Saturday 3 September 2011

Dohas of Sant Kabirdaas ji

 
ते दिन गये अकारथी, संगत भई संत
प्रेम बिना पशु जीवना, भक्ति बिना भगवंत 201
तीर तुपक से जो लड़े, सो तो शूर होय
माया तजि भक्ति करे, सूर कहावै सोय 202
तन को जोगी सब करे, मन को बिरला कोय
सहजै सब विधि पाइये, जो मन जोगी होय 203
तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे नसूर
तब लग जीव जग कर्मवश, जब लग ज्ञान ना पूर 204
दुर्लभ मानुष जनम है, देह बारम्बार
तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि लागे डार 205
दस द्वारे का पींजरा, तामें पंछी मौन
रहे को अचरज भयौ, गये अचम्भा कौन 206
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय
माली सीचें सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय 207
न्हाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल जाय
मीन सदा जल में रहै, धोये बास जाय 208
पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय
एक पहर भी नाम बीन, मुक्ति कैसे होय 209
पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया कोय
ढ़ाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंड़ित होय 210
पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात
देखत ही छिप जाएगा, ज्यों सारा परभात 211
पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजौं पहार
याते ये चक्की भली, पीस खाय संसार 212
पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय
अब के बिछुड़े ना मिले, दूर पड़ेंगे जाय 213
प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बजाय
चाहे घर में बास कर, चाहे बन मे जाय 214
बन्धे को बँनधा मिले, छूटे कौन उपाय
कर संगति निरबन्ध की, पल में लेय छुड़ाय 215
बूँद पड़ी जो समुद्र में, ताहि जाने सब कोय
समुद्र समाना बूँद में, बूझै बिरला कोय 216
बाहर क्या दिखराइये, अन्तर जपिए राम
कहा काज संसार से, तुझे धनी से काम 217
बानी से पहचानिए, साम चोर की घात
अन्दर की करनी से सब, निकले मुँह की बात 218
बड़ा हुआ सो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर
पँछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर 219
मूँड़ मुड़ाये हरि मिले, सब कोई लेय मुड़ाय
बार-बार के मुड़ते, भेड़ बैकुण्ठ जाय 220
माया तो ठगनी बनी, ठगत फिरे सब देश
जा ठग ने ठगनी ठगो, ता ठग को आदेश 221
भज दीना कहूँ और ही, तन साधुन के संग
कहैं कबीर कारी गजी, कैसे लागे रंग 222
माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय
भागत के पीछे लगे, सन्मुख भागे सोय 223
मथुरा भावै द्वारिका, भावे जो जगन्नाथ
साधु संग हरि भजन बिनु, कछु आवे हाथ 224
माली आवत देख के, कलियान करी पुकार
फूल-फूल चुन लिए, काल हमारी बार 225
मैं रोऊँ सब जगत् को, मोको रोवे कोय
मोको रोवे सोचना, जो शब्द बोय की होय 226
ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं
सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठें घर माहिं 227
या दुनियाँ में कर, छाँड़ि देय तू ऐंठ
लेना हो सो लेइले, उठी जात है पैंठ 228
राम नाम चीन्हा नहीं, कीना पिंजर बास
नैन आवे नीदरौं, अलग आवे भास 229
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय
हीरा जन्म अनमोल था, कौंड़ी बदले जाए 230
राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय
जो सुख साधु सगं में, सो बैकुंठ होय 231
संगति सों सुख्या ऊपजे, कुसंगति सो दुख होय
कह कबीर तहँ जाइये, साधु संग जहँ होय 232
साहिब तेरी साहिबी, सब घट रही समाय
ज्यों मेहँदी के पात में, लाली रखी जाय 233
साँझ पड़े दिन बीतबै, चकवी दीन्ही रोय
चल चकवा वा देश को, जहाँ रैन नहिं होय 234
संह ही मे सत बाँटे, रोटी में ते टूक
कहे कबीर ता दास को, कबहुँ आवे चूक 235
साईं आगे साँच है, साईं साँच सुहाय
चाहे बोले केस रख, चाहे घौंट मुण्डाय 236
लकड़ी कहै लुहार की, तू मति जारे मोहिं
एक दिन ऐसा होयगा, मैं जारौंगी तोहि 237
हरिया जाने रुखड़ा, जो पानी का गेह
सूखा काठ जान ही, केतुउ बूड़ा मेह 238
ज्ञान रतन का जतनकर माटी का संसार
आय कबीर फिर गया, फीका है संसार 239
ॠद्धि सिद्धि माँगो नहीं, माँगो तुम पै येह
निसि दिन दरशन शाधु को, प्रभु कबीर कहुँ देह 240
क्षमा बड़े को उचित है, छोटे को उत्पात
कहा विष्णु का घटि गया, जो भुगु मारीलात 241
राम-नाम कै पटं तरै, देबे कौं कुछ नाहिं
क्या ले गुर संतोषिए, हौंस रही मन माहिं 242

