Thursday, 23 June, 2011

Saankhyayog

सांख्ययोग 
अध्याय २ 

Chapter 2 

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥

Just as in the physical body of the embodied being is the process of childhood,youth and old age;
similarly by the transmigration from one body to another the wise are never deluded.


अर्थ: जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।13॥ 



भावार्थ : यहाँ भगवान् कह रहे हैं की आत्मा हमारा स्वरुप है। शरीर नहीं शरीर के साथ सम्बन्ध मानने से ही हममें मोह और अज्ञान आता है और हम अज्ञानवश दुखी होते हैं। परन्तु जब हम अपने स्वरुप में विद्यमान रहते हैं तब शरीर के प्रति मोह नहीं रहता और आत्मा की शाश्वतता को अनुभव करते हुए हम कर्म करते हैं,निर्लिप्त रहते हैं।



मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥



 O Arjuna, only the interaction of the senses and sense objects give cold,heat,pleasure and pain.These things are temporary,appearing and disappearing; therefore try to tolerate them.


अर्थ: हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर॥14॥



भावार्थ  : यहाँ परमेश्वर कह रहे हैं इन्द्रिय व इनके विषय तथा मन बुध्ही सब ही अनित्य हैं, विनाशशील हैं चूँकि ये आरम्भ होते हैं अतः इनका अंत भी होना होता है और होता है। आत्मा इस शरीर में रहते हुए अपने प्रारब्ध को भोगती है इसलिए स्वाभाविक है की सुख दुःख मिलेंगे ही इसलिए व्यक्ति को उन्हें सहना चाहिए अथार्त उनके प्रति उदासीन रहना चाहिए क्यूंकि अनित्य की सत्ता हो ही नहीं सकती । 



यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥

 O noblest of men,that person of wise judgement equipoised in hapiness and distress,whom can not be disturbed by these is certainly eligible for liberation.



अर्थ : क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है॥15॥ 
 भावार्थ :  यहाँ परमात्मा व्यक्तियों पर अति विशेष कृपा करते हुए अति गूढ़ रहस्य भी उजागर कर देते हैं। जीवन का सारगर्भित तत्त्व बताते हुए वो इस्पष्ट कर देते हैं की इन्द्रियां और उनके विषय ही व्यक्ति को मोक्ष अथार्त परम शांति व परमपद से दूर रखते हैं क्यूंकि ये व्यक्ति को मोहित रखते हैं और सदा ही पतन की तरफ ले जाते हैं।  पतन की तरफ ले जाने का तात्पर्य यही है की वो व्यक्ति को उसके स्वरुप का भान नहीं होने देते हैं और व्यक्ति उन्हें ही सबकुछ समझकर स्वयं को शरीर मान कर अपने अविनाशी स्वरुप को भुला बैठता है और इस तरह से जो की उसका उद्देश्य था परमात्मा उसे भुला कर अपने ही अधीन रहने वाले और कई समय से मूर्ख बनाने वाले मन बुध्ही से प्रेरित इन्द्रियों के विषयों से व्याकुल होकर इनमे सुख है ऐसा मान निरंतर अधोगति को प्राप्त होता है । परन्तु जब वो अपने स्वरुप को जा जाता है परमशान्ति को प्राप्त हो जाता है और तब वो सुख दुःख को समान समझता है और उनसे विचलित या व्याकुल नहीं होता ।

Happy Father's day - Ma Baap ki sewa apne aap me Phal hai


दिन भर की भाग दौड़ में याद ही नहीं रहता ये
रोज़ मिलना बातें करना पर फिर भी दिल भूल जाता ये
फादर्स डे पर क्या पापा को विश करने की ज़रूरत है
फिर दिल कहता है अरे पगले उन्हें कैसे पता चलेगा आज फादर्स डे है
मम्मी को तो मदर्स डे पर विश करना अच्छा लगता है
पर पापा को विश करने में भी दिल घबराता सा है
उनके अनुशासन और प्रेम के आगे लेकिन संकोच टूट जाता है
उनके बलिदानों को याद कर आँखों में सावन उभर आता है


