Sunday, 29 January, 2012

वैराग्य से ही मन का सदुपयोग होता है

व्यक्ति अपनी मन बुद्धि द्वारा संचालित होता है पूरा जीवन कई बार हम बिना अपनी मन बुद्धि को जाने बगैर निकाल देते हैं अपने अन्दर के असली ऊर्जा स्रोत ने नहीं मिल पाते जहाँ से हमे दिशा निर्देश मिल रहा है हम उसे ही नहीं जान पाते और कई बार तो जानना ही नहीं चाहते
ये जानना अत्यंत आवश्यक है की हमारा सञ्चालन करने वाली मन बुद्धि का स्वरुप क्या है ?
क्या ये जो भी निर्देश हमे अथार्त इन्द्रियों को करते हैं वो सब सही हैं हमारे लिए हितकारक हैं ?
बस इतना ही पर्याप्त प्रश्न है व्यक्ति का स्वयं से बात करने का
इसी के मंथन में व्यक्ति कब अपना उद्धार कर लेता है कब आत्म कल्याण के पथ पर आ जाता है व्यक्ति को मालूम नहीं चलता
मैं एक साधारण साधक हूँ, अपने से उम्र में छोटों से भी सीखने को आतुर रहता हूँ तथा ज्ञानार्जन के लिए कभी कभी कहीं कहीं थोडा बहुत जो भी अनुभव है और किताबी बातें बोल देता हूँ
अपने संक्षिप्त प्रवचनों के दौरान चूँकि ये बिलकुल ही शुरूआती दौर है इसलिए भी परन्तु अलग अलग लोग मिलते रहते हैं  उनके प्रश्न उनकी समस्याओं में ऐसे गुथे रहते हैं की उन्हें समझना और फिर उन्हें समझाना(हल) कई बार मुश्किल हो जाता है
मेरा उद्देश्य वोही रहता है जो मेरा स्वयं के लिए है व्यक्ति विवेकपूर्ण बने,प्रज्ञावान बने स्वयं को निर्विकार समझे और स्वयं को धार्मिक (हिंदी,मुस्लिम,सिख,इसाई) कहने से पहले या धार्मिक कहलाने से ज्यादा दैवीय गुणों को धारण करे,स्वयं का अध्ययन करे,भले बहुत थोडा ही परन्तु सत्य के पथ पर रोज़ थोडा थोडा बढे
 इसके साथ ही शुद्ध भक्ति पथ ही मेरा उद्देश्य है जहाँ सारा संसार प्रभु का ही स्वरुप नज़र आता है
परन्तु जैसा की पिछली पोस्ट में हमने देखा पभु की त्रिगुणी माया से मोहित अधिकतर लोग रजोगुण के प्रभाव में रहते हैं वे अपना स्वयं का हित स्वयं के धन,संपत्ति,कुटुंब,मान में बढ़ोत्तरी ही मानते हैं उन्हें निष्काम भक्ति (बिना फल की कामना के प्रभु की उपासना) समझाना आसान नहीं रहता और उस तरफ उन्मुख करा देना तो और भी कठिन लेकिन ये सिर्फ उनके लिए ही चरितार्थ होता है जिनपर अज्ञान का पर्दा पड़ा हुआ है और जो इस अज्ञान के परदे को हटाना भी नहीं चाहते परन्तु ऐसे व्यक्ति  भी मिलते हैं जो अध्यात्म सम्बन्धी नयी नहीं बात न सिर्फ पूछते हैं बल्कि अपने अनुभव भी बताते हैं । परन्तु फिर भी बहुतायत ऐसे लोगों की ही है जो स्वयं को शरीर माने हुए हैं,संसार में बहुत आसक्त हैं
 
 
कभी कोई कह देता स्वामी जी हमारे जीवन में बहुत दुःख आप इसे कम कर दीजिये ?
कहीं शनि की साढ़े साती तो नहीं चल रही ?
कारोबार में फायदा नहीं हो रहा ?
हमारा लड़का हमारी नहीं सुनता,दिन भर दोस्तों और टीवी या फिर कंप्यूटर में ही लगा रहता है ?
मेरा पति बहुत शराबी है आप उसकी शराब छुडवा दीजिये 
मेरा भाई अपने माँ बाप को छोड़ के अलग रहने लगा है और मैं अपना मायका देखूं या ससुराल?
ये बताइए मेरी नौकरी कब लगेगी ? 
मेरी विदेश में शादी हो जायेगी न मैं इतने दिनों से व्रत रह रही हूँ ?
मैं किस देवता की उपासना करूँ की शादी अच्छे लड़के से हो ?
कुछ ऐसा उपाय बताइए की मेरा प्रोमोशन मेरे कलीग से भी बड़े स्तर का हो जाए ?

 इतनी सांसारिक इच्छाएं,कभी कभी तो ऐसे लोग मिलते हैं जो दूसरों का का अहित ही चाहते हैं
मैं सबसे एक बात ही कहता हूँ की ये रोग है जिन्हें तुमने पकडे हुआ है छोड़ दो इसे बस ठीक हो जाओगे
स्वयं को समझो ये जानो की क्या आज से साल दो साल दस साल पहले ये रोग तुम्हारे पास नहीं थे । थे और क्या इनका समाधान होने के बाद आज से साल भर बाद,पांच साल बाद ये इच्छाएं तुम्हारे भीतर नहीं रहेंगी
रहेंगी ज़रूर रहेंगी इसलिए ज़रूरी है की स्वयं को समझो स्वयं को जानो । सांसारिक भोगों से मिलने वाली तृष्णा कभी समाप्त नहीं होती अपितु प्रत्येक संकल्प के पूरे होते ही कई मात्रा में बढ़ने लगती है

ऐसा जानने के बाद,इस पर गंभीरता से चिंतन  करने के बाद ही व्यक्ति वैराग्य को थोडा महत्व देने लगता है

क्यूंकि उसके बाद ही जीव सही अर्थों में ध्यान को समझ पायेगा,ध्यान का आनंद ले पायेगा

जीवन में वैराग्य के उत्पन्न होने के बाद ही व्यक्ति ज्ञान की प्राप्ति  कर सकता है तभी वो ज्ञान पर सजगता से व ह्रदय से अमल कर सकता है

पुनः प्रसंग पर आते हैं की व्यक्ति प्रत्येक कार्य अपने मन के अनुसार ही करता है और मन सामान्यतः वोही करता है जैसा निर्देश उसे बुद्धि से मिला होता है और बुद्धि चूँकि रजोगुण (विकार) प्रधान रहती है मन हमे भोग विलास में लगा कर हमारा अहित ही करता है

वैराग्य युक्त होने के बाद  मन हमारा तामसी होना बंद करने लगता है अथार्त अधोगति की तरफ जाना उसका बंद हो जाता है
वैराग्य युक्त होने का ये कतई मतलब नहीं की व्यक्ति संसार,स्रष्टि,शरीर से द्वेष करने लगे,घृणा करने लगे और ये समझने लगे की संन्यास में ही भलाई है और अपने कर्त्तव्य कर्मों से मुख मोड़ ले । 
नहीं ये नीतिपूर्ण कदापि नहीं यदि पिछली पोस्ट्स हम पढ़ें तो उसमे भी सार रूप अनासक्ति ही है अथार्त हमे अपने कर्तव्य कर्मों को करते हुए स्वयं को अनासक्त रखना है,उनमे आसक्ति नहीं रखनी है । आसक्ति रखनी भी है तो एक परमपिता,परमात्मा परमेश्वर से ये शरीर इत्यादि जो कुछ भी हमे मिला है उसे साधन ही समझना चाहिए अथार्त ये सब भगवत्प्राप्ति के लिए मिले हैं
बहरहाल वैराग्ययुक्त होने के बाद मन स्वाभाविक ही शांत होने लगता है
क्यूंकि हमारा मन वोही करता है जो हमारा अवचेतन मन (बुद्धि)  उससे करने को कहे और जब अवचेतन मन संसार से आसक्ति हटा लेता है मन भी इन्द्रियो और उनके विषयों में नहीं रमता और इस तरह से जीव को पता भी नहीं चलता परन्तु वो ईश्वर से योग में बिना किसी प्रक्रिया के अपने कर्त्तव्य कर्म को करते हुए भी उस ज़ोन (आध्यात्मिक) में स्थित रहता है
मेरा एक मानना सदैव से रहा है की हमारी मानसिक परिपक्वता इस बात पर निर्भर रहती है की हम विकारों से ज्यादा अविकारी भाव पर ध्यान दें संसार,समाज,स्रष्टि में ग़लत देखने पर सोचने पर हममे ग़लत देखने का सोचने के भाव का रस जाग्रत होता है जो पतन(मानसिक) देता है बल्कि अच्छा देखने,सोचने पर अविकारी भाव हममे सत्व गुण की अभिवृद्धि करता है । हमारे लिए अत्यंत आवश्यक ये है की हम अपने में विकार ना माने और इसलिए विकारी सोच को भी महत्व न दें ऐसा करने पर बहुत शीघ्र हम ध्यानावस्था में पहुँच जाते हैं। व्यक्ति को अपने मन की दिशा ठीक करनी है क्यूंकि इस तरह से ही वो अपने मन का सही उपयोग कर सकेगा


