Sunday 4 September 2011

Woh muskuraate phool nahi

वे मुस्कराते फूल नहीं
जिनको आता है मुरझाना
वे तारों के दीप नहीं
जिनको भाता है बुझ जाना

वे नीलम के मेघ नहीं

जिनको है घुल जाने की चाह
वह अनंत ऋतुराज नहीं
जिसने देखी जाने की राह

वे सूने से नयन नहीं

जिनमें बनते आँसू मोती
यह प्राणों की सेज नहीं
जिसमें बेसुध पीड़ा सोती

ऐसा तेरा लोक वेदना

नहीं नहीं जिसमें अवसाद
जलना जाना नहीं नहीं
जिसने जाना मिटने का स्वाद

क्या अमारों का लोक मिलेगा

तेरी करुणा का उपहार
रहने दो हे देव अरे
यह मेरा मिटने का अधिकार 


-  महादेवी वर्मा

No comments:

Post a Comment