Tuesday 18 October 2011

विवेक

ईश्वर को जानने का सबसे अच्छा मार्ग क्या है ? ये प्रश्न आते ही कई तरह के विचार भी आते हैं परन्तु निर्विवादित रूप से सबसे उत्तम मार्ग येही होता है की जिसने जाना उसी से पूछा जाए या मार्गदर्शन लिया जाये । सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक हमारे अन्दर है हमारा विवेक है। विवेक ही व्यक्ति का सबसे प्रधान गुरु होता है जो अज्ञान से ज्ञान की तरफ, अन्धकार से प्रकाश की तरफ ले जाता है ईश्वर को जानना आसान है परन्तु ईश्वर को मानना अथार्त प्रति पल वो है ये हमारे विवेक की प्रधानता पर निर्भर करता है।

ऐसा प्रश्न मस्तिष्क में विवेक की प्रधानता को दर्शाता है विवेकी सही मायने में ज़िन्दगी के पहलुओं को समझना चाहता है सकारात्मक सोच के सच और अपरिछिन्नता के साथ बढ़ना चाहता है। हर प्राणी में विवेक होता है और ये विवेक ही है जिसका सही या ग़लत उपयोग जीव की दिशा को प्रभावित कर सकता है ।विवेक की सुनना उसका सही उपयोग और न सुनना उसका ग़लत उपयोग । हर व्यक्ति में तीन ही तत्त्व या यूँ कहें की गुण होते हैं-  सत्व,रज और तम। जितना हममे सत्व गुण बढेगा हमारा विवेक बढेगा और संसार व जीवन को वास्तविकता में अर्थपूर्ण ढंग से देखने को प्रेरित करेगा । सत्व गुण हमे स्वाभाविक रूप से सत्संग की ओर प्रेरित करता है । व्यक्ति में सत्व गुण की जितनी प्रधानता रहती है व्यक्ति साधना पथ पर चलने को उध्हत रहता है । सात्विक प्रवत्ति भोगों में आसक्ति नहीं रखने के लिए प्रेरित करती है।

रज तत्त्व तम और सत्व का मिला जुला गुण है जिसके अंतर्गत हममे कभी कभी विवेक जाग्रत होता है और फिर लुप्त हो जाता है । सत्संग कहीं होने पर रज गुण को अच्छा लगता है परन्तु यदा कदा ही वो स्वयं को सत्संग के लिए प्रेरित कर पाता है । रज गुण बहुत अधिक तत्परतापूर्वक साधना पथ पर नहीं चल पाता। रज गुण के बढ़ने पर वो सत्व गुण की तरफ तो बढ़ता है लेकिन घटने पर वो विवेक को महत्व देना कम कर देता है । राजसिक प्रवत्ति भोगों में आसक्ति तो रखती है परन्तु विवेक को भी महत्व देती है ।

तम गुण रज गुण के बाद आता है और व्यक्ति सजग तरह से चलने पर ही रज गुण की तरफ प्रेरित हो पता है और फिर सत्व गुण की तरफ।
परन्तु ये बहुत मुश्किल से होता है क्यूंकि तम गुण के ज्यादा रहने पर हम अपने विवेक की ज्यादा नहीं सुन पाते और रज गुण की ओर धीरे धीरे बढ़ पाते हैं फिर सत्व गुण के लिए तो और सजगता की आवशयकता होती है। तामसिक प्रवत्ति में भोगों में आसक्ति की भावना अधिक रहती है और विवेक की प्रधानता अत्यंत कम।
प्रत्येक प्राणी में ये तीन गुण विद्यमान रहते हैं परन्तु इनका अनुपात सबमे अलग अलग होता है । जीवन में हम अपने और अपने मूल्यों के प्रति कितने संवेदनशील हैं इसका आकलन बहुधा हम इन गुणों के अनुपात से ही करते हैं। ये हमारे जीवन पथ के सही मार्गदर्शक होते हैं जो की आसानी से हमारे विवेक की प्रधानता द्वारा परिलक्षित होते हैं।

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