Sunday 22 July 2012

अध्यात्म

अभी कुछ दिन हुए एक कविता या यूँ कहिये एक ग़ज़ल लिखी और फिर सोचा उसे यहाँ भी शेयर करूँ । कभी कभी कुछ चीज़ें ऐसी हो जाती हैं ऐसी लिख जाती हैं की उसे जब तक हम ठीक से न पढ़ें ठीक से न जाने,उसे अमल में नहीं ला सकते
और ऐसी चीज़ें जो संसार की नहीं संसार वाले के लिए होती हैं ज़रूरी हैं की समझी जाएँ
। भगवान् से सम्बंधित हम कुछ भी करें,कहें वो मैं मानता हूँ उसकी उपासना ही है,बंदगी ही है
एक शेर लिख रहा हूँ
प्रभु की बंदगी से फुर्सत न मिले यही चाहत है
हम जानते हैं बाग़-ए-दुनिया में काग़ज़ के फूल खिलते हैं

ये जो संसार हम देख रहे हैं ये जिस संसार में हम रहते हैं क्या हम कभी ये महसूस करते हैं की हम हमेशा संसार में संसार की ही बात करते रहते हैं

ओब्विअस सी बात है की संसार में हम हैं तो संसार की ही बात करेंगे लेकिन फिर आप मेरा मतलब नहीं समझ पाए या ये कहूँ तो ज्यादा उचित होगा की मैं नहीं समझा पाया
। हमे संसार के साथ संसार वाले के लिए भी थोडा समय निकालना चाहिए यानी उस परमात्मा,परमेश्वर,अल्लाह,गाड,ओंकार के लिए वैसी ही शिद्दत रखनी चाहिए जैसी हम इस विनाशशील दुनिया के लिए निकालते हैं
प्रभु की कृपा ही माननी चाहिए की जो हम किसी भी तरह उससे जुड़ते हैं,उसे याद करते हैं,उससे बात करते हैं
। ये बहुत ध्यान में रखने वाली बात है की हमे मालूम नहीं चलता लेकिन अधिकतर लोग अधिकतर अपना बेस्ट इस दुनिया के लिए रखते हैं,इस दुनिया से धन,मान,पद,प्रतिष्ठा आदि पाने के लिए परन्तु सच्चाई ये है की ये कुछ भी हमारे काम नहीं आने वाले,क्यूंकि संसार से एक न एक दिन साथ सभी का छूट जाने वाला है परन्तु भगवान् से कभी नहीं छूटेगा । एक परमेश्वर ही है जो जीव के साथ जन्म से पहले भी था और मृत्यु के बाद भी रहेगा और ये अवश्यम्भावी है की जीव उसे जीवन में भी अपने साथ माने क्यूंकि जीवन में भी वो हमारे साथ ही है  । लेकिन हम सांसारिक राग द्वेष में ऐसा फंसते हैं की इसे ही सबकुछ मान लेते हैं क्यूंकि हम शरीर को ही स्वयं का स्वरुप माने बैठे हैं और दूसरे शरीर जो हमारी तरह ही मांस,हड्डी,मज्जा,मेद, मल,मूत्र से भरे हैं और नष्ट हो जाने वाले हैं उनमे आसक्त होके अपने अमूल्य जीवन को उनसे मिलने वाली प्रशंसा,अप्रशंसा में समाप्त कर देते हैं । इन्फेक्ट अधिकतर लोग तो अपने जीवन को इसी का उद्देश्य मान लेते हैं । धन्य हैं खुसरो,तुलसी,सूर,रविदास,कबीर,तुकाराम,मीरा,नामदेव जैसे संत कवि जिन्होंने अँधेरे में जाते समाज को उजाले का पथ बताया,उजाले का पथ दिखाया । ये कविता भी प्रभु को सुमिरते हुए ही लिखी गयी है । सूफी कवियों या भक्त कवियों के साथ समस्या ये होती है की वो संसार से बात करते हुए भी परमात्मा से ही बात करते हैं और संसार उन्हें समझ नहीं पाता,उनकी बातों को कई बार ग़लत ढंग से ले लेता है लेकिन इससे उन्हें कुछ भी फर्क नहीं पड़ता क्यूंकि वो तो इसमें भी परमात्मा ही देखते हैं । 
प्रभु की कृपा पर मैं नाचीज़ इतना ही कहना चाहूँगा,किसी शायर ने क्या बात कही है :