Friday, 27 January, 2012

हम हिंसक क्यूँ होते हैं और हिंसा कितने प्रकार की होती है ?

हम हिंसक क्यूँ होते हैं और हिंसा कितने प्रकार की होती है ?

 हम हिंसक क्यूँ होते हैं ?

अहिंसा को पूर्णतया जानने के समझने के लिए हिंसा व हिंसा के प्रकारों को समझना आवश्यक है 
किसी भी तथ्य को खासकर महत्त्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक तथ्य को शास्त्रीय परिभाषा के साथ यदि हम 
सामान्य सामाजिक परिवेश में समझें तो गहन से गहन वो गूढ़ तत्त्व भी न सिर्फ समझ में आते हैं बल्कि हमारे विचार में ज़हन में इस तरह उतरते हैं की हम स्वतः ही अनुकरण करने लगते हैं शाश्वत सत्य को कोई भी जीव नकार नहीं सकता हमारे अन्दर ज्यादा विकार हों या कम परन्तु कोई भी कार्य करते समय या विचार सोचते समय वो उचित हैं या अनुचित हमारा अंतःकरण तुरंत इसकी पुष्टि कर देता है और उसके बाद दूसरी चीज़ जो जीव को परमात्मा ने दी है वो है चुनाव करने की अथार्त वो जैसा अंतःकरण ने कहा पहला कार्य उचित है पहला अनुचित तो हम दोनों में से कोई भी कार्य कर सकते हैं गंभीर चिंतन पूर्ण तथ्य ये है की आखिर इंसान अधिकतर ग़लत ही क्यों सोचता है,करता है ?
इस प्रश्न को हमने कुछ पोस्ट पहले श्रीमद भगवद्गीता के सन्दर्भ से समझा था जहाँ तीसरे अध्याय में अर्जुन के यही प्रश्न करने पर भगवान् ने बताया : 

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्‌ ॥ 
भावार्थ :  श्री भगवान बोले- रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है। इसको ही तू इस विषय में वैरी जान॥37॥ 

यहाँ काम से क्रोध की उत्पत्ति बताते हुए भगवान् ने काम अथार्त कामना अथार्त आसक्ति को रजोगुण से उत्पन्न होना बताया है और इसी आसक्ति से जो क्रोध उत्पन्न होता है यही वस्तुतः व्यक्ति को विवेकपूर्ण सोचने नहीं देता विवेकपूर्ण आचरण नहीं करने देता और विवेकपूर्ण कदम नहीं उठाने देता । हम स्वयं ही सोचें की अधिकतर हमे अच्छे कार्य खासकर परमात्मा के बारें में भी दृढ निष्ठा ये हमारा मन ही तो नहीं करने देता क्यूंकि हमारी बुद्धि रज गुण के प्रभाव में है इसलिए ये हज़ारों संदेह परमात्मा के होने में ही मन के समक्ष रख देती है और इस तरह से हम परमात्मा परमेश्वर के होते हुए भी परमात्मविषयक बुद्धि नहीं रख पाते अपितु सांसारिक भोगों में ये रूचि जगाती है और हमारा मन हमे संसार में ही लगाता है,वो संसार को शाश्वत व सदा रहने वाला बताता है और फिर स्वयं का स्वरुप भी हम शरीर समझने लगते हैं और इस तरह से स्वयं आनंदधाम (आत्मा) होते हुए भी हम मन बुद्धि के हाथों दीनहीन हो जाते हैं हम संसार के तुच्छ भोग विलासों की प्राप्ति ही जीवन ध्येय समझने लगते हैं,सांसारिक रिश्तों में ही प्रेम निहित है ऐसा समझने लगते हैं और अपने आस पास के रिश्ते नातों,दोस्तों,संबंधों की ही खुशामद में लगे रहते हैं ज़रा किसी ने कुछ अच्छा कहा तो इतने खुश होते हैं जैसे भगवान् ही प्रकट हो गया और ज़रा किसी ने अप्रिय कहा तो दुःख में डूब जाते है इस तरह से जो रिश्तेदार अथवा जान-पहचान वाला मरता है  तो खूब रोते हैं परन्तु फिर कुछ दिन के बाद वोही बन्दर नाच में लग जाते हैं । हम ये मान ही नहीं पाते की ये संसार तो शमशान ही है यहाँ सभी मरे हुए हैं सभी शव हैं क्यूंकि सभी स्वयं को शरीर मानते हैं,संसार को नित्य मानते हैं और संसार से मिलने वाले सुख को हमेशा के लिए रहने वाला और सच्चा सुख मानते हैं । जिस तरह सुप्तावस्था में स्वप्न देखते हुए हमे स्वप्न सही लगने लगता है और जैसा वो सुख-दुःख प्रधान होता है वैसी ही अनुभूति करने लगते हैं परन्तु जागते ही हमे पता चलता है की वो मिथ्या था उसी तरह ये संसार स्वयं ही एक स्वप्न के सामान है और जिंदा वो ही है,जगा हुआ वोही है जो ये जान ले की संसार व शरीर नश्वर है,संसार एक स्वप्न है । इस स्वप्न में जागते हुए विचरना ही जीवन्मुक्त के प्रधान लक्षण हैं । एक जगा हुआ व्यक्ति ही दूसरे को जगा सकता है,एक जगा हुआ व्यक्ति ही दूसरों को निद्रा से ग्रसित जान सकता है तत्वज्ञान को प्राप्त हुए मनुष्य के हरेक शब्द ह्रदय तक पहुँचते हैं व ईश्वरत्व से विमुख,सात्विक गुणों से विमुख,अच्छाई से विमुख व कठोर से कठोर ह्रदय को भी निर्मल कर देते हैं,अच्छा बनने पर मजबूर कर देते हैं क्यूंकि जैसे ही अज्ञानी ज्ञान में रस लेने लगता है तत्क्षण ही उसे तत्वज्ञान मिल जाता है और उसके न चाहने पर भी शुद्ध विचार अंतःकरण में जमने लगते हैं और चाहने पर भी विकार या विकारी भाव कुछ समय के लिए नहीं आ पाते । और यदि वो अपने को परमात्मा के समर्पित कर दे तो हमेशा के लिए विकारी भाव आने बंद हो जाते हैं क्यूंकि उसकी स्थति तत्त्व ज्ञान में दृढ हो जाती है । परन्तु यदि व्यक्ति स्वयं ही ज्यादा से ज्यादा सात्विक होना चाहे,तत्वज्ञान को प्राप्त करना चाहे तो उसे तो और भी कम समय में व और आसानी से तत्वज्ञान की प्राप्ति हो जाती है और वो अतिशीघ्र परमात्मतत्त्व में स्थित हो जाता है
 
तत्वज्ञान से ओत-प्रोत शब्दों में सच्चाई होती है उनमे कोई भी छिपा भाव,स्वार्थ,अहंकार नहीं होतावो ईश्वर प्रेरणा द्वारा स्वतः ही जनकल्याण हेतु निकलते हैं
और यहाँ तो स्वयं परमात्मा परमेश्वर हम जीवों पर अनुग्रह करके इतनी गूढ़,गहरी,तत्वपूर्ण व असली सार बात को इतने सरल ढंग से बताते हैं

