Wednesday, 12 October, 2011

Satsang vaani 11


पूर्ण त्याग तभी होता है जब त्याग का किंचित भी अभिमान न आये । अभिमान तभी आता है, जब अंतःकरण में त्याज्य वस्तु का महत्व अंकित हो अतः वस्तु के त्याग की अपेक्षा वस्तु के महत्व का त्याग श्रेष्ठ है ।

काम-क्रोध,अहंता-मोह आदि को हम पकड़ना जानते हैं तो उनको छोड़ना भी हम जानते हैं।परन्तु हम उनको छोड़ना चाहते नहीं , इसीलिए उनके त्याग में असमर्थता प्रतीत होती है ।

शरीर कभी भी हमारे काम नहीं आता प्रत्युत शरीर में मैं मेरेपन का त्याग ही हमारे काम आता है ।

शरीर संसार अपने आप छूट रहे हैं पर इसमें कल्याण नहीं होगा। छूटने वाली चीज़ स्वयं छोड़ दें, उससे मैं मेरा पण हटा लें तब कल्याण होगा ।

वास्तविक त्याग वोही है जिसमे त्याग वृत्ति का भी त्याग हो जाये ।


शरीर,इन्द्रियां,मन,बुद्धि से अपना सम्बन्ध न रखना ही सच्चा एकांत है ।

एकांत की इच्छा रखने वाला परिस्थति के अधीन होता है । जो परिस्थति के अधीन होता है वह भोगी होता है योगी नहीं ।

साधक का न तो जनसमुदाय में राग होना चाहिए, न एकांत में कल्याण परिस्थति से नहीं होता प्रत्युत रागरहित होने से होता है।


दूसरे के दोष देखने से न हमारा भला होता है, न दूसरों का।

मनुष्य का अंतःकरण जितना दोषी(मलिन ) होता है उतना ही उसको दूसरों में दोष दीखता है। 

यदि आप चाहते हैं की कोई भी मुझे बुरा न समझे तो दूसरे को बुरा समझने का आपको कोई अधिकार नहीं।

किसी को भी बुरा न समझने से भलाई भीतर से प्रकट होती है ।भीतर से प्रकट हुई भलाई ठोस और व्यापक होती है।


Complete renunciation prevails only when there is absolutely no vanity about it.Pride comes when the importance of given up things is stamped on the inner faculty.Therefore it is better to discard the importance of a thing, rather than abondonment.

Longer,anger,myness and attachment etc., when we know how to acquire these, we would also know how to give these up.But in fact, we do not wish to do so, so we seem helpless.

The body never comes to our help, but it is the giving up of I-ness and My-ness in the body that helps.

The body and the world by themselves are separating from ourselves but that does not lead to our salvation(kalyana), to give up a disjointed thing, and withdraw your I-ness and My-ness from the same, then only one will have salvation.

In reality, renunciation is that in which the vanity of renunciation is also abandoned.


True solitude arises from one's delinking of his body,senses,mind and intellect.

One desirous of solitude is dependent upon any circumstance, it may be solitude or company of men.One who remains subject to such dependence is a seeker of pleasure but not an aspirant(Bhogi not a Yogi) .

An aspirant should have neither attraction for the public,nor for solitude.Circumstances do not bring about salvation rather it follows detachment.

Faulty view

Watching the fault of others, would neither benefit ourselves, nor others.

The more impure, one's inner faculties are, the more he notices the faults of others.

Should one want no body to think of him as bad, then one has no right to think of others, as bad.

By not thinking of others as bad, goodness arises from within, is solid and pervasive.

From the books  - 'Amrit-bindu' and 'The drops of nectar'.


  1. very well written
    each line is worth reading twice

  2. SM thanks, ya I myself have read these quotes many times and so i decided to share as these are golden words of great saints who experienced the same.
    Thanks for reading it.