Monday 7 May 2012

ध्यानयोग 3

ध्यान की कई विधि प्रचलित हैं और अपनी अपनी जगह सभी सार्थक हैं
चाहे हम विपस्स्यना विधि जो भगवान् बुद्ध ने दी उसकी बात करें अथवा सुदर्शन क्रिया की या चाहे ओशो की ध्यान प्रणाली को समझें या फिर भगवद गीता के गूढ़ सिद्धांतों को समझें
ये सभी सिर्फ तभी उपयोगी हैं जब हम इनको अनुभव में लायें और अनुभव में कितना आ रहा है ये बहुत आसानी से हमारे व्यक्तित्व में,विचारों में,आचरण में दिखने लगता है
बिना अनुभव में आये हुए ध्यान की बात सिर्फ ऐसी है जैसे हमने कोई किताब पढ़ ली लेकिन उसमे लिखी बातों को जीवन में नहीं उतारा
यदि ध्यान के बाद हमारे अन्दर स्वाभाविक शान्ति बढ़ रही है,एकांत हमे अच्छा लग रहा है,क्षमा,दया,सहिष्णुता और अहिंसा(मन,कर्म व वचन  द्वारा हिंसा न करना) बढ़ रही है तो हमारा ध्यान बिलकुल ठीक दिशा में बढ़ रहा है

परन्तु यदि हम ध्यान में सोने लगते हैं,सर में दर्द होने लगता है अथवा ध्यान में बैठकर  इधर उधर सोचते रहते हैं तो ध्यान फलीभूत नहीं हुआ

अथवा हम इससे आगे बढे अथार्त मन एकाग्र होने लगा परन्तु दैवीय गुण नहीं निखारें अथवा बढे या फिर असुरी गुण वैसे के वैसे ही रहे तो मतलब
हम ध्यान में नहीं पहुँच पा रहे हैं

ध्यान एक शुद्धि है एक रेचन है जिसमे हमारे अन्दर की अशुद्धियाँ हटती हैं जिसमे हम अपने आप से ही अपने विकार मिटाते हैं
कैसे?
अपने अविनाशिस्वरूप के ज्ञान के द्वारा

अपने अविनाशिस्वरूप आत्मा में अपनी स्वाभाविक स्थिति के द्वारा
हमारे मन,बुद्धि को निर्मल करने का एक माध्यम है ध्यान और यदि हमारे मन में विकार बने रहते हैं ज़रा भी कम नहीं होते,यदि हम ध्यान में शान्ति नहीं महसूस कर रहे तो हमे तुरंत ऐसे ध्यान को रोक देना चाहिए क्यूंकि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है,बहुत संभव है हम अपना दिमाग लगा रहे हों कही हुई बात की जगह

सीधी सी बात है जैसे घर का कचरा निकालते समय फैन बंद कर देते हैं उसी तरह मन मस्तिष्क की गन्दगी साफ़ करने के लिए हम विचारशून्यता का आश्रय लेते हैं

विचारशून्यता का कायम रहना ध्यान है और ध्यान की अनुपस्थिति मन है

बहुत आवश्यक है की ध्यान के लिए बैठते समय हम अपने अन्दर के मन को,अपने अंतःकरण को राग-द्वेष दोनों की तरफ बढ़ने से रोकें व सम होने का प्रयत्न करें क्यूंकि आत्मा की प्रकृति समता ही है


ध्यान के लिए मेरा मानना है सबसे अधिक ज़रूरी है वैराग्य यानी हमे सिर्फ इतना मानना है जो की हम जानते भी हैं की ये जीवन क्षणभंगुर है,इसमें चाहे हम जितनी भी दक्षता से जो भी सांसारिक कार्य कर लें और नाम,धन,मान अर्जित कर लें परन्तु वो हमारे कौड़ी भर भी काम नहीं आने वाले
। हमारे काम तो सिर्फ आना है हमारी आत्मा जो की हमारा स्वरुप है और जिससे हम विमुख हुए बैठे हैं 
ध्यान अपनी आत्मा के अथार्त अपने स्वरुप के सम्मुख होना है