तो भगवान् जो ये क्रोध के बारें में कह रहे हैं वो वस्तुतः 
अविद्धा और अज्ञान है । अथार्त आसक्ति हमे अज्ञान के सम्मुख करती है हमारा अज्ञान बढ़ाती है हममे तम गुण जो की रज गुण से भी निकृष्ट है उस तरफ ले जाती है  

सत,रज व तम तीनो गुणों पर भगवान् ने विस्तार से चौदहवें अध्याय में बोला है,कुछ श्लोक :



(सत्‌, रज, तम- तीनों गुणों का विषय)
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्‌ ॥

भावार्थ :  हे अर्जुन! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण -ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं॥5॥
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्‌ ।
सुखसङ्‍गेन बध्नाति ज्ञानसङ्‍गेन चानघ ॥

भावार्थ :  हे निष्पाप! उन तीनों गुणों में सत्त्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है, वह सुख के सम्बन्ध से और ज्ञान के सम्बन्ध से अर्थात उसके अभिमान से बाँधता है॥6॥
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्‍गसमुद्भवम्‌ ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्‍गेन देहिनम्‌ ॥

भावार्थ :  हे अर्जुन! रागरूप रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को कर्मों और उनके फल के सम्बन्ध में बाँधता है॥7॥ 
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्‌ ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥
भावार्थ :  हे अर्जुन! सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तो अज्ञान से उत्पन्न जान। वह 
इस जीवात्मा को प्रमाद (इंद्रियों और अंतःकरण की व्यर्थ चेष्टाओं का नाम 'प्रमाद' है), आलस्य (कर्तव्य कर्म में अप्रवृत्तिरूप निरुद्यमता का नाम 'आलस्य' है) और निद्रा द्वारा बाँधता है॥8॥
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ॥

भावार्थ :  हे अर्जुन! सत्त्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में तथा तमोगुण तो ज्ञान को ढँककर प्रमाद में भी लगाता है॥9॥
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥

भावार्थ :  हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण होता है अर्थात बढ़ता है॥10॥
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥

भावार्थ :  जिस समय इस देह में तथा अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतनता और विवेक शक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा है॥11॥
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥

भावार्थ :  हे अर्जुन! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, स्वार्थबुद्धि से कर्मों का सकामभाव से आरम्भ, अशान्ति और विषय भोगों की लालसा- ये सब उत्पन्न होते हैं॥12॥
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥

भावार्थ :  हे अर्जुन! तमोगुण के बढ़ने पर अन्तःकरण और इंन्द्रियों में अप्रकाश, कर्तव्य-कर्मों में अप्रवृत्ति और प्रमाद अर्थात व्यर्थ चेष्टा और निद्रादि अन्तःकरण की मोहिनी वृत्तियाँ - ये सब ही उत्पन्न होते हैं॥13॥
हमने देखा की व्यक्ति में आखिर अज्ञान आता कैसे है । ये रज गुण से प्रेरित होने कारण व्यक्ति को विषय भोगों में लगाता है आसक्त बनाता है और इस तरह से अज्ञान बढाता हुआ तमोगुणी बनाता चला जाता है परिणाम स्वरुप व्यक्ति पूरा जीवन मोह माया को ही सत्य मानने में,स्वयं के शरीर को सुख देने में ही,काम,क्रोध,लोभ,दंभ,अहंकार आदि में ही निकाल देता है । परन्तु तत्वज्ञान व्यक्ति को सात्विक बनाता है,सत गुण में लगाता है और जिससे व्यक्ति की परमात्मा में निष्ठा होने के साथ साथ दैवीय गुणों (अहिंसा,सत्य,करुणा,प्रेम,तप,दया,सहिष्णुता,क्षमा,मानवतादी) के पोषण में उतरोत्तर रूचि होने लगती है। दैवीय गुणों से विभूषित प्राणी की दूसरों पर अकारण ही करुणा रहती है और हिंसा आदि देखकर उसे ऐसे लोगों पर गुस्सा नहीं दया आती है क्यूंकि वो जानता है की अभी ये अज्ञानी है और जिस दिन स्वयं का स्वरुप ये समझेंगे उसी दिन सांसारिक मान,दंभ को छोड़ के काम,क्रोध व तृष्णा रहित हो जायेंगे  
  
 
योग में अहिंसा बहुत आवश्यक बतायी गयी है जैन धर्म,बौद्ध धर्म समेत प्रायः सभी धर्मों (मजहबों ) ने अहिंसा की महिमा गई है और अहिंसा को अध्यात्म में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व्रत में रखा है
हिंसा कितने प्रकार की होती है ?
शास्त्रोक्त वर्णानुसार हिंसा इक्यासी प्रकार की हो सकती है । 
कर्ता भेद से हिंसा तीन प्रकार की होती है:
१. कृत (स्वयं हिंसा करना)
२. कारित (किसी से हिंसा करवाना)
३. अनुमोदित (हिंसा का अनुमोदन अथार्त समर्थन करना )


उपर्युक्त तीन प्रकार की हिंसा तीन भावों से होती है 

१. क्रोध से 

२. लोभ से 

३. मोह से

यानी ये तीन भाव पहले के तीन कर्ता भेद से मिलके नौ प्रकार की हिंसा कर सकते हैं तात्पर्य है की क्रोध से भी कृत,कारित और अनुमोदित हिंसा हो सकती है,लोभ से भी और  मोह से भी
इस तरह से ३ और ३ को गुणा करने पर ९ प्रकार की हिंसा होती है
ये नौ प्रकार की हिंसा में भी हिंसा की मात्रा(कम,ज्यादा) होती है और ये तीन तरह की हो सकती है
१. मृदुमात्रा (थोड़ी मात्रा में हिंसा करना अथवा किसी को थोडा दुःख देना )
२. मध्यमात्रा (मृदु मात्रा से अधिक दुःख देना )
और 
३. अधिमात्रा (मध्यमात्रा से अधिक अथार्त बहुत अधिक दुःख देना,अत्यंत पीड़ा पहुचाना अथवा ख़त्म कर देना)
इस तरह मृदु,मध्य और अधिमात्रा के भेद से नौ (९)गुणे तीन(३) अथार्त हिंसा सत्ताईस प्रकार की हो गयी
उपर्युक्त सत्ताईस प्रकार की हिंसा तीन कारणों से होती है शरीर से,वाणी से या भाव से
इस तरह हिंसा  २७*३=८१ 
अथार्त इक्यासी प्रकार की हो जाती है ।इनमे से किसी भी प्रकार की हिंसा न करना ही अहिंसा है । 


 उदाहरणार्थ जहाँ कहीं भी,किसी भी बात में विकार दिखाई दे समझना चाहिए हिंसा निहित है
सामाजिक,भौतिक,व्यक्तिगत कैसे भी परिपेक्ष्य में हम  देखें हिंसा के हमे सैकड़ों हज़ारों उदाहरण मिल जायेंगे
 हिंसा स्थूल रूप के साथ साथ सूक्ष्म रूप से भी होती है,हिंसा चाहे जैसी भी हो अहितकारक व अशांति,क्रोध ही बढ़ाती है
आज समाज में इतने अपराधों की बाढ़ सी आई हुई है  ?
कहीं जम्मू-कश्मीर में वर्षों से चल रहा आतंकवाद  ?

५ जून ११ को भारत सरकार द्वारा दिल्ली में निर्दोषों पर लाठीचार्ज  ?

