Tuesday 4 October 2011

Jeevan yah maulik mahmaani

जीवन, यह मौलिक महमानी!

खट्टा, मीठा, कटुक, केसला
कितने रस, कैसी गुण-खानी
हर अनुभूति अतृप्ति-दान में
बन जाती है आँधी-पानी

कितना दे देते हो दानी

जीवन की बैठक में, कितने
भरे इरादे दायें-बायें
तानें रुकती नहीं भले ही
मिन्नत करें कि सौहे खायें!

रागों पर चढ़ता है पानी।।

जीवन, यह मौलिक महमानी।।

ऊब उठें श्रम करते-करते

ऐसे प्रज्ञाहीन मिलेंगे
साँसों के लेते ऊबेंगे
ऐसे साहस-क्षीण मिलेगे

कैसी है यह पतित कहानी?

जीवन, यह मौलिक महमानी।।

ऐसे भी हैं, श्रम के राही

जिन पर जग-छवि मँडराती है
ऊबें यहाँ मिटा करती हैं
बलियाँ हैं, आती-जाती हैं।

अगम अछूती श्रम की रानी!

जीवन, यह मौलिक महमानी।


 - माखनलाल  चतुर्वेदी 

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