Sunday 15 July 2012

चिंतन 2



अभी नेट पर आया था ब्लॉग पर लिखने जा ही रहा था की याद आया की गुवाहाटी में बीस लोगों द्वारा एक घिनौना कुकृत्य किया गया है
मैंने इस पर कभी एक कविता लिखी थी
 

 //poetry-kavita.blogspot.in/2011/11/blog-post_13.html
आज चिंतन के प्रसंग को बढाने से पहले इस काण्ड पर कुछ चिंतन प्रकट करना चाहता हूँ
। तीन बात कहूँगा

पहली बात

सबसे पहले मैं ऐसे लोगों की भर्त्सना करना चाहूँगा जो सिर्फ ध्यान पाने के लिए ऐसे मुद्दों पर हाथ साफ़ करते हैं उनका इसके पीछे के दर्द से कुछ लेना देना नहीं होता

उन्हें सिर्फ इस बहाने अपनी वाह वाही और की वो बहुत संवेदनशील हैं ये दिखाना होता है
। ऐसे लोग चाहे मीडिया से जुड़े हों,ब्लॉग से जुड़े,किसी अच्छे पद पर हों या प्रतिष्ठित हों  हों लेकिन यदि वो मात्र किसी स्वार्थ हेतु अथवा दिखावे के लिए ऐसे मुद्दों को उछालते हैं तो वो भी उन्ही बीस आदमियों की तरह हैं जो इस कुकृत्य में शामिल थे

दूसरी बात
ऐसा क्यूँ होता की जब एक्सिडेंट हो जाता है तभी उस चौराहे पर सिपाही खड़ा किया जाता है यानि हम पहले से ही सावधान क्यूँ नहीं होते । ऐसा क्यूँ होता है जब आग लग जाती है नुक्सान  उठा लिया जाता है तभी आग बुझाने वाला यंत्र रखा जाता है ?
आखिर ऐसी जगहों पर सिपाही या सेकुरिटी वाले तैनात क्यूँ नहीं थे?

तीसरी बात

ये सबसे अहम् है बहुत गौर से पढने और समझने वाली बात है और वो ये है की हममे से अधिकतर लोग आज भी और अभी भी उन्ही 20 जानवरों जैसा जीवन जीते हैं जो उस लड़की के साथ हैवान हुए
। हमारे अन्दर कैसा जानवर छुपा है या तो हम जानते नहीं या तो हम मानते नहीं । लेकिन इससे सच्चाई नहीं बदल जाती और डंके की चोट पर मैं कहता हूँ की हममे से लगभग 75% चाहे वो मेल हों या फीमेल ऐसी ही जानवरों जैसी प्रवृत्ति रखते हैं और यही नहीं रोज़ हम ऐसे ही कृत्य करते हैं कर रहे हैं । जी हाँ, हम लोग रोज़ ऐसे ही बलात्कार कर  रहे हैं अंतर सिर्फ इतना है की गुवाहाटी में जो हुआ वो शारीरिक हिंसा थी (हालाँकि वो भी मानसिक हिंसा से उपजी ) और हम मानसिक हिंसा करते हैं ऐसी ही घृणित हम माने या न माने लेकिन इस सत्य को हम झुठला  नहीं सकते । वो जो भीड़ देख रही थी इस कुकृत्य को वो कोई और नहीं थी हम ही लोग थे अंतर सिर्फ चेहरे का ही तो था

