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Friday, 20 January 2012

योग के अंग प्रत्याहार,धारणा ध्यान और समाधि

मेरा मानना है व्यक्ति के लिए अंतर्मुखी होना न सिर्फ सबसे ज़रूरी है बल्कि सही अर्थों में बहुत लाभदायक है ।
मनुष्य जीवन बिना अंतर्मुखी हुए व्यर्थ सिद्ध हो जाता है । यही नहीं बिना अंतर्मुखी हुए मनुष्य आत्मिक सुख नहीं पा पाता वरन वो सुख अपने ही तरह के इंसानों में ढूंढता रहता है । व्यक्ति जान ही ही नहीं पाता की उसका स्वरुप शरीर नहीं आत्मा है और चूँकि ऐसा अनुभव सिर्फ अंतर्मुखी होने से ही हो सकता है व्यक्ति ऐसा अनुभव  नहीं कर पाता और जीवन पूरा का पूरा बाहरी जगत के भ्रमजाल और दिखावे,आसक्ति,धन,बल,मान आदि में निकल जाता है ।
अंतर्मुखी होना आध्यात्मिक जगत के साथ साथ लौकिक जगत में भी बहुत उपयोगी है ।
सबसे बड़ी बात अंतर्मुखी न होना हमारे अन्दर जाने अनजाने विकारों को बढाता रहता है स्वाभाविक ही व्यक्ति के अन्दर काम,क्रोध,लोभ,मद,मोह,अहंकार नित बढ़ते चले जाते हैं,हम कोई भी साहसी कार्य करने से डरते हैं, हम सच बोलने,सुनने में डरते हैं, हम अपनी समीक्षा करने से घबराते हैं साथ ही हमारे अन्दर निर्णायक क्षमता भी कम होने लगता है और बहुधा हम किसी कार्य के निर्णय के वक़्त पर अविवेकपूर्ण कदम उठा लेते हैं ।इसके साथ ही हम बहुत सारे लोगों से घिरे रहते हैं और अपने सुख दुःख में उनपर ही निर्भर हो जाते हैं इस तरह से हम अपने आप से ही दूर हो जाते हैं और अपनी भावनात्मक ऊर्जा  को भी मोह माया में गवाने लगते हैं  यही नहीं अंतर्मुखी हुए बिना व्यक्ति स्वयं के दोष देखने का साहस नहीं कर पाता और परिणामतः दोष-दृष्टी का शिकार हो जाता है । वो हमेशा दूसरों में ही दोष ढूंढेने लगता है और इस तरह आत्मिक उद्धार से वंचित रह जाता है ।

आज से कुछ साल पहले मेरे एक मित्र (नेट मित्र नहीं ) ने मुझसे ये बातें कहीं और  फिर ये प्रश्न किया 
क्या तुम्हे याद है आखिर बार तुमने अपने आप से कब बात की थी ?
क्या तुम्हे याद है तुमने अपने आप से क्या बात की थी ?
कहीं ऐसा तो नहीं की अपने आप से बात करते वक़्त भी तुमने संसार की ही बात खुद से की और इस तरह से अपने आप से अपने आप के लिए बात ही नहीं कर पाए ?

ये बातें उनकी मुझे न सिर्फ अच्छी लगीं बल्कि सच्ची भी लगीं और अनुभव करने पर उसका वर्णन नहीं किया जा सकता बस इतना कहूँगा की मैं इस गुणवत्ता प्रधान वार्तालाप के लिए उनका बहुत कृतज्ञ हूँ ।



अंतर्मुखी होने के बाद ही हम योग के बारें में सोच पाते हैं योग को समझ पाते हैं और इस तरह से अध्यात्म में रत हो पाते हैं ।

हम जानते हैं की यम, नियम, आसन, प्राणायाम,प्रत्याहार धारणा ध्यान और समाधि योग के यह आठ अंग हैं ।

पर पहले पोस्ट की जा चुकी हैं ।

प्रत्याहार,धारणा ध्यान और समाधि के बारें में पातंजल
योगप्रदीप से कुछ उद्धत करना चाहूँगा ।

प्रत्याहार: यम नियम प्राणायाम आदि से चित्त बाहर
के विषयों से विरक्त हो जाता है और इसलिए इन्द्रियां भी अंतर्मुख होकर उस जैसा अनुकरण करने लगती हैं । इस प्रकार चित्त के निरुद्ध होने पर इन्द्रियों का भी निरुद्ध होना प्रत्याहार कहलाता है ।