सच्चाई तो ये है की ध्यान के इलावा गया हुआ हमारा सारा समय निश्चित ही व्यर्थ हो जाना है क्यूंकि संकल्प विकल्प के द्वारा जो हम जीवन जीते हैं उससे तो फल में अगले जन्म में भी हमे सुख अथवा दुःख ही मिलना

है अथार्त संकल्प अथवा विकल्प ही मिलना है
। यही पूर्वजन्मों के संस्कार हमे आगे नहीं बढ़ने देते क्यूंकि ये स्वयं ही अज्ञान हैं जो हमारे ज्ञान रुपी दर्पण के चारों तरफ जम गए हैं जिसमे जब ज़रा सी गन्दगी सत्संग आदि से कम होती है हमे लगता है हमे थोडा ज्ञान मिला । परन्तु कुछ ही देर में जो थोड़ी सफाई हुई थी पुनः उसे हमने स्वयं ही राग-द्वेष द्वारा गन्दा कर दिया । इस तरह से पुनः ज्ञान आच्छादित होने स रुक गया,पुनः हम अपने मन,बुद्धि के वश में हो गए,पुनः हमे लगने लगा भला मन,बुद्धि से भी कुछ ऊपर होता है ?भला जीवन में मन को नियंत्रि भी किया जा सकता है ? 
ध्यान से हम इस दर्पण को अच्छी तरह साफ़ कर सकते हैं और इतना साफ़ की हमे स्वयं का स्वरुप दिखाई देने लगता है,तत्व-ज्ञान सुनाई पड़ने लगता है
।  और तब उल्टा होना शुरू हो जाता यानी हमारा यही मन जो सांसारिक सुखों को ही सब कुछ समझता है ध्यानजनित आनंद पाकर,सुख पाकर ज्ञान रुपी दर्पण को स्वयं ही साफ़ रखता है ,उसमे ज़रा भी अज्ञान रुपी धूल नहीं लगने देता


ध्यान का अनुभव एक बार हो जाने से दुबारा ध्यान में जाना कठिन नहीं होता


असल में ध्यान तक पहुँचने की सीढ़ी जो मह्रिषी पतंजलि जी ने बतायी है उसे उन्होंने आष्टांग योग में समाहित किया है
ध्यान को सातवें स्थान पर व उसके बाद आठवें व अंतिम पायदान पर है समाधि



यम
नियम
आसन
प्राणायाम
प्रत्याहार
धारणा
ध्यान
समाधि


यहाँ ध्यान के पहले भी यम(अहिंसा,सत्य,अस्तेय,ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह ) और नियम(शौच,संतोष,तप,स्वाध्याय व ईश्वरप्रणिधान ) आये हैं

जो इसी बात को इंगित करते हैं की ध्यान से पहले हमे अपने अंतःकरण को जितना ज्यादा हो साफ़ कर लेना चाहिए हमे ये बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए की भले हम हज़ारों लोगों को जानते हों लेकिन हमारे साथ सिर्फ हम ही रहते हैं हमारे काम भी सिर्फ हम ही आ सकते हैं इसलिए अपने आप से अपने मित्र बनें अपने आप से अपने शत्रु  नहीं



श्रीमद भगवद गीता में भगवान् ने छठे अध्याय में यही बात कही है :

उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌ ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
भावार्थ :  अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है ॥5॥
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्‌ ॥
भावार्थ :  जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिए वह आप ही शत्रु के सदृश शत्रुता में बर्तता है॥6॥


बहरहाल अष्टांग योग में आये इतने चरणों को देखके ध्यान दुष्कर नहीं लगना चाहिए क्यूंकि जैसे वो क्रिया में लिखे हैं अथार्त ध्यान तक पहुँचने के पहले कई चरण हैं वैसे ही वो समझने में भी हैं

यानी इन्हें हमे समझना मात्र ही है क्यूंकि वैसे भी ये आस्तित्व द्वारा स्वयं ही हमसे हो जाते हैं जब शुद्ध भावना से हम ध्यान के लिए जाते हैं
ध्यान को जितना कठिन हम समझेंगे ये उतना कठिन लगेगा और जितना इसे स्वरुप की स्वाभाविक स्थिति मानेंगे ये उतना ही आसान लगेगा