और दिल कहता है बोल दे बिंदास ,पापा आपका बेटा आपको बहुत चाहता है


ज़िन्दगी में जैसा भी हूँ आप की वजह से हूँ
अपनी किलकारियों को सुन सकता आपकी वजह से हूँ
मैं आप जैसा ज़रा भी अच्छा बन पाऊं और कोई तमन्ना नहीं
हाँ ये सच है मैं खुलके आपसे कभी ये बोल सकता नहीं
जीवन में आपने ही चलना हसना बोलना दौड़ना सिखाया
आपने ही तो दूसरों के ग़म में दुखित होना सिखाया
जब कभी पुराने खिलौनों से ऊब कर रोने लगा मैं
आपने पीठ पर बैठाया तो हसने लगा था मैं



ओ पापा मैं आपको कितना चाहता हूँ मैं कभी बता नहीं सकता
बस इतना है की आपके प्रति प्रेम को मैं छह कर छुपा नहीं सकता
प्यार मोहब्बत दोस्ती से पहले रिश्ता माँ -बाप का होता है हमसे
आप के लिए कभी लिखा नहीं पर आज ये खुद ही लिख गया मुझसे
जीवन में एक प्रतिशत भी आपसा बन सका तो जीवन सफल समझुंगा
आप ही तो मेरे असली हीरो हैं जानता नहीं क्या आपसे कभी ये कह सकुंगा
आपकी ही दी हुई प्रेरणा पल पल मुझे प्रोत्साहित करती है
ज़िन्दगी में मुश्किलें भी हल हैं बात कौंधा करती है


मैं आपको क्या दूँ क्यूँ की बेटा तो हमेशा बेटा ही रहता है
हाँ आपसे कह सकूँ या न पर आपका बेटा आपको बहुत चाहता है
माँ -बाप के आशीष से ही इंसान इंसान बनता है
माँ -बाप की सेवा करना अपने आप में फल होता है

Saturday, 4 June, 2011

Dohas of Saint Kabir ji (संत कबीरदास जी के दोहे ),


Chalti chakki dekh kar, dia Kabira roye
dui paatan ke beech mein,sabit bacha na koye

Looking at the grinding stones, Kabir laments
In the duel of wheels, nothing stays intact.
 
The grain that is put into wheel gets crushed and the converted flour comes out.  Thus the literal translation given above conveys that.Kabir cries out, however,  is what makes the reader to contemplate on this Doha and realize for oneself the hidden meaning behind this metaphor. Dui Patan here signifies earth (Prithvi) and sky (Akash) and within the ambit of these is all creation and life as also the manifestation of all natural phenomenon of dualities – day and night, life and death, joys and sorrows, thereby making life forever in motion (Chalti Chakki) and an ever changing process. Trapped in this duality, whatever we see is perishable. Nothing that we comprehend is eternal.


 Kabir sahab yahan kah rahe hain ki vyakti apne jeewan ka saar na samajhkar avivek se karm karta rahta hai aur use ye lagta hai ki vo amar hai aur ye sara sansaar sada ke lie hai,parantu jo aaya hai vo jayega isi sidhhaant ko pratipadit karte hue Kabir kahte hain ki hume apne jeewan ko vivek se jeena chahiye aur saarthak karna chahiye,aatmtatva ko samjhke usme isthit hona chahiye.

 

Bura jo dekhan main chala,bura naa milya koye
Jo munn khoja apnaa, to mujhse bura naa koye

I searched for the crooked, met not a single one
When searched myself, "I" found the crooked one
 

This doha deals with our perception behavior and tendencies. It has been invariably noticed that we tend to find fault with someone else for our situations and circumstances.   Our "I", the ego, always tries to put blame on others.   Non-awareness of our own self is the cause of this attitude.  Resultantly, we find ourselves being busy in criticizing and condemning others and conveniently term them as crooked or evil.
So Kabir says that instead of finding fault and maligning others, dive deep into your own-self.  Amazingly, an honest introspection will reveal that all fault lies with "me" and "my" own perceptions and attitudes. If there is any evil or crookedness, it is in "me".  Correcting this and opting for a loving and compassionate attitude will change one's perceptions and the world will appear wonderful all over again.


Yahan Kabir sahab kahte hain ki hume apne me avgun dekhna chahiye tabhi sachhe arthon me hum gunwaan banenge,doosron me kamiyan dekhne se hum apna drashtikon ko kharaab karte hain atah sabme achhaiyan dekhni chahiye.