ये सब हिंसा के स्थूल रूप हैं
परन्तु जो हम मन से करते हैं जैसे हमने किसी के लिए किसी को हिंसा के लिए प्रेरित किया ?
या फिर किसी को कष्ट देने के लिए हम काफी सोच विचार करें तो ये भी एक ऐसी सूक्ष्म हिंसा है जो दो तरफ़ा होती है अथार्त व्यक्ति दूसरे के साथ साथ स्वयं को भी स्वयं के विचारों को भी हिंसा आदि से ओत-प्रोत करके उनमे विकार उत्पन्न करता है जो अतिसूक्ष्म स्तर पर स्वयं उस प्राणी को भी नुकसान पहुंचाती है
इसी तरह ऊपर दी गए भेदों के अनुसार यदि हम विचार करें तो वास्तविकता में हिंसा के सभी प्रकारों के उदाहरण मिल जायेंगे
इसी तरह से हमने अपने किसी दोस्त के पीठ पीछे उसके नाम पर उधार ले लिया और दोस्त के मालूम चलने पर भी उधार नहीं चुकाया इस तरह से न सिर्फ अपने दोस्त का नाम खराब किया बल्कि उसे बदनाम भी किया ये फिर से एक सूक्ष्म हिंसा का उदाहरण है ।ये हिंसा लोभ से प्रेरित है,कृत है और  मध्यमात्रा की है
कभी कभी तो हम अपने दोस्त के रहने पर ही उसके नाम पर कोई घोटाला कर देते हैं और उसे मालूम चलने पर भी की हम ही उसे बदनाम कर रहे हैं उसका नाम खराब कर रहे हैं अनभिज्ञता ज़ाहिर कर देते हैं अपने मित्र को अत्यंत पीड़ा पहुचाते हैं। ये भी सूक्ष्म हिंसा ही है कृत है,क्रोध से प्रेरित है और अधिमात्रा की है
कई बार हम किसी को ईर्ष्यावश दुःख पहुचाते हैं ?
कई बार हम धन,बल,मान के लिए दूसरों को कष्ट देते हैं ? यहाँ तक की अपने झूठे अहम् के लिए प्राणी की हत्या तक कर देते हैं अथवा करा देते हैं ?

हम देखते हैं की कौन सी पार्टी ने सबसे ज्यादा घोटाला किया लेकिन चुनाव आने पर जाति
,क्षेत्र अथवा थोड़े से पैसे के लोभ में फिर उसी पार्टी को वोट देते हैं ये भी लोभ के अंतर्गत कृत प्रकार की हिंसा है

कई बार हम देखेंगे कालेज वगेरह में जहाँ कई छात्र मिलके किसी एक को परेशान करते हैं इसमें जो सम्मलित हैं वे तो कृत अथवा कारित रूप से हिंसा के भागीदार हैं ही,वे छात्र जो खड़े देखते रहते हैं कुछ नहीं कहते वो भी अनुमोदित हिंसा के अंतर्गत हिंसा के अपराधी हैं
इसी तरह से व्यक्तिगत हिंसा है या घरेलु हिंसा है या सामाजिक हिंसा,सांप्रदायिक हिंसा है या वैश्विक स्तर पर हुई हिंसा है शुरू ऊपर दिए गए कारणों से ही होती है इनमे सबसे नुकसानदायक व्यक्ति के मन द्वारा की हुई हिंसा होती है,मन द्वारा तो प्रायः सभी हिंसा ही होती हैं परन्तु यहाँ तात्पर्य मानसिक हिंसा से है । हमे मालूम ही नहीं चलता की रजोगुण के प्रभाव में हम मानसिक हिंसा में इस तरह लिप्त हो जाते हैं की थोड़ी थोड़ी सी मानसिक हिंसा करके किसी को मानसिक रूप से कष्ट पहुंचाकेमानसिक संतुष्टि प्राप्त हुई ऐसा समझने लगते हैं और इस तरह से ऐसा करना हमे अच्छा लगने लगता है,ऐसा करना मानसिक संतुष्टि की खुराक सा बनने लगता है ।और हम जाने अनजाने ऐसे ही माहौल को बढाने लगते हैं,इसमें ही अपनी विद्वता अथवा मान समझने लगते हैं और अध्यात्म पथ से भटकने लगते हैं ।इस तरह से  अनुमोदित हिंसा बढती ही जाती है
हिंसा को रोकने का सबसे कारगर उपाय है व्यक्ति ये जाने की सत गुण में आनंद है और हमारा स्वरुप आत्मा है,आनंदमय है । ये दुनिया हमे सुख उठाने के लिए नहीं सुख देने के लिए मिली है क्यूंकि सच्चा सुख सुख पहुंचाना ही है
 


 

Tuesday, 24 January, 2012

सभी ब्लॉगर मित्रों व नेट मित्रों का आभार

माघ शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं.-2068, मंगलवार 
 विक्रमी संवत 2068 श्री कृष्ण संवत 5236 राष्ट्रीय शाके 1933   

सभी पढने वालों और मित्रों का आभार जो निरंतर कम होती पोस्ट्स को भी पढने के लिए आते रहते हैं और इस तरह से ब्लॉग के साथ बने हुए हैं और फिर से विशेषाभार ऐसे ब्लॉगर मित्रों को जिनके ब्लॉग पर मेरे न पधारने पर भी वे इसे ग़लत नहीं लेते और फिर भी उत्साह से सकारात्मकता से की गयी पोस्ट्स को पढ़ते हैं । उन मित्रों का भी शुक्रिया जो मेहनत व लगन से किया गयी अपनी उत्कृष्ट पोस्ट्स का सन्देश दे देते हैं जिसके कारण ज्ञान में बढ़ोत्तरी हो जाती है
सभी को फिर से साधुवाद ।



मैं अपने सभी ब्लॉगर मित्रों और नेट मित्रों को कई बार मैं बता चूका हूँ की मैं नेट पर कम ही आता हूँ इसलिए इसे अन्यथा न लें साथ ही सभी दोस्त जो भी परोक्ष या अपरोक्ष रूप से बने हैं उनका आभार करना चाहूँगा ।
अभी तक मेरी नेट की प्रक्रियाएं मेरे इसी ब्लॉग द्वारा ही होती रही हैं ।
दोस्तों आप सोच रहे होंगे की इस पोस्ट को लिखने का प्रयोजन क्या है तो उसे मैं बताना चाहता हूँ की इस तरह से मैं अपने तमाम मित्रों व पाठकों का धन्यवाद करना चाहता हूँ और ये भी बताना चाहता हूँ की यदि कोई प्रश्न खासकर आध्यात्मिक या सामाजिक या फिर व्यक्तिगत भी है और अनिर्णय की स्थति में हैं तो अपने इस मित्र की राय भी ले सकते हैं यदि चाहें तो । पहले कुछ काव्य की साइट्स पर भी मैं जाता था जहाँ जाना संभव नहीं है क्यूंकि मैं ब्लॉग पर ही कम से कम आ पाता हूँ । दोस्तों नेट पर भी कम से कम आने का सिर्फ एक कारण है की 
स्वाभाविक रूप से ही मैं थोडा अंतर्मुखी प्रवृत्ति का था और अब तो इस सिद्धांत को मानने लगा हूँ की विश्व का भला जितना एक कर्मयोगी करता है उतना ही सांख्ययोगी भी इसलिए जितना कम हो उतना दुनिया से लगाव रखता हूँ परन्तु चूँकि ब्लॉग पर लिखता आ रहा हूँ और मेरे सर्वाधिक प्रिय विषय अध्यात्म पर ही ये ब्लॉग आधारित है तो आता रहता हूँ साथ ही किसी न किसी रूप में थोडा बहुत ही सही रचनात्मकता पर योगदान देने का प्रयत्न करता रहता हूँ । 
दोस्तों नेट की दुनिया में आदमी जितनी जल्दी बातों को सकारात्मक रूप से समझता है नकारात्मक रूप से भी ले सकता है,साथ ही कई बार हमारे दोस्त सोचते हैं की फला मित्र नाराज़ तो नहीं या हमे ग़लत तो नहीं समझता
इसलिए मैं अपनी तरफ से ये कहना आवश्यक समझता हूँ की मैं किसी से भी नाराज़ नहीं हूँ और ऐसा सोचने वाले मित्रों से भी आग्रह यही करूँगा की जीवन तत्त्व को समझें ऐसी बातों में कुछ नहीं रखा है,प्रत्येक प्राणी को उसके समय का सदुपयोग करना चाहिए जो की आत्म चिंतन से ही होता है । अपने सभी दोस्तों का मैं बहुत आभारी हूँ जिन्होंने हमेशा मुझे प्रोत्साहित किया । मैं कैसे अध्यात्म की तरफ उन्मुख होता चला गया ये मैं स्वयं ही नहीं जानता परन्तु कदाचित जीवन लक्ष्य विधाता द्वारा येही था मैं स्वयं को बहुत भाग्यशाली समझता हूँ जो मेरे जैसे संसारी को थोडा आध्यात्मिक ज्ञान मिला और मिल रहा है मैं अपने दोस्तों से और पढ़नेवालों से भी क्षमा चाहता हूँ की पहले की तरह नेट पर नहीं आ पाता या कविता नहीं लिखता ।  मुझे विश्वास है आप दोस्त इसे समझेंगे व इस पथ पर भी मेरा साथ देंगे व अपना भी आत्मिक कल्याण करेंगे ।