धारणा : चित्त का वृत्तिमात्र से किसी स्थानविशेष(ध्येय) में बंधना धारणा कहलाता है ।
यहाँ स्थानविशेष को समझना आवश्यक है इसे ध्येय भी कह सकते हैं ।
ध्येय अथार्त वो स्थान जहाँ पर वृत्ति को ठहराया जाए जैसे नासिका का अग्रभाग,नाभि,हृदयकम, ब्रह्मरंध्र आदि आध्यात्मिक स्थान ।अथवा भगवान् का चित्र,चन्द्र आदि कोई बाह्य देशरूप वस्तु-विषय इसी को ध्येय कहते हैं ।


ध्यान - ध्येय में वृत्ति का एक सामान बने रहना ही ध्यान है ।
धारणा में चित्त जिस वृत्तिमात्र से ध्येय में लगता है,जब वह वृत्ति समानरूप से प्रवाहमान रहती है तो दूसरी और कोई वृत्ति बीच में ना आये इसी को ध्यान कहते हैं ।

समाधि :ध्यान के ही गहनतम रूप को समाधि कहते हैं। वह ध्यान ही समाधि कहलाता है जब उसमे केवल ध्येय अर्थमात्र में भासता है और उसका (ध्यान का) स्वरुप शून्य जैसा हो जाता है ।
ध्यान में ध्येय का भान होता है ध्येय मात्र का नहीं । किन्तु समाधि में ध्यान ध्येयमात्र से भासता है 
समाधि की अवस्था में ध्यान का सर्वथा अभाव नहीं होता किन्तु ध्येय में अभिन्नरूप होकर भासने के कारण स्वरुप से शून्य जैसा हो जाता है ।
समाधि अंगी है धारणा और ध्यान उसके अंग हैं जब किसी ध्येय पर ध्यान किया जाता है तब चित्त की वृत्ति त्रिपुटी सहित होती है ।
वह त्रिपुटी ध्यात्र,ध्यान और ध्येय रूप है ।
त्रिपुटी को जिसका उपरोक्त वर्णन है । 
ध्यात्र - ध्यान करने वाला आत्मा से प्रकाशित चित्त है ।
ध्यान -चित्त की वो वृत्ति जिसके द्वारा ध्यान किया जाता है ।
ध्येय - जिसका आध्यात्मिक अथवा बाह्य वस्तु आदि का ध्यान किया जाए ध्येय कहलाता है ।
ध्यान के समय इस प्रकार अलग अलग भान होता है की मैं ध्यान कर रहा हूँ,यह ध्यान है,इस ध्येय का ध्यान हो रहा है ।परन्तु समाधि में इस त्रिपुटी का भान जाता रहता है और केवल ध्येय के स्वरुप का ही भान होता रहता है । 
उदाहरणार्थ हम भगवान् के किसी विग्रह अथवा चित्र या स्वयं की ही भृकुटी पर ध्यान करते हैं । अभ्यास करते करते एक ऐसी स्थति आती है जब कौन ध्यान कर रहा,ध्यान हो रहा है ये दोनों नहीं रहते इसका अनुभव भी व्यक्ति को नहीं होता बल्कि ध्येय ही रह जाता है । इसे ही समाधि कहते हैं ।

Tuesday, 6 December 2011

प्राणायाम

प्राणायाम के शारीरिक लाभ से कहीं अधिक मानसिक व उससे भी अधिक आध्यात्मिक लाभ हैं ।
श्रीमद भगवद्गीता में भगवान् ने बताया है की व्यक्ति प्राणायाम के द्वारा सहजता से अपने सहज रूप में स्थित होने लगता है । प्राणायाम को निरंतर करते रहने से बहुत शीघ्र अंतःकरण शुद्ध होता है व एक तो जीव के मन और बुद्धि से होने वाले कर्मों में विकार भाव कम होने लगते हैं । साथ ही बाहर से मिलने वाले विकारी भाव उसके अविकारी स्वरुप को अव्यवस्थित नहीं कर पाते क्यूंकि तत्वतः वो उसके स्वयं की ही मनोवृत्ति के भाव होते हैं ये जीव तत्त्व से जानने लगता है ।व्यक्ति सहज,सम व शांत अवस्था को प्राप्त रहता है इससे व्यक्ति आनंद में रहता है व भगवत उपासना,भजन आदि अंतःकरण शुद्धि के कारण सहज व स्वाभाविक रूप से आनंददायी लगने लगते हैं ।
ब्रह्म शांत है सम है अविकारी है अविनाशी है शाश्वत है सनातन है सर्वव्याप्त है अनंत है अवर्णनीय है ऐसा तत्त्व से भलीभांति योग से जाना जा सकता है और प्राणायाम इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।

