Saturday, 3 March, 2012

जीवन वो ही सार्थक जिसमे दिखावे का नाम नहीं

जीवन वो ही सार्थक जिसमे दिखावे का नाम नहीं 
होता है आगाज़ दंभ में होता कभी अंजाम नहीं 
 

रहगुज़र में  गुज़र जाए जिंदगानी बहुत अच्छी है
ऊंचे महलों में मिले कैसे है जब वहां आराम नहीं 
 

रब को देखना अगर चाहो तो देखो उसके बन्दों को  
करो सलाम सबसे खुद के लिए चाहो एहतराम नहीं 


नमाज़ अलग होने से काफिर नहीं हो जाता कोई 
खुदा के बगैर पूरा हुआ हो ऐसा कोई कलाम नहीं 



सुख दुःख ग़म ख़ुशी ये बादलों के मौसम हैं फ़क़त
इनसे ऊपर है आसमान जहाँ इनका कोई काम नहीं 



ख़ुशी अपनी तलाशने लगता हैं जब औरों के ग़म में 
बरकत है उसकी ज़िन्दगी होता कभी वो नाकाम नहीं 



'प्रताप' बहादुर है तू जो नुमाया कर अपने ऐबों को 
देख ज़हन में भी उभरे हरगिज़ कोई इलज़ाम नहीं




4 comments:

  1. पवित्र भावना, सुन्दर ग़ज़ल!

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  2. वाह!
    आपके इस प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 05-03-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  3. क्या बात है जी ! बहुत सारी ,बातें ,तत्थ्यों को एक साथ संजोने की प्रवीणता को और होली की बहुत -२ बधाईयाँ /

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  4. पर आज के वक्त में दिखावे के बिना कोई काम नहीं हैं


    होली की शुभकामनाएं

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