जब तक बिका न था कोई पूछता न था

तुने मुझे खरीदकर अनमोल कर दिया

ग़ज़ल में शायर ने प्रभु प्रेम में डूबते हुए कहा है

जिंदा है जो ज़िन्दगी में वोही सच्चा है 
मर मर कर जीना कहीं जीना होता है 


हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई और हर मज़हब बराबर
हर धर्म है लहर और आदमी सफीना है


नहीं मानता मैं डर से होने वाली इबादत को
जब से यारी है हमारा खुदा से याराना है 


वो और होंगे जो फ़क़त किताबों में उसे ढूंढे
हमने जब भी पुकारा परवरदिगार को आना है 


प्रभु की दुनिया में अहम् नहीं,नहीं हसरतें चलतीं
उसका दरबार तो खुद को मिटाके ही मिलता है

पहले शेर में ही शायर ने अपने अंदाज़ स्पष्ट कर दिए अथार्त ग़ज़ल के मकसद को पूरी तरह खोल के रख दिया की ज़िन्दगी क्या है और ज़िन्दगी वोही है जिसमे जिंदादिली है और जिंदादिली बहुत बड़ा शब्द है,गहरा शब्द है मेरे हिसाब से

जिंदादिली का अर्थ है की हम अपने साथ साथ अपने आस-पास के वातावरण को कितना जिंदादिल रखते हैं
और जो जिंदादिल है वोही सच्चा है बाकी शायर के मुताबिक़ जो जिंदादिल नहीं हैं वो जीवन के असली सलीके से महरूम रह गए अथार्त उन्हें अभी जीवन को समझना होगा,जीना समझना होगा । 

हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई और हर मज़हब बराबर
हर धर्म है लहर और आदमी सफीना है

इस दूसरे शेर में शायर ने साफ़ साफ़ कहना चाहा है की साधन को साधना समझने की भूल न समझ लेना

इस मुग़ालते में अच्छे अच्छे अपनी साधना पथ से च्युत हो जाते हैं

मतलब क्या है कहने का ? मतलब ये है की मंदिर में घंटा बजाने से,नमाज़ पढने से,गिरजाघर जाने से,शबद गुनगुनाने से ही साधना पूर्ण नहीं हो जाती
। उसे समझना होगा यानी जैसा हम पवित्र जगहों पर करते हैं अथार्त स्वयं को पवित्र रखते हैं वैसा ही हमे अपने दिल के मंदिर,अपने ज़हन के मस्जिद,अपने मन के चर्च,और अपने ह्रदय के गुरुद्वारे को भी पवित्र रखना होगा और इस जगत को भी प्रभुमय सोचना होगा,मानना होगा और सबके साथ सद्भाव रखना होगा
इसके साथ साथ शायर ने इस बात की ओर इशारा किया है की हमे अपने धर्म के साथ साथ दूसरे धर्मों की भी इज्ज़त करनी चाहिए वरना इसका मतलब यही है की हम अपने धर्म की भी दिल से इज्ज़त नहीं करते