भगवान् ने चौथे अध्याय में कहा है -

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥
भावार्थ : कितने ही योगीजन अपान वायु में प्राणवायु को हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायु में अपान वायु को हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करने वाले प्राणायाम परायण पुरुष प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों (कर्मों) द्वारा पापों का नाश कर देने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं॥29-30॥


यहाँ भगवान् प्राणायाम के अंतर्गत प्राण वायु व अपान वायु की महत्ता बता रहे हैं व प्राणायाम में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका बता रहे हैं क्यूंकि श्वास पर्श्वास में प्राणवायु व अपानवायु की भूमिका होती है ।प्राण वायु का स्थान ह्रदय  तथा अपान वायु का गुदा है।श्वास को बाहर निकालते समय वायु की गति ऊपर की ओर तथा श्वास को भीतर ले जाते समय वायु की गति नीचे की ओर होती है ।
योगीलोग चन्द्र नाडी अथार्त बायीं नासिका से पूरक करते हैं अथार्त भीतर ले जाते हैं वहां वह वायु ह्रदय में स्थित प्राणवायु को साथ लेकर नाभि से होते हुए अपान में लीन हो जाती है । तदनंतर वे प्राणवायु व अपानवायु दोनों की गति को रोक देते हैं अथार्त कुम्भक करते हैं जिससे श्वास ना तो बाहर जाता है और ना ही अन्दर जाता है ।
इसके बाद वे सूर्य नाडी अथार्त दाहिनी नासिका के द्वारा श्वास को बाहर निकालते हैं यानी रेचक करते हैं ।
वह वायु प्राण वायु के साथ अपानवायु को साथ लेकर बाहर निकलती है यही प्राणवायु में अपानवायु का हवन करना कहा जाता है ।
सामान्यतः  पूरक कुम्भक रेचक में १:४:२ के समय का अनुपात रखा जाता है जैसे भगवान् का नाम या फिर गायत्रीमंत्र जपते हुए पूरक में ४ बार कुम्भक में सोलह बार व रेचक में आठ बार किया जाता है ।
इसी प्रक्रिया को फिर उल्टा किया जाता है सूर्य नाडी (दाहिनी नासिका ) से पूरक,फिर कुम्भक व फिर चन्द्र नाडी से रेचक करते हैं ।
इस तरह से 
पूरक-कुम्भक-रेचक करना 
व रेचक-कुम्भक-पूरक करना ही प्राणायाम है,प्राणायाम रुपी यज्ञ है ।
इसके साथ ही भगवान् नियमित (संतुलित) आहार व संयम (मानसिक) को प्राणायाम में अत्यंत आवश्यक बताते हैं श्रीमद भगवद्गीता(६/१३-१७)  
प्राणों का प्राण में हवन करने का तात्पर्य है प्राणों का प्राण में और अपान का अपान में हवन करना अथार्त प्राण और अपान को अपने अपने स्थान पर रोक देना ना श्वास बाहर निकालना और ना श्वास भीतर लेना इसे स्तम्भवृत्ति प्राणायाम भी कहते हैं ।
इस प्राणायाम से स्वाभाविक ही वृत्तियाँ शांत होती हैं और पापों का नाश होता है साथ ही मानसिक पाप व विकार भी कम होने लगते हैं व एक समय के बाद विकार आते ही नहीं संपूर्ण यज्ञ (कर्म) केवल कर्मों से सम्बन्ध विच्छेद करने के लिए ही हैं भगवान् कहते हैं ऐसा जानने वाले ही यज्ञवित अथार्त यज्ञ रुपी निष्कामभावकर्म  को जानने वाले हैं ।

Sunday, 4 December 2011

पंच कोश,पंच प्राण प्राणायाम व योगासन

प्राणायाम से पहले ये जानना आवश्यक है की पंच कोश क्या हैं?