मैं स्पष्ट कहने में विश्वास रखता  हूँ और इसलिए अपनी सोच प्रकट करी ।
मैंने ऐसा इसलिए भी लिखा क्यूंकि मैं पोस्ट्स को लिखते वक़्त भले ही वो किसी भी विषय पर अध्यात्म,कविता,आलेख आदि पर हो ये ही प्रयास करता हूँ की वो व्यक्तिगत या वैक्तिक रूप से न लिखी जाएँ न ही पढ़ी जाएँ क्यूंकि उससे हमारी सोच का दायरा भी सिमित होता है साथ ही उसमे विकार आने की संभावना बनी रहती है क्यूंकि व्यक्ति के विचारों से स्वतंत्रता अथवा उन्मुक्तता का भाव स्थिर नहीं रह पाता और इस तरह से लेखक ह्रदय या कवि ह्रदय सही मायनों में संतुष्ट नहीं होता ।

रामचरितमानस में आया है 

कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥

कीर्ति, कविता(लेखादि) और सम्पत्ति वही उत्तम है, जो गंगाजी की तरह सबका हित करने वाली हो । 



पुनः सभी मित्रों का आभार 

Sunday, 22 January, 2012

अंतर्मुखी होना तत्वज्ञान के उन्मुख होना,विवेकप्रधान होना है

अंतर्मुखी होना और बहिर्मुखी होने की परिभाषा सबकी अलग अलग होती है कुछ मित्रों का सन्देश आया की अंतर्मुखी प्रायः मौन होते हैं,अंतर्मुखी व्यक्ति समाज मे समाज की बढ़ोत्तरी(अच्छी) में उतना योगदान नहीं दे पाता,कुछ ये भी मानते हैं की अंतर्मुखी व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेता है,अन्याय सह लेता है,दब्बू किस्म का हो जाता है  इत्यादि
सबसे पहले मैं इन दोस्तों का शुक्रिया करूँगा अपने विचार रखने के लिए आगे ये ही कहना चाहूँगा की हम हर चीज़ की परिभाषा अधिकतर अपने अनुसार करते हैं जो की ग़लत नहीं बशर्ते हम उसमे कोई शर्त न रखे अथार्त उसमे अपना कोई स्वार्थ या सहूलियत न रखे
किसी शब्द की परिभाषा सार्थक सिद्ध तभी होती है जब हम उसे संयत व निष्पक्ष भाव से समझें व उसमे अपनी चतुराई (अपनी सुविधा के लिए )आक्षेपित न करते हुए बुद्धिमानी से यथार्थः समझें
शब्द या उसका अर्थ हमसे ये कभी नहीं कहता की उस जैसा बनो वो तो बस अपना अर्थ ही बताता है उसका निरूपण कैसे करना है ये प्राणीविशेष पर निर्भर होता है
कई बार व्यक्ति समभाव से अपने द्रष्टिकोण से भी शब्द की परिभाषा अथवा उसकी व्याख्या करता है जिससे शब्द की परिभाषा और सरल व स्पष्ट हो जाती है जो की बहुत अच्छी बात है


जीव स्वभावत: दो प्रकार के होते हैं -अंतर्मुखी तथा बहिर्मुखी। अंतर्मुखी प्रतिभा के व्यक्ति बाहरी संसार से तथा भौतिक सुखों से विरक्त रहते हुए अपनी अंतरात्मा के सम्यक विकास के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। 

बहिर्मुखी प्रतिभा का व्यक्ति भौतिकता में आसक्त होकर विविध सांसारिक कार्यों में लिप्त रहता है। 
यथार्थ में ये दोनों मार्ग एक दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि कोई भी मनुष्य न पूर्णतया अंतर्मुखी हो सकता है और न पूर्णतया बहिर्मुखी। प्राय: सभी प्राणी कुछ अंशों में बहिर्मुखी होते हैं।


मेरे विचार से अंतर्मुखी होने का तात्पर्य अनासक्त होने से है अथार्त संसार अनित्य है आत्मा नित्य है ये तत्वज्ञान होने से है,अपने अन्दर झाकने से है,निर्विकार होने से है अथार्त हम अपने विकारों को समझें उनका निरीक्षण करें और साथ ही साथ अपने स्वरुप को अथार्त आत्मा को अविकारी व अविनाशी समझें और इस तरह से  स्वयं को स्वरूपतः शुद्ध अविनाशी,निर्विकार जानें शुद्ध भक्ति के लिए ये अत्यंत आवश्यक है की हम अपने को निष्काम(ईश्वर से कुछ भी मांगने की अभिलाषा न)  रखें,साथ ही काम,क्रोध,लोभ,दंभ,मोह आदि विकारों से अंतःकरण को शुद्ध रखें ।इस तरह से मननशीलता ही अंतर्मुखी होना है तभी व्यक्ति ये समझ सकता है या ये समझने की चेष्टा कर सकता है की वास्तव में विकार तो उसके मन द्वारा हो रहे हैं जिसका संकल्प बुद्धि द्वारा हो रहा वस्तुतः विचार ही व्यक्ति को बाँध रहे हैं जिससे जीव शुद्ध आत्मा में भी विकार देखने लगता है ।यदि व्यक्ति कुविचार की जगह सुविचार को प्रधानता दे तो इसी बुद्धि को सात्विक करके मन में सात्विक भावों को बढ़ाके अपना आत्मिक कल्याण कर सकता है जिसके लिए सबसे अधिक आवश्यक ये है की वो विकारों को अपना न माने व स्वयं के स्वरुप(आत्मा) को ही मन,बुद्धि,इन्द्रियों का प्रकाशक माने और अपने कल्याण के साधन हेतु (अविकारी भाव) इनका सदुपयोग करे



रामचरिमानस में आया है :

उत्तरकाण्ड 
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥1॥
सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥2॥
अथार्त जीव की आत्मा ईश्वर का अंश है जो की स्वरुप से ही चेतन,विकाररहित और आनंद मय
है परन्तु जीव अपने को ईश्वर से अलग मानके माया के वशीभूत होकर तोते और वानर की भाँति अपने आप ही बँध गया। इस प्रकार जड़ और चेतन में ग्रंथि (गाँठ) पड़ गई। यद्यपि वह ग्रंथि मिथ्या ही है, तथापि उसके छूटने में कठिनता है॥ 

 मेरा उद्देश्य इसी बात को अनगित करना था तत्वज्ञान के लिए व्यक्ति का अंतर्मुखी होना अथार्त अपनी इन्द्रियों को अपनी वृत्तियों को बाहर(संसार) की तरफ न ले जाके आत्मा की तरफ करना ही अंतर्मुखी होना होता है
अंतर्मुखी व्यक्ति कम बोले ज्यादा बोले इससे कोई प्रयोजन नहीं परन्तु तत्वज्ञान के बाद स्वतः ही व्यक्ति गंभीर हो जाता है हालाँकि चूँकि संसार में रहना है तो उसे कई मौकों पर विनोद,सुख दुःख  आदि से गुज़रना होता है और वो ऐसा करता भी है परन्तु अन्दर से संसार के प्रति उसकी आसक्ति नहीं होती
लौकिक भाषा में जो हम बहिर्मुखी को यानी खुले विचार वालों या स्पष्टतः बोलने वालों को ये समझें की इन्हें तत्वज्ञान के लिए कम बोलना चाहिए तो ये बात निरर्थक है व्यक्ति को अपनी प्रकृति बदले बिना अपनी प्रवृत्ति अनासक्ति के उन्मुख करनी चाहिए बस इतनी सी बात है । अथार्त बहिर्मुखी भी तत्वज्ञानी हो सकते हैं परन्तु उन्हें अंतर्मुखी (अनासक्त) रहने से ही तत्वज्ञान सही अर्थों में प्राप्त होगा
 
