Sunday 18 March 2012

आस्तिकता



क्या भगवान् हैं ?हम कैसे मानें की भगवान् हैं  ?


अथवा


हम आस्तिकता की ओर उन्मुख कैसे हों ?




पिछली पोस्ट को लिखके एक सात्विक आनंद और सुकून सा मिला । मुझे विश्वास नहीं हुआ ये मैं कैसे लिख गया मुझे इससे बहुत आध्यात्मिक लाभ मिला । आज फिर से ब्लॉग पर आया तो सोचा इसी पर फिर प्रभु का नाम लेकर फिर से लिखूं ।
मेरा ही नहीं अधिकाँश लोगों का मानना होगा की व्यक्ति के लिए इससे महत्वपूर्ण प्रश्न और उपयोगी तथ्य कुछ नहीं हो सकता । यदि हमे सही व सच्चे तरीके से परमात्मा के होने का भरोसा मिल जाए मैं यकीनन कह सकता हूँ की पढने वालों में से ही ८० से ९० % लोगों का जीवन और जीवन जीने का नजरिया बदल सकता है ।इस प्रश्न के निदान से बहुत सी आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है व हमारी संसार में आसक्ति पूर्ण सोच बदल जाती है ।

यदि हम ध्यान से जीवन को देखें अथार्त जीवन को समझें और हम कैसे समझतें हैं उसे, ये समझें तो बहुत कुछ समझ जायेंगे तब हमे ये मालूम हो पायेगा की हमारे जीवन में भगवान् का कितना स्थान है ।

ये प्रभु की असीम कृपा है जो इस विषय पर कुछ विचार व्यक्त हो रहे हैं ।


प्रत्येक व्यक्ति ये जानता है सुनता है की भगवान् हैं परन्तु कभी तो मान नहीं पाता कभी मानना नहीं चाहता।

क्या भगवान् हैं ?हम कैसे मानें की भगवान् हैं  ?


अथवा


हम आस्तिकता की ओर उन्मुख कैसे हों ?


समाधान : 

८. आत्मा की सत्ता- व्यक्ति का स्वरुप शरीर नहीं आत्मा है

  
यदि हम अपने आस पास का जीवन देखें तो हमे यही लगेगा प्रत्येक व्यक्ति अँधा होके अंधों की दौड़ में भागा जा रहा है

कोई सुबह से शाम तक टी वी में ही मस्त है
कोई दफ्तर का काम करके लौटने के बाद अगले दिन के दफ्तर के बारें में सोचने को वरीयता देता है
कोई सुबह से शाम सिर्फ अपने बिजनेस में ही परेशान रहता है
कोई कंप्यूटर के साथ ही नाश्ता डिनर में वक़्त निकाल देता
कोई अपनी पढ़ाई के बाद नौकरी की सोच में लगा होता
किसी की ज़िन्दगी गर्ल फ्रेंड किसी की बॉय फ्रेंड के चक्कर में ही बीत रही है
कोई अपनी नित्य नयी सांसारिक उपलब्धियों में ही व्यस्त है
कोई जीवन में मैंने सब कुछ कर लिया इसी संतोष से खुश है


अथार्त अधिकांशतः लोग अपनी शारीरिक,मानसिक ऊर्जा का सही उपयोग नहीं कर रहे
हम अपने सुख दुःख को ही दुनिया समझते हैं और बस इसी को आधार मानकर अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं

हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा तो हमारे मानसिक व शारीरिक चेतना से और गतिशील होती है और मानसिक व शारीरिक ऊर्जा सही मायने में तभी ऊर्ध्वमुखी होती हैं जब वो आध्यात्मिक ऊर्जा से मिली होती हैं

अथार्त हमे सिर्फ ये समझना है की जीवन सिर्फ सांसारिक वस्तुओं के लिए नहीं मिला है,जीवन सिर्फ सांसारिक व मायिक सुख दुःख राग द्वेष मोह माया दंभ आदि में लगाने से व्यर्थ सिद्ध हो जाता है

इन सारी बातों को कहने के पीछे मेरा उद्देश्य आत्मा की सत्ता और प्रधानता की ओर इंगित करना था अथार्त हम आत्मा हैं ये सिर्फ कहें नहीं इसे समझें इसे मानें

प्रत्येक व्यक्ति का स्वरुप शरीर नहीं आत्मा है और ये निर्विवादित तथ्य है जिसे सभी धर्म के लोग भी मानते हैं और जो की पूर्णतया सच है क्यूंकि व्यक्ति के मरने के बाद आत्मा निकल जाती है और उसका शरीर रह जाता है अथार्त हम जो शरीर को सुख देने में व इसके सुख के लिए काम,क्रोध,लोभ आदि विकारों में जीवन निकाल देते हैं वो तो अंततः मिटटी में ही मिल जाता है और जो आप्तकाम,सदा संतुष्ट,शाश्वत,निर्विकार  तथा अविनाशी आत्मा है यानी की हम हैं वो तो हमेशा ही है

इस सोच को जब हम यथार्थ रूप से जीवन में लाने लगते हैं तो आस्तिकता की ओर भी उन्मुख होने लगते हैं


९. स्रष्टि का सञ्चालन ईश्वर की प्रेरणा से होता है 

यदि हम ये कहें की

क्या भगवान् नहीं है ? क्यूँ भगवान् नहीं है ?

हम यदि इन प्रश्नों पर सोचें तो पायेंगे की इसका उत्तर यही है की ये सृष्टि बिना किसी ईश्वरीय प्रेरणा से नहीं चल सकती ।


१०. प्रधानता विकार की नहीं निर्विकारता की होनी चाहिए 

 हम किसी भी विकार के उत्पन्न होते ही आत्म-साक्षात्कार के पद से च्युत हो जाते हैं और हमे ये पता भी नहीं चलता । वास्तविकता में विकारों अथवा आसुरी गुणों की सत्ता है ही नहीं,हम चूँकि अपने अविकारी स्वरुप से अथवा ईश्वरीय गुणों से ज्यादा इन विकारों (काम,क्रोध,मद,लोभ,मोह) को वरीयता देते हैं अतः अपने में विकार पाते हैं,देखते हैं और इसलिए अशांत हो जाते हैं । हम जितना ज्यादा ईश्वरीय गुणों को प्रधानता देंगे 
 और जितना ज्यादा इस सोच के बिना की 'हमे ईश्वरीय गुणों को प्रधानता देना है' तब प्रधानता देते हैं उतना ही सहज रूप से अपने स्वरुप में स्थित रहते हैं और इस तरह से ईश्वर का सहज ही अनुभव करने लगते हैं ।


3 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
    आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 19-03-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  2. बहुत सारगर्भित आलेख...

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  3. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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