त्रिगुणमयी(सत्व,रज व तम ) माया से मोहित होने की वजह से ईश्वर के अंश आत्मा पर विकारों का एक आवरण चढ जाता है, जिसकी वजह से आत्मा ही जीवात्मा कही जाने लगती हैं। हमारे प्राचीन मनीषियों ने हमारी विशुद्ध आत्मा पर पड ने वाले उन आवरणों को कोश या शरीर भी कहा है जिनकी संखया पांच बतलायी गयी है। इन्हें पंचकोश कहकर ही इंगित किया करते हैं। ये पांचों इस प्रकार हैं - 

१. अन्नमय कोश :- आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी - इन पंच महाभूतों से निर्मित हमारे भौतिक स्थूल शरीर का यह पहला आवरण अन्नमय कोश नाम से प्रसिद्ध है। हमारे स्थूल शरीर की त्वचा से लेकर हड्डियों तक सभी पृथ्वी तत्व से संबंधित हैं। संयमित आहार-विहार की पवित्रता, आसन-सिद्धि और प्राणायाम का नियमित अभ्यास करने से अन्नमय कोश की आवश्यक शुद्धि होती है। जब हमारे अन्नमय कोश की शुद्धि हो जाती है तब हमारे स्थूल शरीर का समुचित विकास होता है।

२. प्राणमय कोश :- हमारे शरीर का दूसरा सूक्ष्म भाग प्राणमय कोश कहा जाता है। हमारे स्थूल शरीर और हमारे मन के बीच में प्राणमय कोश है जो एक माध्यम का काम करता है। ज्ञान और कर्म के सम्पादन का समस्त कार्य प्राण से बना प्राणमय कोश ही संचालित किया करता है। हमारे द्वारा श्वांसों को लेने व छोड़ने की प्रक्रिया में भीतर-बाहर आने-जाने वाला प्राण हमारे शरीर के समस्त क्रियाशीलता को बनाये रखने और आवश्यक ऊर्जा प्रदान करने के महत्वपूर्ण कार्य को संपादित किया करता है जो स्थान तथा कार्य के भेद से १० प्रकार का माना जाता है। उनमें व्यान, उदान, प्राण, समान और अपान मुखय प्राण हैं तथा धनंजय, नाग, कूर्म, कृंकल और देवदत्त उपप्राण कहे जाते हैं।

हमारे प्राणों द्वारा संपादित होने वाले प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं - भोजन को सही ढंग से पचाना, शरीर में रसों को समभाव से विभक्त करना तथा उन्हें वितरित करते हुए देहेन्द्रियों को पुष्ट करना, खून के साथ मिलकर देह में हर जगह घूम-घूम कर वैसे मलों का निष्कासन करना, जो देह के विभिन्न भागों में एकत्रित होकर अथवा खून में मिल कर उसे दूषित कर दिया करते हैं। इतना ही नहीं, देह के माध्यम से विविध विषयों के भोग का कार्य भी हमारे प्राण ही संपादित किया करते हैं। प्राणविद्या की साधना के नियमित अभ्यास से हमारे प्राणमय कोश की कार्यशक्ति में भी समुचित वृद्धि होती है।

३. मनोमय कोश :- हमारे सूक्ष्म शरीर के इस पहले क्रिया प्रधान भाग को हमारे प्राचीन मनीषियों ने मनोमय कोश कहा है। मनोमय कोश में मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त को परिगणित किया गया है, जिन्हें अन्तःकरण चतुष्टय भी कहते हैं। पांच कर्मेन्द्रियां (वाणी,पैर,हाथ,गुदा व उपस्थ हैं, जिनका संबंध संसार के बाहरी व्यवहार से अधिक रहता है। मनोमय कोश पूरी तरह अन्तःकरण के क्रिया-कलापों के संपादन में अपनी महती भूमिका अदा करता है।

४. विज्ञानमय कोश :- हमारे सूक्ष्म शरीर का दूसरा भाग ज्ञान प्रधान है और उसे हमारे प्राचीन मनीषियों ने विज्ञानमय कोश कहा है। इसके मुख्य माध्यम ज्ञानयुक्त बुद्धि एवं ज्ञानेन्द्रियां(श्रवण,त्वचा,चक्षु,जिह्वा व नासिका ) हैं। जो मनुष्य पूरी समग्रता से समझ बूझ कर विज्ञानमय कोश का उचित ढंग से इस्तेमाल करता है और असत्य, भ्रम, मोह, आसक्ति आदि से पूरी तरह दूर रहकर हमेशा ध्यान आदि योगक्रियाओं का अभ्यास किया करता है, उसको उचित-अनुचित का निर्णय करने वाली विवेक युक्त बुद्धि बड़ी आसानी से प्राप्त हो जाती है।

