Sunday 13 November 2011

बलात्कार







चली  जा  रही  थी  मैं  
अचानक चार  लोगों  ने  मुझे  रोका 
मुझे  घसीटा  और   दरिन्दे  बन  बैठे  
चीखती  रही  चिल्लाती  रही  मैं 
अपनी अस्मत की भीख मांगती रही मैं  
लेकिन  उससे  उन्हें  कोई फर्क न पड़ा  
नोचते  रहे  वो  चील- कौवों  की  मानिंद 
खेलते  रहे  मेरे  जिस्म  के  साथ  हैवानियत  का  खेल 
फिर मरा जानकर  छोड़ गए मुझे  मेरे  हाल  पर 

मैं  लेकिन  अब  मैं  कहाँ  रह  गयी 
मेरे  जिस्म  पर  उन  नाखूनों  के  निशान
हमेशा  के  लिए  हो  चुके  हरे  ज़ख्म 
पूछते  रहते  मुझसे 
बताते  रहते  मुझको 
जिस्म  नहीं  तेरी  रूह  मसली  गयी  है 
इस तरह से तेरी रूह रो रही है 
तू  जिंदा  नहीं  मर  चुकी  है 
पूछते  रहते  हैं  वो  निशान   
क्या  अब  तेरी  रात  ख़त्म  होगी कभी 
दर्द  से  अनजान  कोई  सवेरा  देखेगी तू कभी 


मेरे  हौसलों  की  सुबह  खो  गयी 
मेरे  दुखों  की  रात  में  मिल  गयी 
किस  तरह  ख़त्म  किया  है  वजूद  मेरा 
चार  पलों  की  तुच्छ  कामपिपासा  के  लिए
इंसानों  ने  हैवानियत  को  भी  शर्मसार कर डाला 
काश मुझे इंसान समझा होता
खुद इंसान होके भी जानवर न बनते 
रक्त,हड्डी,मांस को नोचने में ये कैसी ख़ुशी 
आदमियत के क्या मायने रह गए मेरे लिए 
ज़िन्दगी के हर मंज़र ग़म की छाँव हो गए 
सोचों में भी गहरे ज़ख्म 
आखिर सोचूं भी तो क्या 
कैसे कहूँ मैं भी कभी इंसान थी 
आँख खोलूं या बंद करूँ वोही खौफनाक मंज़र 
क्या दिलासा देके खुद को ढाढस बंधाऊं
अपने आने वाले कल में कैसे खुशियाँ लाऊं
हर  पल  खुद  को  मरते  हुए  देखना  
हर  दिन  उदासी  से  उगा  सूरज  देखना 
और  फिर  लोगों  द्वारा  बदचलनी  के आरोप  
मैं  कैसे  जवाब  दूँ  जब  हिलते  नहीं  होंठ 
कैसे घर से निकलूं जब हर नज़र सवाल करती है