पेश है कुछ सवाल यदि ज़रा भी हिम्मत हो तो इन प्रश्नों की सच्चाई को तौलियेगा

1 . क्या हम मानसिक हिंसा नहीं करते ?
2 . क्या हम स्वयं मानसिक रूप से दूसरों की इज्ज़त तार तार करने में नहीं लगे रहते ?
3 . जैसे उस लड़की को २० लोगों ने घेर कर अपने जानवर होने का सबूत दे दिया क्या हम भी दूसरों को नीचा दिखाने के लिए अपने दोस्तों किए साथ ऐसी घटिया साजिशें नहीं रचते और क्या इस तरह से किसी की इज्ज़त तार तार नहीं करते ?
4 . क्या हमारे समाज में जब कोई सही मुद्दे पर आवाज़ उठाता है तो क्या हम चुप नहीं लगा जाते तो फिर क्या हम उस घृणित भीड़ से अलग हैं जो किसी अबला की इज्ज़त तार तार होते देखती रही ?
5. क्या हम ऐसे लोगों को शरीफ लोगों से ज्यादा नहीं अपनाते जो आपराधिक वृत्ति के होते हैं और इस तरह से क्या स्वयं हम हिंसक सोच के नहीं हैं ?
6. क्या हम मात्र अपने थोड़े से स्वार्थ के लिए उन नेताओं जैसे नहीं हो जाते जिन्होंने ऐसे न जाने कितने केस दबा दिए ?
7. क्या हम अपने झूठे अहम् को बढाने के लिए किसी अनजान के वजूद के साथ नहीं खेल जाते यानि जैसा उन बीस लोगों ने किया क्या उसी तरह हम अपने थोड़े से स्वार्थ को (धन,यश,मान ) पाने के लिए ग़लत काम के लिए हामी नहीं भरते ?
8. क्या हम अपनी ग़लतियों के लिए क्षमा मांगते हैं ? क्या हम ऐसी मानसिक हिंसाएँ करना बंद करते हैं ?
9. क्या हम वस्तुवादिता के गुलाम नहीं हैं ? क्या हम वासना के गुलाम नहीं हैं ?
 क्या हम दूसरों को उनकी धन,संपत्ति और शारीरिक दृष्टि से नहीं तौलते ?
10. क्या हम कभी ये निश्चय करते हैं की हम अपनी मानसिक हिंसा घटाएंगे ?
11. क्या हम अपने निश्चय पर अटल रह पाते हैं ?
१२. हममे से कितने लोग अपना स्वरुप शरीर मानते हैं ?
१३. हममे से कितने लोग अपना स्वरुप आत्मा जानते हैं ?
१४. क्या समाज में सारी ग़लत बात सिर्फ स्वयं को शरीर मानने से नहीं होतीं ?
१५. क्या स्वयं को आत्मा समझने के बाद हम स्वयं ही आसुरी गुणों के अपेक्षा दैवीय गुणों की तरफ नहीं बढ़ते ?
१६. हममे से कितने प्रतिशत लोग सांसारिक दिखावे की ज़िन्दगी जीते हैं और कितने ऐसे हैं जो परमात्मा से कुछ नहीं छुपाते अथार्त भगवान् को साक्षी मानके जीते हैं ?

अब पुनः चिंतन की पिछली कड़ी पर आता हूँ और वहीँ से शुरू करता हूँ जो मैं कहना चाहता था


हमने चिंतन से सम्बंधित कुछ मूलभूत प्रश्नों पर गौर किया था
। मैंने एक बात कही थी की हम एक बार में एक ही बात सोच सकते हैं मैं फिर अनुरोध करूँगा की और गौर से समझें । यानि की हमे भले लगे की हमारे मन में कई विचार चल रहे हैं लेकिन सच्चाई ये होती है की हम एक ही विचार को सोच रहे होते हैं
मतलब हम देखते हैं की आपराधिक लोग जल्दी क्यूँ नहीं सुधर पाते उसका कारण सिर्फ इतना है की वो अपने चित्त की दूसरी दिशा की तरफ जा नहीं सकते या ये कहें की जा नहीं पाते
। उसी तरह से उनके ऊपर जो सामान्य सोच वाले लोग हैं यानि की जो आम जनता है वो पढ़ाई-लिखाई,नौकरी,बच्चे और उनकी शादी इसी को जीवन की इति समझे है और वो भी सोच के और आयामों के बारें में सोच नहीं पाती । आम जनता येही सोचती की उसका स्वरुप शरीर है और मरने से पहले उसे इस शरीर को विभिन्न तरह से सुख पहुचाना है । मगर मैं ये कहना चाहूँगा की अध्यात्म की तरफ सोचने का हौसला हम क्यूँ नहीं जुटा पाते ?
आखिर हमे ऐसा क्यूँ लगता है की परमात्मा कोई पाने की चीज़ है ? हम क्यूँ नहीं मान पाते की परमेश्वर हमे मिला ही हुआ है,हमे बस उसे अनुभूत करना है


एक कहानी सुनिए

दो दोस्त थे दोनों अलग अलग सामुद्रिक यात्रा पर निकले
। पहले दोस्त जब निकला तो सफ़र के दौरान एक तूफ़ान में पानी का जहाज़ फंस गया और फिर पानी में उभरी चट्टान से टकराके छिन्न भिन्न हो गया । वो व्यक्ति किसी तरह बच गया एक टापू पर आ गया वहां उसने देखा की कोई भी नहीं है । उसने वापस लौटने की आशा छोड़ दी और वहीँ पर एक झोपडी बना कर रहने लगा । इस तरह से उसने अपना जीवन वहीँ गुज़ार दिया

जो दूसरा दोस्त था वो भी दूसरी सामुद्रिक यात्रा पर निकला था
। उसके साथ भी वही हुआ उसका जहाज़ टूट गया सभी यात्री बिखर गए और वो स्वयं किसी लकड़ी के बड़े तख्ते को पकडे हुए एक निर्जन वीरान द्वीप से आ लगा । परन्तु उसने सोचा की यदि वो यहाँ आ पड़ा है तो निकल भी सकता है । उसने तुरंत ही किसी तरह से एक झंडा बनाया और एक पेड़ के ऊपर जाके बाँध दिया । नित्य वो रोज़ जाके उस झंडे को हिलाता था और कोशिश करता था की यदि कोई जहाज़ निकले आस पास से तो उसके झंडे को देख ले और ऐसा ही हुआ कुछ हफ़्तों के बाद एक जहाज़ उस द्वीप के पास से गुज़रा और उसका झंडा देखके रुक गया । और इस तरह से वो दूसरा दोस्त वापस अपने गाँव लौट गया