५. आनन्दमय कोश :- हमारे प्राचीन मनीषियों ने इस कोश को हृदय गुहा, हृदयाकाश, कारण शरीर, लिंग शरीर आदि नामों से भी पुकारा है। यह हमारे हृदय प्रदेश में अवस्थित होता है। हमारे आन्तरिक जगत से इस कोश का संबंध बहुत अधिक रहता है और बाह्य जगत से बहुत कम। हमारे जीवित रहने, यानी हमारे स्थूल शरीर के कायम रहने और संसार के समस्त व्यवहारों के संपादित होने वाले क्रिया-कलाप भी इसी कोश पर अवलम्बित रहते हैं। किंतु इस कोश तक पहुंच पाना सबके लिए संभव नहीं हो पाता। वहां वही लोग पहुंच पाते हैं जो नियमित रूप से ध्यान आदि की साधना करते हुए निर्बीज समाधि तक पहुंचने में सफल हो जाते हैं। जो भी बड़भागी मनुष्य वहां तक पहुंचने में सफल होता है, वही हमेशा आनंद में लीन रहने वाली जीवन-स्थिति का उपभोग करता है ।

इन सभी कोषों का समाप्त  होना ही आध्यात्मिक अर्थों में उनका शुद्ध होना है क्यूंकि इससे ही जीवात्मा अपने स्वरुप में और सहजता से व्याप्त हो भगवत्पथ पर दृढ रहता है ।


यहाँ(उपरोक्त) प्राणमय कोश की शुद्धि में प्राणायाम महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।
प्राणायाम का शाब्दिक अर्थ है प्राण का आयाम अथार्त प्राण को एकसमान गति में करना ।
मनुष्य में प्राण पांच तरह के होते हैं अथार्त हम जो श्वास लेते हैं वो पांच प्रकार में विभाजित है ।
इसके साथ ही पांच उपभेद भी होते हैं ।




१. प्राण :- हमारे शरीर में कंठ से लेकर हृदय तक जो वायु कार्य करती है, उसे प्राण कहते हैं। प्राणों का यह पहला भेद है और यह नासिका-मार्ग, कंठ, स्वर-तंत्र, वाक-इन्द्रिय, अन्न-नलिका, श्वसन-तंत्र, फेफड़ों एवं हृदय को क्रियाशील कर उन्हें शक्ति प्रदान करता रहता है।

२. अपान :- प्राणों के दूसरे भेद को अपान नाम से जाना जाता है। यह हमारी नाभि के नीचे से लेकर पैरों के अंगूठों तक शरीर को क्रियाशील रखता है।

३. उदान :- हमारे शरीर में कंठ के ऊपर से लेकर सिर तक देह में अवस्थित होकर प्राणों का यह तीसरा भेद उदान कहा जाता है जो अपनी क्रियाशीलता के क्षेत्र में जीवनी शक्ति का समुचित संचार करता है। यह प्राण हमारे कंठ से ऊपर शरीर के समस्त अंगों यानी नेत्र, नासिका व सम्पूर्ण मुख मण्डल को वांछित ऊर्जा व तेज प्रदान किया करता है। हमारे शरीर में अवस्थित पिच्युटरी व पिनियल ग्रंथि सहित पूरे मस्तिष्क को भी यह उदान प्राण ही सक्रिय किया करता है।

४. समान :- हमारे शरीर में अवस्थित प्राणों के चौथे भेद को समान कहा जाता है जो हृदय के नीचे से लेकर नाभि तक शरीर में संचारित हो, उसे वांछित शक्ति प्रदान किया करता है। यह प्राण यकृत, आन्त्र, प्लीहा व अग्न्याशय सहित सम्पूर्ण पाचन तंत्र की आन्तरिक क्रिया प्रणाली को संचालित करते हुए वांछित शक्ति प्रदान करता है।