मूल उद्देश्य यही है की शब्द से ज्यादा हम उसके अर्थ पर ध्यान दें जो की यही है की व्यक्ति के अन्दर दो तरह की बुद्धि होती है विवेक प्रधान और अविवेकप्रधान । हम जितना ज्यादा विवेक प्रधान होने हमे जगत उतना ही विकार रहित नज़र आएगा उतना ही हम अहिंसा,प्रेम,सहिष्णुता,निस्वार्थता,मानवता का सन्देश देंगे,ऊर्ध्वमुखी होंगे  व हम जितना अविवेक को महत्व देंगे उतना ही काम,क्रोध के ग्रास बनेंगे व अच्छी से अच्छी बात में दोष देखेंगे,सुखदायी परिस्थति में भी दुःख देखेंगे व जाने अनजाने विकार को अपने में और समाज में बढाते जायेंगे और इस तरह आत्मिक पतन के पथ पर अग्रसर होते जायेंगे

श्री भगवान् ने श्रीमद भगवदगीता में सोलहवें अध्याय में विस्तार से विवेक और अविवेकप्रधान वृत्ति पर कहा है :


द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ में श्रृणु॥ 

भावार्थ :  हे अर्जुन! इस लोक में भूतों की सृष्टि यानी मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है, एक तो दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला। उनमें से दैवी प्रकृति वाला तो विस्तारपूर्वक कहा गया, अब तू आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य समुदाय को भी विस्तारपूर्वक मुझसे सुन॥6॥ 

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥ 



भावार्थ :  आसुर स्वभाव वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति- इन दोनों को ही नहीं जानते। इसलिए उनमें न तो बाहर-भीतर की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्य भाषण ही है॥7॥

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्‌।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्‌॥

भावार्थ :  वे आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य कहा करते हैं कि जगत्‌ आश्रयरहित, सर्वथा असत्य और बिना ईश्वर के, अपने-आप केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न है, अतएव केवल काम ही इसका कारण है। इसके सिवा और क्या है?॥8॥
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥

भावार्थ :  इस मिथ्या ज्ञान को अवलम्बन करके- जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है तथा जिनकी बुद्धि मन्द है, वे सब अपकार करने वाले क्रूरकर्मी मनुष्य केवल जगत्‌ के नाश के लिए ही समर्थ होते हैं॥9॥
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्‍गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥ 

भावार्थ :  वे दम्भ, मान और मद से युक्त मनुष्य किसी प्रकार भी पूर्ण न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर, अज्ञान से मिथ्या सिद्धांतों को ग्रहण करके भ्रष्ट आचरणों को धारण करके संसार में विचरते हैं॥10॥
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥

भावार्थ :  तथा वे मृत्युपर्यन्त रहने वाली असंख्य चिन्ताओं का आश्रय लेने वाले, विषयभोगों के भोगने में तत्पर रहने वाले और 'इतना ही सुख है' इस प्रकार मानने वाले होते हैं॥11॥
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्‌॥

भावार्थ :  वे कामना की सैकड़ों फाँसियों से बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोध के परायण होकर विषय भोगों के लिए अन्यायपूर्वक धनादि पदार्थों का संग्रह करने की चेष्टा करते हैं॥12॥

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्‌।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्‌॥

भावार्थ :  वे सोचा करते हैं कि मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस मनोरथ को प्राप्त कर लूँगा। मेरे पास यह इतना धन है और फिर भी यह हो जाएगा॥13॥

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥

भावार्थ :  वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओं को भी मैं मार डालूँगा। मैं ईश्वर हूँ, ऐश्र्वर्य को भोगने वाला हूँ। मै सब सिद्धियों से युक्त हूँ और बलवान्‌ तथा सुखी हूँ॥14॥

आढयोऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥
 
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥



भावार्थ :  मैं बड़ा धनी और बड़े कुटुम्ब वाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आमोद-प्रमोद करूँगा। इस प्रकार अज्ञान से मोहित रहने वाले तथा अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले मोहरूप जाल से समावृत और विषयभोगों में अत्यन्त आसक्त आसुरलोग महान्‌ अपवित्र नरक में गिरते हैं॥15-16॥ 



आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्‌॥


भावार्थ :  वे अपने-आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले घमण्डी पुरुष धन और मान के मद से युक्त होकर केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा पाखण्ड से शास्त्रविधिरहित यजन करते हैं॥17॥

अहङ्‍कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥

भावार्थ :  वे अहंकार, बल, घमण्ड, कामना और क्रोधादि के परायण और दूसरों की निन्दा करने वाले पुरुष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अन्तर्यामी से द्वेष करने वाले होते हैं॥18॥

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌॥
भावार्थ :  काम, क्रोध तथा लोभ- ये तीन प्रकार के नरक के द्वार ( सर्व अनर्थों के मूल और नरक की प्राप्ति में हेतु होने से यहाँ काम, क्रोध और लोभ को 'नरक के द्वार' कहा है) आत्मा का नाश करने वाले अर्थात्‌ उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए॥21॥

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्‌॥

भावार्थ :  हे अर्जुन! इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है (अपने उद्धार के लिए भगवदाज्ञानुसार बरतना ही 'अपने कल्याण का आचरण करना' है), इससे वह परमगति को जाता है अर्थात्‌ मुझको प्राप्त हो जाता है॥22॥ 

और फिर अठारहवें अध्याय में विशुद्ध भाव को प्राप्त हुए जीव के लिए भगवान् कहते हैं:


बुद्ध्‌या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥
अहङकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्‌।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ 


भावार्थ :  विशुद्ध बुद्धि से युक्त तथा हलका, सात्त्विक और नियमित भोजन करने वाला, शब्दादि विषयों का त्याग करके एकांत और शुद्ध देश का सेवन करने वाला, सात्त्विक धारण शक्ति के (इसी अध्याय के श्लोक 33 में जिसका विस्तार है) द्वारा अंतःकरण और इंद्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला, राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके भलीभाँति दृढ़ वैराग्य का आश्रय लेने वाला तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरंतर ध्यान योग के परायण रहने वाला, ममतारहित और शांतियुक्त पुरुष सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में अभिन्नभाव से स्थित होने का पात्र होता है॥51-53॥ 


ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्‌॥ 

भावार्थ :  फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसी के लिए शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है। ऐसा समस्त प्राणियों में समभाव वाला (गीता अध्याय 6 श्लोक 29 में देखना चाहिए) योगी मेरी पराभक्ति को ( जो तत्त्व ज्ञान की पराकाष्ठा है तथा जिसको प्राप्त होकर और कुछ जानना बाकी नहीं रहता वही यहाँ पराभक्ति, ज्ञान की परानिष्ठा, परम नैष्कर्म्यसिद्धि और परमसिद्धि इत्यादि नामों से कही गई है) प्राप्त हो जाता है॥54॥