इंसानी  सामाज  का  ये  कैसा  रूप  है 
ये  कैसी  दरिंदगी ,हवस की  कैसी  भूख  है  
बलात्कार  इंसानियत  को  कलंकित  करता  है 
इसका  असर  जिस्म  से  ज्यादा  रूह  पर  होता  है 
आज  समाज  में  नित  बलात्कार  की  घटनाएं  बढ़  रहीं 
न  ही  प्रशासन  न  ही  समाज  को  इसकी  चिंता  सता  रही 
बलात्कार  पीडिता  भी  किसी  की  माँ,.बहन,बेटी  होती  है 
आखिर  क्यूँ  नहीं  बलात्कारी  की  आत्मा  पसीजती  है 
3 साल  की  लड़की  तो  कभी  60 साल  की  औरत  इसका  शिकार  होती 
कितनी  तो  बलात्कारियों  द्वारा  जिंदा  जला  दी  जातीं 
आखिर  कब  तक  ऐसी  ख़बरें अखबारों  की  शीर्ष  पंक्तियाँ  बनेंगी 
आखिर  कब  तब  टीवी  चैनल  में  आखें  ये  वहशत  देखेंगी 
क्यूँ  नहीं  बलात्कारी  को  दण्डित करने  वाली  ख़बरें  दिखाई  जाती 
क्यूँ नहीं समाज को कालिख पोतने वाले इस कुकृत्य पर लगाम लगती 
क्यूँ  बलात्कारी  को  बलात्कार  के  बाद  ही  बेल दे  दी  जाती 
क्यूँ नहीं बलात्कारी के खिलाफ निश्चित कार्यवाही की जाती  
देश का क़स्बा गाँव की कौन कहे जब राजधानी में ही महिलाएं सुरक्षित नहीं 
कार में घसीटने की घटनाएं गुंडों द्वारा पुलिस थाने के बगल में हो रही 
ये कैसी शासन व्यवस्था जहाँ  बलात्कारी जेल जाते ही  छूट  जाते  हैं 
ये  कैसा  समाज  जहाँ  वो  फिर से  येही  कुकृत्य दोहराते  हैं 
कई तो बाहुबली बन डंके की चोट पर अपने इलाके में आतंक मचाते हैं
कई तो नेता बनकर जनता से अपनी महिमा गान कराते हैं
कई जिस्मफिरोशी का धंधा जमा बलात्कार को महिमामंडित करते हैं 
क्या बलात्कार,चोरी,डकैती,खून सभ्य समाज के आभूषण हो गए हैं   
वस्तुवादिता और वासना से ओत-प्रोत हो समाज अपने नैतिक मूल्यों को भूल रहा   
सच्चाई,करुणा,प्रेम,दया,सहिष्णुता,मानवता को समाज भूल रहा 
इन्ही सद्गुणों को आधार बिंदु मानके ऐसी घृणित सोच रुकेगी 
तभी जाके इंसानियत शर्मसार होने से बच सकेगी 
तब जाके स्वच्छ,पारदर्शी व नैतिकता प्रधान समाज का निर्माण होगा 
तब जाके पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं का सच्चा सम्मान होगा 






14 comments:

  1. काश लोग इस गंभीर समस्या के साथ जुडें और इस पर सब लोग इसके निराकरण की दिशा में काम करें।
    समाज का आइना दिखाई बहुत सुंदर पोस्ट

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  2. गंभीर समस्या को चित्रित कर सही आइना दिखाया है आपने समाज को!!

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  3. ह्रदय विदारक और मार्मिक चित्रण

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  4. पूरे आक्रोश से लिखी गई रचना जो दिल और दिमाग में उथल-पुथल पैदा करती है। इस कुकृत्य के लिए इससे कम तल्ख शब्द हो भी नहीं सकते थे।

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  5. bahut hi ghranit chitro ke saath harday vidarak rachna uddvelit kar gai humare samaaj ka ek ghinauna chehra ye bhi hai jab tak sarkar yese gunahgaar ke liye fansi ki saja nahi mukarrar karegi yesi ghatnaaon ko anjaam milta rahega.

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  6. समाज के लिए दंश है यह समस्या ...इसे बेहतरीन ढंग से उकेरते शब्द ....

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  7. सही मुद्दे को लेकर और इस गंभीर समस्या पर आपने जो विस्तारित रूप से प्रस्तुत किया है क़ाश इसका कोई असर हो! बहुत ही मार्मिक चित्रण !

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  8. samvednaon se rhit manav haivan nb gaya hai jo apni bhu beton tk ko nhi bakhshata.satik prastuti.

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  9. prataap ji
    behad hi sharmnaak aur dil ko dahla dene wala manjar jisse har roj hi koi na koi pidit hota hai.
    aaj ke samaaj ke sach ka aaina dikhati hai aapki yah parstuti.
    bahut hi marmahat kar dene wali post
    bahut hi samvedan sheel-----
    poonam

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  10. समाज के घिनोने कृत्य पर प्रभावी पंक्तियाँ.काश ये कुकर्म करने वाले थोड़े से इंसान बन पाते

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  11. हृदय विदारक ! समाज का घिनौना रूप
    सचमुच इस कुकृत्य के लिए इससे कम तल्ख शब्द हो भी नहीं सकते थे।

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  12. वीभत्सता और हैवानियत की चरम सीमा है यह...

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  13. मन विदीर्ण कर दिया |
    आशा

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