५. व्यान :- हमारे शरीर में अवस्थित प्राणों के पांचवें भेद को व्यान कहा जाता है जो पूरे शरीर में व्याप्त रहते हुए जीवनी शक्ति का संचालन करता है। शरीर की समस्त गतिविधियों को प्राणों का यह भेद नियमित तथा नियंत्रित करता है। हमारे सभी अंगों, मांसपेशियों, तन्तुओं, संधियों एवं नाड़ियों को गतिशील व क्रियाशील रखते हुए सभी आवश्यक ऊर्जा व शक्ति का हमारे शरीर में संचार किया करता है। प्राणों के इन पांचों भेदों के अतिरिक्त हमारे शरीर में देवदत्त, नाग, कृंकल, कूर्म व धनंजय नाम के प्राणों के पांच उपभेद हैं जो क्रमशः छींकने, पलक झपकाने, जंभाई लेने, खुजलाने, हिचकी लेने आदि की क्रियाओं को संचालित किया करते हैं।

 इस तरह से पुनः प्रमुख पांच प्राणों का कार्य है :


1. प्राण

2. अपान

3. समान

4. उदान

5. व्यान

श्वास पर नियंत्रण रखता है प्राण

प्रथम प्राण हमारी सांस की क्रिया पर नियंत्रण रखता है। यह वह शक्ति से जिससे हम सांस अंदर की ओर खींचते हैं और वक्षीय क्षेत्रों में गतिशीलता प्रदान करती है।

नाभि स्थान के नीचे क्रियाशील रहता है अपान

अपान उदर क्षेत्र के नीचे अर्थात् नाभि क्षेत्र के नीचे सक्रीय रहता है। मूत्र, वीर्य और मल निष्कासन को नियंत्रित करता है।

पाचन क्रिया में मदद करता है समान

उदर अथवा पेट स्थान को गतिशील करता है समान। यह पाचन क्रिया में मदद करता है। पेट के अवयवों को ठीक ढंग से काम करने के लिए सुरक्षा प्रदान करता है।

उदान वाणी और भोजन को व्यवस्थित करता है

उदान जीह्वा द्वारा कार्य करता है। यह वाणी और भोजन को व्यवस्थित करता है। उदान रीढ़ की हड्डी के नीचले हिस्से से ऊर्जा को मस्तिष्क तक पहुंचाता है।

नस-नस तक ऊर्जा पहुंचाता है व्यान

हमारे पूरे शरीर की गतिविधियों को व्यान नियंत्रित करता है। यह भोजन और सांस से मिलने वाली ऊर्जा को धमनियों, शिराओं और नाडिय़ों द्वारा पूरे शरीर में पहुंचाता है।


प्राणायाम 

प्राणायाम का अर्थ है श्वास की गति को कुछ काल के लिये रोक लेना । साधारण स्थिति में श्वासों की चाल दस प्रकार की होती है - पहले श्वास का भीतर जाना , फिर रुकना , फिर बाहर निकलना ; फिर रुकना , फिर भीतर जाना , फिर बाहर निकलना इत्यादि । प्राणायाम में श्वास लेने का यह सामान्य क्रम टूट जाता है । श्वास (वायु के भीतर जाने की क्रिया ) और प्रश्वास (बाहर जाने की क्रिया ) दोनों ही गहरे और लम्बे होते हैं और श्वासों का विराम अर्थात् ‍ रुकना तो इतनी अधिक देर तक होता है कि उसके सामने सामान्य स्थिति में हम जितने काल तक रुकते है वह तो नहीं के समान और नगण्य ही है । योग की भाषा में श्वास खींचन को ‘पूरक ’ बाहर निकालने को ‘रेचक ’ और रोक रखने को ‘कुम्भक ’कहते हैं । प्राणायाम कई प्रकार के होते हैं और जितने प्रकार के प्राणायाम हैं , उन सबमें पूरक , रेचक और कुम्भक भी भिन्न -भिन्न प्रकार के होते हैं । पूरक नासिका से करने में हम दाहिने छिद्र का अथवा बायें का अथवा दोनों का ही उपयोग कर सकते हैं । रेचक दोनोम नासारन्धों से अथवा एक से ही करना चाहिये । कुम्भक पूरक के भी पीछे हो सकता है और रेचक के भी , अथवा दोनों के ही पीछे न हो तो भी कोई आपत्ति नहीं। पूरक , कुम्भक और रेचक के इन्हीं भेदों को लेकर प्राणायाम के अनेक प्रकार हो गये हैं ।
पूरक , कुम्भक और रेचक कितनी -कितनी देर तक होना चाहिये , इसका भी हिसाब रखा गया हैं । यह आवश्यक माना गया है कि जितनी देर तक पूरक किया जय , उससे चौगुना समय कुम्भक में लगाना चाहिये और दूना समय रेचक में अथवा दूसरा हिसाब यह है कि जितना समय पूरक में लगाया जाय उससे दूना कुम्भक में और उतरना ही रेचक में लगाया जाय । प्राणायाम की सामान्य प्रक्रिया का दिग्दर्शन कराकर अब हम प्राणायाम सम्बन्धी उन खास बातों पर विचार करेंगे जिनसे हम यह समझ सकेंगे कि प्राणायाम का हमारे शरीर पर कैसा प्रभाव पडता है ।
पूरक करते समय जब किं साँस अधिक -से -अधिक गहराई के साथ भीतर खींचे जाती है तथा कुम्भक के समय भी , जिसमें बहुधा साँस को भीतर रोकना होता है , आगे की पेट की नसों को सिकोडकर रखा जाता है । उन्हें कभी फुलाकर आगे की ओर नहीं बढाया जाता । रेचक भी जिसमें साँस को अधिक -से अधिक गहराई के साथ बाहर निकालना होता है , पेट और छाती को जोर से सिकोडना पडता है और उड्डीयान बन्ध के लिये पेट को भीतर की ओर खींचा जाता है । प्राणायाम के अभ्यास के लिये कोई -सा उपयुक्ति आसन चुन लिया जाता है , जिसमें सुखपूर्वक पालथी मारी जा सके और मेरुदण्ड सीधा रह सके ।

