Friday, 9 December, 2011

भगवन्नाम जप के प्रति दस अपराध अथार्त नामापराध

भगवान् के नाम की महिमा अनंत है । गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है  :

ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि।
रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि॥25॥

नाम (निर्गुण अथार्त निराकार ) ब्रह्म और (सगुण अथार्त साकार) राम दोनों से बड़ा है। यह वरदान देने वालों को भी वर देने वाला है। श्री शिवजी ने अपने हृदय में यह जानकर ही सौ करोड़ राम चरित्र में से इस 'राम' नाम को (साररूप से चुनकर) ग्रहण किया है॥25॥


इस तरह से नाम की महत्ता सबसे ऊपर है व भगवान् के किसी भी नाम को श्रद्धापूर्वक जपने से नाम महाराज की कृपा से साधक परमात्मप्राप्ति करते हैं ।
परन्तु भगवन्नाम जप में दस नामापराध भी हैं जिनके बारें में ध्यान रखना साधकों को अत्यंत आवश्यक बताया गया है । इन अपराधों से रहित होकर ही नाम जप करना चाहिए

कहा गया है :

राम नाम सब कोई कहे दशरथ कहे न कोय
एक बार दशरथ कहे,तो कोटि यज्ञ फल होय

दशरथ को यहाँ दशऋत कहा गया है और दशऋत अथार्त दस अपराधों से रहित । इन दस तरह के अपराधों से रहित होके ही भगवन्नाम जप का वास्तविक महत्व व लाभ है


सन्निन्दासति नामवैभवकथा श्रीशेशयोर्भेदधीरश्रद्धा श्रुतिशास्त्रदैशिकगिरां नाम्न्यर्थवादभ्रमः।
नामास्तीति निषिद्धवृत्तिविहितत्यागौ हि धर्मान्तरैः साम्यं नामजपे शिवस्य च हरेर्नामापराधा दश॥



१. सन्निन्दा


श्रेष्ठ पुरुषों,संत महात्माओं की निंदा से नाम महाराज (जिसका नाम का हम जप करते हैं)
रुष्ट होते हैं और ये नामापराध है । इस वास्ते किसी की भी निंदा नहीं करनी चाहिए क्यूंकि कोई भी संत महात्मा हो सकता है ये हमे मालूम नहीं चल सकता  ।


२.असति नामवैभवकथा

जिसकी नाम में रूचि नहीं है भगवन्नाम नहीं जानता,श्रद्धा नहीं है उसको भगवान् के नाम की महिमा ज़बरदस्ती नहीं सुनानी चाहिए ये नामापराध के अंतर्गत आता है

३. श्रीशेशयोर्भेदधी

भगवान् विष्णु और भगवान् शंकर अथार्त हरि और हर में भेद नहीं समझना चाहिए और न करना चाहिए
ये भगवान् के ही दो रूप हैं ऐसा समझना चाहिए रामचरितमानस में आया है :


सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहि । रामहि ते सपनेहु प्रिय नाहीं ।।
शिवजी के चरणों में जिनकी प्रीति नहीं वे श्रीराम (हरि) को भी प्रिय नहीं होते ।

एक को मानना और एक में अश्रद्धा रखना नामापराध है अतः ये तीसरे नामापराध के अंतर्गत आता है

श्रद्धा श्रुतिशास्त्रदैशिकगिरां

वेद,शास्त्र और संतों के वचनों में अश्रद्धा रखना भी नामापराध है

 ४. जब हम नाम जप करते हैं तो हमारे लिए वेदों के पठन-पाठन की क्या आवश्यकता है? वैदक कर्मों की क्या आवश्यकता है ? इस प्रकार वेदों में अश्रद्धा रखना नामापराध है ।

५. विवेक बुद्धि व स्वाध्याय को प्रधानता न देके शास्त्रों पर संशय करना  की कोई शास्त्र कुछ कहता है और कोई कोई कुछ । इस तरह से उनमे अश्रद्धा रखना और ये सोचके उन्हें न पढना की हम नाम जप तो करते ही हैं नामापराध है ।

६. ये सोचकर की जब हम नाम जप करते हैं तो गुरु की सेवा करने की उनके आज्ञा पालन करने की क्या आवशयकता इस तरह से  गुरु में अश्रद्धा रखना या गुरु की निंदा करना  नामापराध है ।जिस गुरु से ज्ञान मिला उसकी निंदा तो वैसे भी घोर अपराध है । यदि गुरु समर्थ नहीं हों या वे ठीक नहीं निकलें तो भले ही उनको छोड़ दें परन्तु उनकी भी निंदा नहीं करनी चाहिए ।



 
७. नाम्न्यर्थवादभ्रमः 

नाम पर ही संशय करना अथार्त नाम के महात्म्य पर  शंका करना की क्या नाम में इतना सामर्थ्य सच में है ? 
क्या नाम मात्र से कल्याण हो जाएगा इस तरह से नाम में अश्रद्धा रखना नाम में अर्थवाद का भ्रम है और नामापराध है


नामास्तीति निषिद्धवृत्तिविहितत्यागौ 


८.  निषिद्ध कर्मों को करना-नाम जप करने से हमे कोई पाप नहीं लगेगा ऐसा समझके चोरी,झूठ,कपट हिंसा आदि निषिद्ध कर्मों को करना नामापराध है

९. विहित कर्मों का त्याग कर देना - ये सोचके की हम नामजप तो करते ही हैं अतः शास्त्र विहित कर्मों श्राद्ध,तर्पण आदि की क्या आवश्यकता इस तरह से शास्त्र-विधि का त्याग करना नामापराध है ।


१०.धर्मान्तरैः साम्यं

भगवान् के नाम की अन्य धर्मों (कर्मों)  से तुलना करना जैसे गंगा स्नान करो चाहे नाम जप करो या चाहे गोदान कर दो ये नामापराध के अंतर्गत आता है । इस तरह से किसी और धार्मिक कर्म के बराबर नाम की बात नहीं कहनी चाहिए । नाम की महिमा सबसे श्रेष्ठ है सबसे अधिक है उसकी तुलना नहीं करनी चाहिए ।


इस प्रकार इन दस अपराधों से रहित होकर नाम लिया जाए तो सही अर्थों में नाम जप का महत्व है व इससे साधक बड़ी जल्दी आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है ।अगर नाम जप वाले से इन अपराधों से कभी कोई अपराध हो जाए तो उसका दूसरा प्रयाश्चित करने की आवश्यकता नहीं है अपितु उसको तो ज्यादा से ज्यादा नाप जप ही करना चाहिए क्यूंकि नामापराध को दूर करने वाला कोई दूसरा प्रयाश्चित है ही नहीं ।
नाम जप में सच्चे ह्रदय से लगना ही नाम जप की सिद्धि में सबसे बड़ा कारक होता है ।

6 comments:

  1. बहुत सुंदर बातें पता चलीं, आभार

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  2. human जी,
    next post me ... vahaan comment option nahi hai - isliye yahaan likh rahi hoon

    आपका विश्लेषण बहुत सुन्दर है |
    ऊपर "वर्ना" को "वर्ण" कर लीजियेगा | :)

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  3. Thank you very much for posting it and also for your Vyaakhya. God bless!

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