बलिहारी गुर आपणौ, घौंहाड़ी कै बार
जिनि भानिष तैं देवता, करत लागी बार 243
ना गुरु मिल्या सिष भया, लालच खेल्या डाव
दुन्यू बूड़े धार में, चढ़ि पाथर की नाव 244
सतगुर हम सूं रीझि करि, एक कह्मा कर संग
बरस्या बादल प्रेम का, भींजि गया अब अंग 245
कबीर सतगुर ना मिल्या, रही अधूरी सीष
स्वाँग जती का पहरि करि, धरि-धरि माँगे भीष 246
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान
सीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान 247
तू तू करता तू भया, मुझ में रही हूँ
वारी फेरी बलि गई, जित देखौं तित तू 248
राम पियारा छांड़ि करि, करै आन का जाप
बेस्या केरा पूतं ज्यूं, कहै कौन सू बाप 249
कबीरा प्रेम चषिया, चषि लिया साव
सूने घर का पांहुणां, ज्यूं आया त्यूं जाव 250
कबीरा राम रिझाइ लै, मुखि अमृत गुण गाइ
फूटा नग ज्यूं जोड़ि मन, संधे संधि मिलाइ 251
लंबा मारग, दूरिधर, विकट पंथ, बहुमार
कहौ संतो, क्यूं पाइये, दुर्लभ हरि-दीदार 252
बिरह-भुवगम तन बसै मंत्र लागै कोइ
राम-बियोगी ना जिवै जिवै तो बौरा होइ 253

यह तन जालों मसि करों, लिखों राम का नाउं
लेखणि करूं करंक की, लिखी-लिखी राम पठाउं 254
अंदेसड़ा भाजिसी, सदैसो कहियां
के हरि आयां भाजिसी, कैहरि ही पास गयां 255
इस तन का दीवा करौ, बाती मेल्यूं जीवउं
लोही सींचो तेल ज्यूं, कब मुख देख पठिउं 256
अंषड़ियां झाईं पड़ी, पंथ निहारि-निहारि
जीभड़ियाँ छाला पड़या, राम पुकारि-पुकारि 257
सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजावै नित्त
और कोई सुणि सकै, कै साईं के चित्त 258
जो रोऊँ तो बल घटै, हँसो तो राम रिसाइ
मन ही माहिं बिसूरणा, ज्यूँ घुँण काठहिं खाइ 259
कबीर हँसणाँ दूरि करि, करि रोवण सौ चित्त
बिन रोयां क्यूं पाइये, प्रेम पियारा मित्व 260
सुखिया सब संसार है, खावै और सोवे
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रौवे 261
परबति परबति मैं फिरया, नैन गंवाए रोइ
सो बूटी पाऊँ नहीं, जातैं जीवनि होइ 262
पूत पियारौ पिता कौं, गौहनि लागो घाइ
लोभ-मिठाई हाथ दे, आपण गयो भुलाइ 263
हाँसी खैलो हरि मिलै, कौण सहै षरसान
काम क्रोध त्रिष्णं तजै, तोहि मिलै भगवान 264