पुनः ये बुनियादी बात समझना आवश्यक है की 
श्वास खींचन को ‘पूरक ’ 
बाहर निकालने को ‘रेचक ’ और 
रोक रखने को ‘कुम्भक ’कहते हैं ।

अधिकतर प्राणायाम में कुम्भक बीच में रखा जाता है अथार्त 
पूरक कुम्भक रेचक 
अन्यथा रेचक कुम्भक पूरक के द्वारा प्राणायाम किया जाता है ।



वास्तव में शारीरिक लाभ से कहीं अधिक योग से व्यक्ति को मानसिक व आध्यात्मिक लाभ मिलता है ।
योग अनेक प्रकार के होते हैं। राजयोग , कर्मयोग ,हठयोग , लययोग , सांख्ययोग , ब्रह्मयोग , ज्ञानयोग , भक्ति योग ,ध्यान योग , क्रिया योग ,विवेक योग , विभूति योग व प्रकृति पुरुष योग ,मंत्र योग , पुरुषोत्तम योग , मोक्ष योग , राजाधिराजयोग आदि। मगर याज्ञवल्क्यजी  ने जीवात्मा औरपरमात्मा के मेल को ही योग कहा है। वास्तव में योग एक ही प्रकार का होता है , दो या अनेक प्रकारका नहीं। याज्ञवल्क्य जी बहुत बड़े,ब्रह्मवेत्ता,परमात्मस्वरूप व महान ऋषि थे।  उन्होंने ही योग को संपूर्णरूप से पारिभाषित किया था। याज्ञवल्क्य जी के मुताबिक जिस समय मनुष्य सब चिंताओं कापरित्याग कर देता है , उस समय उसके मन की , उसकी उस लय अवस्था को योग कहते हैं।अर्थात चित्त की सभी वृत्तियों को रोकने का नाम योग है। वासना और कामना से लिप्त चित्त को वृत्ति कहा गया है। यम नियम आदि की साधना से चित्तका मैल छुड़ा कर इस वृत्ति को रोकने का नाम योग है। योग के आठ अंग हैं। उन्हीं की साधनाकरनी होती है। साधना का अर्थ है अभ्यास। ऋषि याज्ञवल्क्य के अनुसार यम , नियम , आसन, प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान और समाधि योग के ये आठ अंग हैं। पहले यम , नियम के साथ ही साथ आसन का भी अभ्यास करना उचित है। स्थिर सुखमासनम् यानि शरीर न हिले , न डुले , न दुखे , न चित्त में किसी प्रकार का उद्वेग हो , ऐसी अवस्थामें बैठने को आसन कहते हैं। इस के लिए सिद्धासन श्रेष्ठ है। सिद्ध योगी सिद्धासन तथा मुक्तपद्मासन की ही सलाह देते हैं।सिद्धासन का अभ्यास करने से योग में शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त होती है। इसके कारण वायुपथ सरलहोता है। पद्मासन लगाने से निद्रा , आलस्य , जड़ता और देह की ग्लानि निकल जाती है। इन दो प्रकार के आसनों के अतिरिक्त स्वस्तिकासन , भद्रासन , उग्रासन , वीरासन , योगासन ,शवासन , सिंहासन , मयूरासन , शीर्षासन आदि अनेक प्रकार के आसन भी प्रचलित हैं।आसन करने का मतलब यही है कि शरीर स्वस्थ रहे। परंतु सदा ही यह स्मरण रखना चाहिए कि आसन का सबसे मुख्य उद्देश्य यहहै कि मेरूदंड ( पीठ की रीढ़ ) सदा सीधा रहे। इसलिए प्रत्येक बार कम से कम आधा घंटा अवश्य आसन लगाना चाहिए।
जप से ध्यान में सौगुना अधिक फल मिलता है। और ध्यान की अपेक्षा सौगुना अधिक लाभ होता है लय योग से।प्राणायाम में सबसे अधिक प्रचलित आसन हैं सिद्धासन व पद्मासन ।



