Sunday, 11 December, 2011

भगवान के नाम राम का अर्थ व महिमा

बालकाण्ड 
बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥1॥

मैं श्री रघुनाथजी के नाम 'राम' की वंदना करता हूँ, जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात्‌ 'र' 'आ' और 'म' रूप से बीज है। वह 'राम' नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है। वह वेदों का प्राण है, निर्गुण, उपमारहित और गुणों का भंडार है॥1॥


बीज अक्षर र अ म की व्याख्या  


श्रीरामनाम में जो रेफ,रेफ का अकार,दीर्घाकार,हल मकार और मकार का अकार - ये पञ्च पदार्थ हैं । इनके बिना एक भी मंत्र,ऋचा व सूत्र नहीं बनते हैं वेदों में,व्याकरणों में जितने भी वर्ण,स्वर,शब्द हैं वे सब 'राम'  नाम से ही उत्पन्न होते हैं ।

श्री रामनाम के अतिरिक्त जितने भी नाम परमेश्वर के हैं वे सभी राम नाम की तरह ही सामान रूप से फलदायी हैं परन्तु वे सब गुणक्रियात्मक  हैं अथार्त वे सब गुण दर्शित करने वाले नाम हैं ।


महारामायण में शिव जी कहते हैं की समस्त नामों के वर्ण रामनाममय हैं अथार्त रामशब्दजन्य हैं,अतएव रमु क्रीडा 'राम' शब्द सब नामों का ईश्वर है ।


भगवान् के सभी नाम सच्चिदानंदस्वरुप हैं तथापि 'राम' नाम में ढेरों विशेषता है ये कुछ विशिष्ट है । 

श्रीराम नाम के तीनो पदों र,अ,म में सच्चिदानंद का अभिप्राय स्पष्ट झलकता है अन्य भगवन्नामों में किसी में सत और चित मुख्य है आनंद गौण है किसी में सत और आनंद मुख्य है चित गौण है और किसी में चित आनंद मुख्य है सत  गौण है ।
श्रीराम नाम के तीनो पदों में सत चित आनंद तीनो समाहित हैं अथार्त रकार चित का  अकार सत का और मकार आनंद का वाचक है इस प्रकार 'राम' नाम सच्चिदानन्दमय है ।
श्रीरामनाम को अग्नि सूर्य और चन्द्रमा का हेतु कहकर यह जनाया गया है की इन तीनो के कारण श्रीरामनाम हैं और ये तीनो कार्य हैं ।
राम नाम के तीनो अक्षरों (र,अ,म) क्रमशः इन तीनो के बीज अक्षर हैं ।
'र' अग्निबीज है जैसे अग्नि शुभाशुभ कर्मों को जलाकर समाप्त कर देता है,वस्तु के मॉल तथा दोषों को जलाके शुद्ध कर देता है वैसे ही र के उच्चारण से व्यक्ति के शुभाशुभ कर्म नष्ट होते हैं जिसका फल स्वर्ग नरक का अभाव है साथ ही ये हमारे मन के मल-विषयवासनाओं का नाश कर देता है जिससे स्वस्वरूप(जीव का स्वरुप आत्मा है ) का आभास होने लगता है यहाँ कार्य से कारण में विशेषता दिखायी है ।
अग्नि से जो कार्य नहीं हो सकता वह उसके बीज से हो जाता है ।

'अ'भानुबीज है वेदशास्त्रों का प्रकाशक है जैसे सूर्य अन्धकार को दूर करता है वैसे ही अ से मोह,दंभादी जो अविद्धातम है,उसका नाश होता है व ज्ञान का प्रकाश होता है । 
'म' चंद्रबीज है,अमृत से परिपूर्ण है ।  जैसे चन्द्रमा शरदातप हरता है,शीतलता देता है वैसे ही 'म' से  भक्ति उत्पन्न होती है त्रिताप दूर होते हैं । 
इस तरह से 'र' 'अ' और 'म' क्रमशः ज्ञान वैराग्य व भक्ति के उत्पादक हैं । 

राम नाम से ॐ की उत्पत्ति 
 
राम नाम को वेदप्राण  कहने  का तात्पर्य है जैसे प्राण न रहने से शरीर बेकार हो जाता है, वैसे ही  वेद की कोई ऋचा,सूत्र,मन्त्रादि की स्थति बिना रामनाम के पञ्चपदार्थ (रेफ,रेफ का अकार,दीर्घाकार,हल मकार,मकार का अकार ) के बिना हो ही नहीं सकती क्यूंकि सब स्वर वर्ण आदि श्रीरामनाम से ही उत्पन्न हुए हैं  ।
राम शब्द की बहुत ही ऊँची श्रेष्ठता है वेदों में ईश्वर का नाम ॐ कहा गया है इसी ॐ में समस्त संसार की सृष्टि प्रच्छन्न है अथार्त ॐ शब्द पर यदि गंभीरता से विचार किया जाए तो इसी के विस्तार और खंड आदि से संसार की समस्त वस्तुओं का प्रादुर्भाव हुआ है सभी इसके रूपांतर मात्र हैं यही ॐ राम का या राम ॐ का विपर्यय
मात्र है अन्य कुछ भी नहीं
ॐ  को दूसरे प्रकार ओम से भी लिखते हैं यह रूप(ओम) उक्त ॐ का अक्षरीकृत रूप ही है

 व्याकरण शास्त्र के द्वारा राम से ओम अथार्त उत्पन्न होता है
संधि के अनुसार ओम का 'ओ' अ: के विसर्ग का अक्षरीकृत रूप परिवर्तन मात्र है इस विसर्ग के दो रूप होते हैं एक तो यह किसी अक्षर की संनिद्धि से ो हो  जाता है या फिर र होता है यदि विसर्ग का रूपांतर ो न करके र किया जाए तो अ र म ही ओम का दूसरा रूप हुआ
तब इन अक्षरों के विपर्यय से राम स्वतः बन जायेगा अ र म को यदि र अ म ढंग से रखें और र म व्यंजनों को स्वरांत मानें तो राम बन जाता है
इस तरह से जब राम का रूपांतर मात्र है तो फिर राम विधि हरी हर मय भी है । 

राम और का विपर्यय इस प्रकार है :


राम = र अ म
         अ र म 
         अ : म 
म 
ओम 
ॐ 

इसी तरह ॐ का 

ॐ = ओम 
म 
अ र म 
र अ म 
राम
 
  इस तरह राम = ॐ 

इस तरह जैसे ॐ ब्रह्मा,विष्णु व शिव अथार्त विधि,हरि व हर मय है उसी तरह राम भी विधि हरि हर मय है ।