सार क्या है कहानी का की परमात्मा भी हमारे इतने ही पास है जितना वो पानी का जहाज़ उस निर्जन,वीरान द्वीप के पास
। हम मगर उसे आवाज़ नहीं लगाते यहाँ तो कुछ हफ़्तों के बाद वो पानी का जहाज़ गुज़रा परन्तु वास्तव में तो परमात्मा सदा ही हमारे पास से गुज़र रहा है । परन्तु क्या हम उसे आवाज़ लगाते हैं ? हम तो उसकी दिशा में सोच भी नहीं पाते हैं । हम उस पहले व्यक्ति की तरह ज़िन्दगी बिता देते हैं जो ये मान बैठता है की इस टापू से वो निकल नहीं पायेगा
इसलिए ये आवश्यक है की हम क्या सोच रहे हैं इसका भान हमे अवश्य रहे
। अपने दिन का,अपने जीवन का सारा समय तो पशु भी अपने कार्य में लगा देता है परन्तु इंसान और उसमे बहुत फर्क है । बुनियादी बात यही है की सांसारिक सोच के साथ साथ हमें पारमार्थिक सोच के प्रति भी सचेत रहना चाहिए,जागरूक रहना चाहिए   भूले से भी हमे अपने आध्यात्मिक सिद्धांत अपने जीवन के सिद्धांतों से अलग नहीं समझना चाहिए क्यूंकि इस तरह से हम अपने समय और उसकी सदुपयोगिता को व्यर्थ करते हैं । आप माने या न माने लेकिन दिखावे की वजह को प्राथमिकता देने की वजह से हम बिना दिखावे की जो असली चीज़ रहती है उससे चूक जाते हैं

एक चुटकुला सुनिए

एक आदमी था गोलूमल उसके घर उसका मित्र भोलूमल आया

भोलूमल ने देखा की गोलूमल हाथ बंद कर कर के उसकी तरफ खाली फेंक रहा है


भोलूमल : यार! ये क्या कर रहा है तू ?

गोलूमल : अरे यार ! बिजली नहीं आ रही न !!

भोलूमल : वो तो ठीक है लेकिन तू ये क्या कर रहा है !

गोलूमल : अरे ! तुझे गर्मी न लगे इसलिए तुझ पर हवा फेंक रहा हूँ 


भोलूमल : तो क्या तेरे यहाँ हाथ वाला पंखा नहीं है ?

 
गोलूमल : तो क्या तुझे मेरी हाथ से फेंकी हवा नहीं लग रही है ?

भोलूमल : नहीं नहीं भाई ! ऐसी बात नहीं है,ठीक है, अच्छी हवा लग रही है !!

हमे ये तय करना होगा की हम इनमे से कौन हैं ? कहीं परिस्थितियों के अनुसार हम दोनों ही तो समय समय पर नहीं हो जाते
। लेकिन हर सूरत में ये बात दीगर है की हम बेसिरपैर की बातों को भी प्राथमिकता देते हैं दिखावे के लिए इसलिए सांसारिक हवा जो हाथ वाली है खा लेते हैं लेकिन आध्यात्मिक हवा जिसके लिए हमे थोडा आगे बढ़के हाथ का पंखा ही तो उठाना था उसके लिए प्रयास नहीं करते । क्यूँ ? क्यूंकि वो हमारे मित्र को अच्छा नहीं लगेगा । क्यूंकि सत्संग को तो अधिकतर हम बुढापे का विषय मानते हैं इसलिए उसपर चर्चा स्वेच्छा से कभी करना ही नहीं चाहते
चिंतन सकारात्मक सही अर्थों में तभी मानना चाहिए जब थोडा ही सही लेकिन उसमे परमात्म तत्व का ज़िक्र भी आ जाए,थोडा ही सही उसमे वैराग्य की झलक भी हो
। 

वहीँ एक भक्त की आवाज़ क्या होगी जिसने इतना भी मान लिया की प्रभु उसके साथ है


ज़िन्दगी के उजालें क्या ?ज़िन्दगी के अन्धेरें क्या
हमे कुछ भी मालूम नहीं जबसे तुझे सोचा है

अब तक मिट रहा था मैं ज़माने के लिए मेरे मालिक
अब मिट रहा हूँ मैं खुदको तुझसे मिलाने के लिए


पहले शेर में भगवान् के प्रति अनन्यभाव है की प्रभु भक्तों को सब चीज़ स्वयं ही उपलब्ध करा देते हैं,भक्तों को तो सिर्फ उनकी ही चाहना रखनी चाहिए


दूसरा शेर गहरा है वो कहता है की 'मैंपन'
  ही रुकावट है परमात्मप्राप्ति के लिए और इस मैंपन को मिटाके ही साधक साध्य से अथार्त परमात्मा से मिलता है