Friday, 20 January, 2012

योग के अंग प्रत्याहार,धारणा ध्यान और समाधि

मेरा मानना है व्यक्ति के लिए अंतर्मुखी होना न सिर्फ सबसे ज़रूरी है बल्कि सही अर्थों में बहुत लाभदायक है
मनुष्य जीवन बिना अंतर्मुखी हुए व्यर्थ सिद्ध हो जाता है यही नहीं बिना अंतर्मुखी हुए मनुष्य आत्मिक सुख नहीं पा पाता वरन वो सुख अपने ही तरह के इंसानों में ढूंढता रहता है व्यक्ति जान ही ही नहीं पाता की उसका स्वरुप शरीर नहीं आत्मा है और चूँकि ऐसा अनुभव सिर्फ अंतर्मुखी होने से ही हो सकता है व्यक्ति ऐसा अनुभव  नहीं कर पाता और जीवन पूरा का पूरा बाहरी जगत के भ्रमजाल और दिखावे,आसक्ति,धन,बल,मान आदि में निकल जाता है
अंतर्मुखी होना आध्यात्मिक जगत के साथ साथ लौकिक जगत में भी बहुत उपयोगी है
सबसे बड़ी बात अंतर्मुखी न होना हमारे अन्दर जाने अनजाने विकारों को बढाता रहता है स्वाभाविक ही व्यक्ति के अन्दर काम,क्रोध,लोभ,मद,मोह,अहंकार नित बढ़ते चले जाते हैं,हम कोई भी साहसी कार्य करने से डरते हैं, हम सच बोलने,सुनने में डरते हैं, हम अपनी समीक्षा करने से घबराते हैं साथ ही हमारे अन्दर निर्णायक क्षमता भी कम होने लगता है और बहुधा हम किसी कार्य के निर्णय के वक़्त पर अविवेकपूर्ण कदम उठा लेते हैं इसके साथ ही हम बहुत सारे लोगों से घिरे रहते हैं और अपने सुख दुःख में उनपर ही निर्भर हो जाते हैं इस तरह से हम अपने आप से ही दूर हो जाते हैं और अपनी भावनात्मक ऊर्जा  को भी मोह माया में गवाने लगते हैं  यही नहीं अंतर्मुखी हुए बिना व्यक्ति स्वयं के दोष देखने का साहस नहीं कर पाता और परिणामतः दोष-दृष्टी का शिकार हो जाता है वो हमेशा दूसरों में ही दोष ढूंढेने लगता है और इस तरह आत्मिक उद्धार से वंचित रह जाता है

आज से कुछ साल पहले मेरे एक मित्र (नेट मित्र नहीं ) ने मुझसे ये बातें कहीं और  फिर ये प्रश्न किया 
क्या तुम्हे याद है आखिर बार तुमने अपने आप से कब बात की थी ?
क्या तुम्हे याद है तुमने अपने आप से क्या बात की थी ?
कहीं ऐसा तो नहीं की अपने आप से बात करते वक़्त भी तुमने संसार की ही बात खुद से की और इस तरह से अपने आप से अपने आप के लिए बात ही नहीं कर पाए ?

ये बातें उनकी मुझे न सिर्फ अच्छी लगीं बल्कि सच्ची भी लगीं और अनुभव करने पर उसका वर्णन नहीं किया जा सकता बस इतना कहूँगा की मैं इस गुणवत्ता प्रधान वार्तालाप के लिए उनका बहुत कृतज्ञ हूँ



अंतर्मुखी होने के बाद ही हम योग के बारें में सोच पाते हैं योग को समझ पाते हैं और इस तरह से अध्यात्म में रत हो पाते हैं

हम जानते हैं की यम, नियम, आसन, प्राणायाम,प्रत्याहार धारणा ध्यान और समाधि योग के यह आठ अंग हैं ।

पर पहले पोस्ट की जा चुकी हैं

प्रत्याहार,धारणा ध्यान और समाधि के बारें में पातंजल
योगप्रदीप से कुछ उद्धत करना चाहूँगा

प्रत्याहार: यम नियम प्राणायाम आदि से चित्त बाहर
के विषयों से विरक्त हो जाता है और इसलिए इन्द्रियां भी अंतर्मुख होकर उस जैसा अनुकरण करने लगती हैं इस प्रकार चित्त के निरुद्ध होने पर इन्द्रियों का भी निरुद्ध होना प्रत्याहार कहलाता है


धारणा : चित्त का वृत्तिमात्र से किसी स्थानविशेष(ध्येय) में बंधना धारणा कहलाता है
यहाँ स्थानविशेष को समझना आवश्यक है इसे ध्येय भी कह सकते हैं
ध्येय अथार्त वो स्थान जहाँ पर वृत्ति को ठहराया जाए जैसे नासिका का अग्रभाग,नाभि,हृदयकम, ब्रह्मरंध्र आदि आध्यात्मिक स्थान अथवा भगवान् का चित्र,चन्द्र आदि कोई बाह्य देशरूप वस्तु-विषय इसी को ध्येय कहते हैं


ध्यान - ध्येय में वृत्ति का एक सामान बने रहना ही ध्यान है
धारणा में चित्त जिस वृत्तिमात्र से ध्येय में लगता है,जब वह वृत्ति समानरूप से प्रवाहमान रहती है तो दूसरी और कोई वृत्ति बीच में ना आये इसी को ध्यान कहते हैं

समाधि :ध्यान के ही गहनतम रूप को समाधि कहते हैंवह ध्यान ही समाधि कहलाता है जब उसमे केवल ध्येय अर्थमात्र में भासता है और उसका (ध्यान का) स्वरुप शून्य जैसा हो जाता है
ध्यान में ध्येय का भान होता है ध्येय मात्र का नहीं किन्तु समाधि में ध्यान ध्येयमात्र से भासता है 
समाधि की अवस्था में ध्यान का सर्वथा अभाव नहीं होता किन्तु ध्येय में अभिन्नरूप होकर भासने के कारण स्वरुप से शून्य जैसा हो जाता है
समाधि अंगी है धारणा और ध्यान उसके अंग हैं जब किसी ध्येय पर ध्यान किया जाता है तब चित्त की वृत्ति त्रिपुटी सहित होती है
वह त्रिपुटी ध्यात्र,ध्यान और ध्येय रूप है
त्रिपुटी को जिसका उपरोक्त वर्णन है  
ध्यात्र - ध्यान करने वाला आत्मा से प्रकाशित चित्त है
ध्यान -चित्त की वो वृत्ति जिसके द्वारा ध्यान किया जाता है
ध्येय - जिसका आध्यात्मिक अथवा बाह्य वस्तु आदि का ध्यान किया जाए ध्येय कहलाता है
ध्यान के समय इस प्रकार अलग अलग भान होता है की मैं ध्यान कर रहा हूँ,यह ध्यान है,इस ध्येय का ध्यान हो रहा है ।परन्तु समाधि में इस त्रिपुटी का भान जाता रहता है और केवल ध्येय के स्वरुप का ही भान होता रहता है  
उदाहरणार्थ हम भगवान् के किसी विग्रह अथवा चित्र या स्वयं की ही भृकुटी पर ध्यान करते हैं । अभ्यास करते करते एक ऐसी स्थति आती है जब कौन ध्यान कर रहा,ध्यान हो रहा है ये दोनों नहीं रहते इसका अनुभव भी व्यक्ति को नहीं होता बल्कि ध्येय ही रह जाता है । इसे ही समाधि कहते हैं