 


Sunday, 16 October 2011

योग के अंग यम तथा नियम

योग के बारे में सबसे अच्छा व्यक्तव्य है कि जैसे भजन करते समय हमे भगवान् सुनता है योग द्वारा हम भगवान् को सुनते हैं। जीवात्मा का परमात्मा से मिलन ही योग है । 

महर्षि पातंजलि ने पातंजलि योगदर्शन योग को आठ भागों में विभाजन किया है । सूत्र है-

यम नियमासन प्राणायाम प्रत्याहार
धारणा ध्यान समाधयोङष्टावंगानि॥

2/29
  
अर्थात-यम, नियम, आसन, प्राणायाम,प्रत्याहार धारणा ध्यान और समाधि योग के यह आठ अंग हैं ।

यम 
नियम 
आसन 
प्राणायाम
प्रत्याहार
धारणा   
ध्यान
समाधि

 यह बहुत ही आवश्यक है की योग के शुरूआती दो चरणों को बहुत महत्त्वपूर्ण मानना चाहिए क्यूंकि इनके बाद के चरण स्वाभाविक ही होने लगते हैं या स्वाभाविक बन पड़ते हैं । यम और नियम के अंतर्गत पांच पांच व्रत आते हैं जिनका पालन करने के बाद ही व्यक्ति तीसरे चरण अथार्त आसन कि तरफ बढ़ सकता है।

यम के अंतर्गत आने वाले व्रत है  

अहिंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचय्यार्परिग्रहा यमाः। (2/30) अर्थात अहिंसा,सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यह पाँच यम है ।




1.  अहिंसा- मन, वचन ओर कर्म के द्वारा किसी भी प्राणी को चोट या नुकसान ना पहुंचाना ।

2.  सत्य- कभी भी झूठ नहीं बोलना ।

3.  अस्तेय- किसी दूसरी वस्तु की इच्छा ना करना, चोरी  ना करना ।

4.  ब्रह्मचर्य- मन, वचन और कर्म के द्वारा किसी भी व्यक्ति को वासना भरी नजर से नहीं देखना और ना  ही सोचना । ब्रह्म का अर्थ है परमात्मा में आचरण करना जीवन लक्ष में तन्मय हो जाना, सत्य की शोध में सब ओर चित्त हटाकर जुट पड़ना, ब्रह्म का ही आचरण है ।स्वाभाविक रूप से इन्द्रियों तथा उनके विषयों के प्रति उदासीन रहना ।


5.  अपरिग्रह- संग्रह वृत्ति ना रखना,जरूरत से ज्यादा धन संपत्ति आदि का संग्रह न करना।


नियम के अंतर्गत आने वाले व्रत है:

शौचसंतोषतप: स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः
 2/32

1. शौच- बाह्र और आभ्यंतर रूप से शुद्ध होना शौच के अंतर्गत आता है।



2.  संतोष-  अपनी स्थति में सदा संतुष्ट रहना।


3. तप- इच्छा के मुताबिक भूख, प्यास, गर्मी, सर्दी आदि के कष्टों को सहन करना।

4.  स्वाध्याय- धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन।

5. ईश्वरप्रणिधान- भगवान में भक्ति तथा सभी कर्मों और फलों को भगवान् को अर्पण करना ।