इसे समझिये की जैसे हम अपने दोस्त के घर से निकलें और उसके भाई को उल्टा सीधा कहें तो इसका मतलब यही हुआ की हम अपने दोस्त की भी इज्ज़त नहीं करते
। यानी हम मंदिर से निकले और मस्जिद से निकलने वाले को हेय दृष्टी से देखने लगे या हम मस्जिद से नमाज़ पढके निकल रहे हैं और किसी मंदिर से निकलने वाले को देखते ही उससे मुंह मोड़ लेते हैं तो हमारी साधना का क्या अर्थ हुआ ? यानी ऐसा ही अगर गिरजाघर से निकलने वाला और गुरुद्वारे से निकलने वाला करे तो उनके वहां जाना न जाना बराबर ही हुआ
हम अपने प्रभु के एक नाम की उपासना करके निकले और दूसरे नाम की निंदा करने लगे तो हम जहाँ थे वहीँ रहे यानी हमारे धार्मिक होने और न होने में कोई फर्क नहीं है
। यही शायर कह रहा है की सभी बराबर हैं और सभी धर्म बराबर हैं क्यूंकि धर्म तो लहर है मात्र जो नाव को समुन्दर से मिलाती है और आदमी ही तो कश्ती है


तीसरे शेर
नहीं मानता मैं डर से होने वाली इबादत को
जब से यारी है हमारा खुदा से याराना है 

में शायर ने साफगोई से कहा है की भगवान् से डरके ही इबादत नहीं की जाती यहाँ उसका अर्थ ऐसे डर से है जो भगवान् से दूरी बढाता है,भगवान् को बहुत बड़ा बताता है इतना की भगवान् के करीब जाने को रोकता है

शायर का कहना है की प्रभु ने ये दुनिया इंसानों को उससे दूर रहने के लिए नहीं बनायी बल्कि उससे प्रेम करने के लिए बनायी है क्यूंकि तभी तो उसने दोस्ती भी बनायी है
। यहाँ भक्त ने भगवान् से सख्य भक्ति में रूचि दिखाई है

वो और होंगे जो फ़क़त किताबों में उसे ढूंढे
हमने जब भी पुकारा परवरदिगार को आना है 

इस शेर में शायर ने कहा है की भगवान्,अल्लाह,गोंड,ओंकार को सिर्फ शास्त्रों में,गीता,रामायण,कुरआन,बाईबल,गुरुवाणी में ढूँढने वाले उसे नहीं पा सकते

इसे ध्यान से समझें यदि कोई गूंगा है और वो आपको कुछ बताना चाहे तो क्या आप समझ लेंगे

यदि किसी गूंगे ने खूब अच्छी मिठाई खायी है और वो उसका रस समझाना चाहे तो एक तो वो कैसे समझा सकेगा और दूसरा आप कैसे समझ सकेंगे

परमात्मा,परमेश्वर शब्दातीत है यानी शब्दों से परे जो मानसिक जगत है वहां ध्यान द्वारा पहुँचने पर ईश्वर का,ईश्वर तत्व का अनुभव होता है और जैसे ही हम उसे व्यक्त करने लगते हैं वैसे ही उसे शब्दों के दायरे में ले आते हैं और वैसे ही वो अवर्णनीय हो जाता है
। जो शब्दों से परे है,ऊपर है उसे शब्दों द्वारा व्यक्त कैसे कर सकते हैं इसे ही कबीर ने गूंगे का गुड कहा है
हमने जब भी पुकारा परवरदिगार को आना है ये कहने का अभिप्राय कवि का यही है की ध्यान में प्रभु के डूबे नहीं की प्रभु का आभास होने लगता है


प्रभु की दुनिया में अहम् नहीं,नहीं हसरतें चलतीं
उसका दरबार तो खुद को मिटाके ही मिलता है

इस शेर पर बस इतना ही कहना चाहूँगा जो कबीर दास जी ने कहा था

जब मैं था तब हरी नाही अब हरी है मैं नाय
प्रेम गली अति सांकरी जेमे दो न समय

भगवान् बिना मांगे ही भक्तों को सबकुछ दे देते हैं इसलिए उनसे कुछ मांगने का मतलब उनकी कृपा में दोष देखना है
और परमेश्वर को आज तक जिसने भी पाया है स्वयं को मिटाके ही,समर्पण से ही,स्वयं के अहम् को उसे सौंप के ही