Sunday, 15 January, 2012

जीव का स्वरुप आत्मा है जो की मन,बुद्धि इन्द्रियों का प्रकाशक है


जीव अपना स्वरुप शरीर क्यूँ मानता है ?
क्यूँ हम शान्ति सौहाद्र की अपेक्षा काम क्रोध लोभ में आसक्त होते हैं ?
आखिर ऐसा क्यूँ होता है की हम अच्छा सोचते सोचते ग़लत सोचने लगते हैं ?
समाज में शुरू से ही अच्छाई की अपेक्षा बुराई ज्यादा क्यूँ रहती है ?
आखिर क्यूँ आदमी बुराई के प्रति जल्दी आकृष्ट होता है ?
क्यूँ हम अच्छाई के पथ पर चलने को बहुत कठिन मानते हैं ?
क्यूँ हमे लगता है की दंभ,घमंड,अहम् ही जीवन के सार तत्त्व हैं ?
क्या हमे ऐसा लगता है की चालाकी,धूर्तता,दुष्टता,क्रोध,हिंसा व दूसरों को कष्ट देने के लिए ही ये जीवन मिला है ?
क्या हमे ऐसा लगता है की ऐसा बहादुर व्यक्ति ही कर सकता है ?
क्यूँ हमे लगता है की सहिष्णुता,शान्ति,प्रेम,सौहाद्र,सरलता,दम्भ रहित होना कायरता और भीरूपन के परिचायक हैं ?
क्यूँ हमे कई बार ऐसा भी लगता है की भगवान् है ही नहीं ?
क्या हम जाने अनजाने अपने अवचेतन मन में भी ये नहीं सोच पाते की ये जीवन क्षणभंगुर  है?
क्या हम सदैव ये विवेक जाग्रत रखते हैं की संसार असत है और हम हमारे मिलने वाले एक न एक दिन काल में समा जायेंगे? कोई भी व्यक्ति अमर नहीं है ?
क्या हमे मालूम है सारे कार्य तीन गुणों अथार्त सत्व,रज और तम गुणों के द्वारा होते हैं और हमारा स्वरुप वास्तव में निर्लिप्त रहता है ?
क्या हमे ये अनुभव है अथवा क्या हम ये जानते हैं की इन गुणों को ही कर्ता देखना चाहिए स्वयं (आत्मा)  को नहीं ?
आखिर क्यूँ खराब सोचना अथवा विषय चिंतन अच्छा लगता है जबकि अच्छा सोचना या विषयों के प्रति वैराग्य जगाना कष्टदायी प्रतीत होता है ?
क्या हमे ये मालूम है की विषय भोग का आनंद शुरू में आनंददायी  अंत में विषदायी है व अनासक्त होना शुरू में कष्टकारी परन्तु  परिणाम  में अमृततुल्य  है ?
क्या हम प्रशंसा के अभिलाषी हैं और दूसरे के प्रमाणपत्र को पाना ही सार तत्त्व मानते हैं ?
क्या प्रशंसा की लालसा के कारण हम आत्मिक रूप से अपना आत्म कल्याण नहीं कर पाते ?
क्या ग्यानी होने के बाद भी प्रशंसा पाने की उत्कंठा हमे वही परिणाम अथार्त गति दे सकती है जो अज्ञानी को मिलती है ?
क्या स्वयं को शरीर मानने के कारण ही हम विषय-भोग,इन्द्रिय-सुख,धन,बल मान आदि को ही जीवन की प्राथमिकता मान लेते है?  
क्या हम स्वयं से भी बात करते हैं ? क्या स्वयं का अध्ययन अथार्त आत्म अध्ययन के लिए ही हमे ये जीवन मिला है ?
क्या स्वयं का स्वरुप शरीर मानने के कारण हम नित अविद्धा और अज्ञान को जाने अनजाने बढाते जाते हैं ?
जिन रक्त, मेद मज्जा इत्यादि से बने हुए अपने ही तरह के इंसानों में सुख ढूंढते हुए जीव बन्दर की तरह अथार्त मनाने,रुसने,दुखी होने खुश होने अथार्त नाच आदि में लगा रहता है उनका व स्वयं का सबसे बड़ा हित आत्मज्ञान अथार्त आत्मिक हित ही होता है क्या हमे ऐसा लगता है ?

ये सभी प्रश्न और इसी तरह के असंख्य प्रश्न जो प्राय अज्ञान,अविद्धा,संशय आदि से उत्पन्न होते हैं  और इन्हें ही बढाते रहते हैं और इस तरह से जीव को मोहित रखते हैं जिससे पूरा जीवन अज्ञान में ही निकल जाता है और सत्संग,आत्मिकज्ञान की चर्चा में कभी रूचि नहीं लगती बल्कि व्यक्ति मोह माया के तम रूप अन्धकार में नित काम क्रोध को बढाता हुए वास्तविकता में उनका ही ग्रास बनता हुआ बहुमूल्य जीवन गँवा देता है

बहरहाल क्या ऐसा कोई उत्तर है जो इन सब प्रश्नों का उत्तर हो तो हाँ ऐसा उत्तर है और यदि हम गंभीरता से विचार करने तो इन्ही प्रश्नों को सार प्रश्न बनाते हुए अर्जुन ने भगवान् से पूछा था ।
तीसरा अध्याय :
अर्जुन उवाचः
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ 
भावार्थ :  अर्जुन बोले- हे कृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात्‌ लगाए हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है॥36॥॥
और भगवान् श्रीकृष्ण के उत्तर ने सभी अज्ञान व अज्ञानजनित प्रश्नों को मात्र चंद शब्दों में सारे अज्ञान को समाप्त कर दिया । जैसे रात के वक़्त सारा विश्व अन्धकार में डूबा रहता है परन्तु इतनी बड़ी धरा के अँधेरे को सूर्य देवता छोटे से होते हुए भी प्रात होते ही अपने प्रकाश से दूर कर देते है ।अज्ञान रुपी अँधेरा जितना भी बढ़ जाए उसके लिए थोडा सा उजाला ही काफी है और यहाँ तो परमात्मा परमेश्वर जगताधार स्वयं श्रीकृष्ण की मुख से ये तेज को भी तेज प्रदान करने वाले शब्द प्रस्फुटित हुए ।


श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्‌ ॥
भावार्थ :  श्री भगवान बोले- रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है। इसको ही तू इस विषय में वैरी जान॥37॥
 दूसरे अध्याय में भगवान् ने इसी के मैकेनिस्म(वैज्ञानिक रूप से ) को अथार्त यही बात दूसरे ढंग से भी कही थी बस अंतर ये है की यहाँ तीसरे अध्याय में उन्होंने प्रमाणित रूप से कहा जिससे मनुष्य को बिलकुल भी संदेह न हो । दूसरे अध्याय में भगवान् कहते है :
दूसरा अध्याय 

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ 
भावार्थ :   विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है॥62॥
क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
भावार्थ :   क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है॥63॥ 
यहाँ यदि हम सिलसिलेवार देखें तो पायेंगे की कुछ प्रक्रियाएं है जिनसे व्यक्ति अज्ञान अथवा अधोगति के उन्मुख होता है ।
 १. विषयों का चिंतन 

२. आसक्ति 
३. विषयों की कामना 
४. कामना में विघ्न 
५. विघ्न से क्रोध

६.  मूढ़ भाव 

७. स्मृति में भ्रम 
 ८. बुद्धि अथार्त ज्ञान शक्ति का नाश
 ९. आत्मिक पतन
यहाँ जैसा की भगवान् ने बताया और हम स्वयं भी ऐसा अनुभव करते हैं की सबसे पहले हमसे विषय चिंतन ही होता है और उसके बाद विषयों में आसक्ति उत्पन्न होती है  और उसके बाद विषयों में कामना बढती है परन्तु हर कामना पूरी नहीं होती और विषयों की कामना अतृप्ति पर ही अथार्त और विषय सुख मिले इसी पर ख़त्म होती है। इसलिए जीव क्रोध करने लगता है और इस तरह से अंततोगत्वा स्वयं पतन की तरफ अग्रसर होने लगता है । परन्तु यदि शुरू से अथार्त विषयों का चिंतन करने से पहले ही जीव अपना विवेक जागृत रखे व विषयों में न रमे संयमशील रहे तो वो आत्मिक स्तर पर सदैव कायम रहेगा व स्वयं को निर्लिप्त रखते हुए सारे कार्य करेगा ।  यदि जीव आत्मा को ही सबसे शक्तिशाली व मन बुद्धि का प्रकाशक जानते हुए आत्मा को आप्तकाम नित्यतृप्त जानेगा व मन बुद्धि आत्मा के द्वारा ही संचालित होते हैं ऐसा समझके मन बुद्धि के वश में होने के बजाय उनपर नियंत्रण रखेगा तो आसानी से अपने आत्मिक हित के साथ लौकिक,भौतिक व सामाजिक जीवन में भी मोह माया रुपी दुःख के हेतु को जीत लेगा व सदैव प्रसन्न रहते हुए प्रसन्नता ही बांटेगा। 

यही बात भगवान् इस श्लोक के आगे के श्लोक में कहते हैं :
 
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌ ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ 
भावार्थ :   परंन्तु अपने अधीन किए हुए अन्तःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है॥64॥
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥
भावार्थ :   अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है॥65॥
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌ ॥ 
भावार्थ :   न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?॥66॥