जा कारणि में ढ़ूँढ़ती, सनमुख मिलिया आइ
धन मैली पिव ऊजला, लागि सकौं पाइ 265
पहुँचेंगे तब कहैगें, उमड़ैंगे उस ठांई
आजहूं बेरा समंद मैं, बोलि बिगू पैं काई 266
दीठा है तो कस कहूं, कह्मा को पतियाइ
हरि जैसा है तैसा रहो, तू हरिष-हरिष गुण गाइ 267
भारी कहौं तो बहुडरौं, हलका कहूं तौ झूठ
मैं का जाणी राम कूं नैनूं कबहूं दीठ 268
कबीर एक जाण्यां, तो बहु जाण्यां क्या होइ
एक तै सब होत है, सब तैं एक होइ 269
कबीर रेख स्यंदूर की, काजल दिया जाइ
नैनूं रमैया रमि रह्मा, दूजा कहाँ समाइ 270
कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाउं
गले राम की जेवड़ी, जित खैंचे तित जाउं 271
कबीर कलिजुग आइ करि, कीये बहुत जो भीत
जिन दिल बांध्या एक सूं, ते सुख सोवै निचींत 272
जब लग भगहित सकामता, सब लग निर्फल सेव
कहै कबीर वै क्यूँ मिलै निह्कामी निज देव 273
पतिबरता मैली भली, गले कांच को पोत
सब सखियन में यों दिपै, ज्यों रवि ससि को जोत 274
कामी अभी भावई, विष ही कौं ले सोधि
कुबुध्दि जीव की, भावै स्यंभ रहौ प्रमोथि 275

भगति बिगाड़ी कामियां, इन्द्री केरै स्वादि
हीरा खोया हाथ थैं, जनम गँवाया बादि 276
परनारी का राचणौ, जिसकी लहसण की खानि
खूणैं बेसिर खाइय, परगट होइ दिवानि 277
परनारी राता फिरैं, चोरी बिढ़िता खाहिं
दिवस चारि सरसा रहै, अति समूला जाहिं 288
ग्यानी मूल गँवाइया, आपण भये करना
ताथैं संसारी भला, मन मैं रहै डरना 289
कामी लज्जा ना करै, माहें अहिलाद
नींद माँगै साँथरा, भूख माँगे स्वाद 290
कलि का स्वामी लोभिया, पीतलि घरी खटाइ
राज-दुबारा यौं फिरै, ज्यँ हरिहाई गाइ 291
स्वामी हूवा सीतका, पैलाकार पचास
राम-नाम काठें रह्मा, करै सिषां की आंस 292
इहि उदर के कारणे, जग पाच्यो निस जाम
स्वामी-पणौ जो सिरि चढ़यो, सिर यो एको काम 293
ब्राह्म्ण गुरु जगत् का, साधू का गुरु नाहिं
उरझि-पुरझि करि भरि रह्मा, चारिउं बेदा मांहि 294
कबीर कलि खोटी भई, मुनियर मिलै कोइ
लालच लोभी मसकरा, तिनकूँ आदर होइ 295
कलि का स्वमी लोभिया, मनसा घरी बधाई
दैंहि पईसा ब्याज़ को, लेखां करता जाई 296

कबीर इस संसार कौ, समझाऊँ कै बार
पूँछ जो पकड़ै भेड़ की उतर या चाहे पार 297
तीरथ करि-करि जग मुवा, डूंधै पाणी न्हाइ
रामहि राम जपतंडां, काल घसीटया जाइ 298
चतुराई सूवै पढ़ी, सोइ पंजर मांहि
फिरि प्रमोधै आन कौं, आपण समझे नाहिं 299
कबीर मन फूल्या फिरै, करता हूँ मैं घ्रंम
कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत देखै भ्रम 300

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