आज मैं कुछ सूफी कलाम पेश करना चाहूँगा एक तो हज़रत अमीर खुसरो के द्वारा लिखी गयी है और दूसरे के रचनाकार है
भक्त सूरदास जी । बेहद गहरे अर्थ लिए हुए कलाम  हैं जिन्हें संसार से हटके सोचने पर ही समझा जा सकता है,आनंद लिया जा सकता है । आनंद लें !


छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके
प्रेम भटी का मदवा पिलाइके
मतवारी कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
गोरी गोरी बईयाँ, हरी हरी चूड़ियाँ
बईयाँ पकड़ धर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
बल बल जाऊं मैं तोरे रंग रजवा
अपनी सी रंग दीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
खुसरो निजाम के बल बल जाए
मोहे सुहागन कीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके 

English Translation


You've taken away my looks, my identity, by just a glance.
By making me drink the wine of love-potion,
You've intoxicated me by just a glance;
My fair, delicate wrists with green bangles in them,
Have been held tightly by you with just a glance.
I give my life to you, Oh my cloth-dyer,
You've dyed me in yourself, by just a glance.
I give my whole life to you Oh, Nijam,
You've made me your bride, by just a glance.









हमारे प्रभु, औगुन चित न धरौ।
समदरसी है नाम तुहारौ, सोई पार करौ॥
इक लोहा पूजा में राखत, इक घर बधिक परौ।
सो दुबिधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरौ॥
इक नदिया इक नार कहावत, मैलौ नीर भरौ।
जब मिलि गए तब एक-वरन ह्वै, सुरसरि नाम परौ॥
तन माया, ज्यौ ब्रह्म कहावत, सूर सु मिलि बिगरौ।
कै इनकौ निरधार कीजियै कै प्रन जात टरौ॥

भक्त और भगवान् के बीच कितना मधुर संबंध दर्शाया है इस पद के माध्यम से सूरदास जी ने। यह सर्वविदित है कि पूर्णता केवल ईश्वर को प्राप्त है। अपूर्णता के कारण मनुष्य से त्रुटि स्वाभाविक है। इसलिये सूरदास ने भगवान् से अवगुण समाप्त करने नहीं बल्कि इसे हृदय में न धरने की प्रार्थना की है। सूरदासजी कहते हैं - मेरे स्वामी! मेरे दुर्गुणों पर ध्यान मत दीजिये! आपका नाम समदर्शी है, उस नाम के कारण ही मेरा उद्धार कीजिये। एक लोहा पूजा में रखा जाता है (तलवार की पूजा होती है) और एक लोहा (छुरी) कसाई के घर पड़ा रहता है, किंतु (समदर्शी) पारस इस भेद को नहीं जानता, वह तो दोनों को ही अपना स्पर्श होने पर सच्चा सोना बना देता है। एक नदी कहलाती है और एक नाला, जिसमें गंदा पानी भरा है, किंतु जब दोनों गङ्गाजी में मिल जाते हैं, तब उनका एक-सा रूप होकर गङ्गा नाम पड़ जाता है। इसी प्रकार सूरदासजी कहते हैं- यह शरीर माया (माया का कार्य) और जीव ब्रह्म (ब्रह्म का अंश) कहा जाता है, किंतु माया के साथ तादात्म्य हो जाने के कारण वह (ब्रह्मरूप जीव) बिगड़ गया (अपने स्वरूप से च्युत हो गया।) अब या तो आप इनको पृथक् कर दीजिये (जीव की अहंता-ममता मिटाकर उसे मुक्त कर दीजिये), नहीं तो आपकी (पतितों का उद्धार करने की) प्रतिज्ञा टली (मिटी) जाती है।