Sunday, 29 April, 2012

विवेक के द्वारा ही अध्यात्म बढ़ता है

यदि हम सोचें की आज से दस साल पहले क्या हमारे साथ समस्या अथवा चिंता नहीं थी ? ज़रूर थी लेकिन क्या वो आज है ? निश्चित ही नहीं है । परन्तु क्या आज समस्या अथवा चिंता दूसरे रूप में नहीं है ? निश्चित ही है
क्या आज से दस साल बाद ये समस्या ये चिंता हमारे पास नहीं रहेगी? निश्चित ही नहीं रहेगी
लेकिन हम अपनी मानसिक ऊर्जा को इसी में लगाए रखते हैं और जीवन तत्त्व  को अथार्त तत्वज्ञान को प्राप्त ही नहीं कर पाते ।फिर तत्वज्ञ बने रहना अथवा दूसरों को तत्व ज्ञान की तरफ उन्मुख करना तो अलग ही बात है

हम इस बात को जानके भी अनजान बने रहते हैं और बस निरंतर इसी तरह से एक बाद एक नयी चिंताओं में उलझे रहते हैं या स्वयं को उलझाए रखते हैं । हम ये जान ही नहीं पाते की हमारा जीवन हमे क्यूँ मिला है ?
हम ये मान ही नहीं पाते की जीवन में नित्य कुछ भी नहीं खासकर हमारे उद्देश्य से सम्बंधित (धन,मान,संपत्ति) । ये सबकुछ हमारे साथ नहीं रह पायेगा या हम इन सारी चीज़ों के साथ नहीं रह पायेंगे यहाँ तक हम इस प्रश्न का अर्थ ही नहीं समझ पाते । व्यक्ति स्वयं को और संसार को एक जैसा ही समझता है और अपनी इसी ग़लत बुद्धिमानी के चलते निरंतर दुखित होता है । हम देखते हैं कई बड़े बुज़ुर्ग हमारे घर के ही या आस पास के हमारे सामने ही चले गए हमने क्या किया चार दिन रोये और फिर बाकी जो जीवन में संसार में हमारा बचा हुआ हमे लगा उसे दोनों हाथ से कस के पकड़ लिया की नहीं अब बाकी कुछ नहीं जाने देंगे लेकिन समय आया और फिर अनित्य(शरीर,संसार) हमारे सामने चला गया लेकिन फिर हम वोही करते हैं
आखिर हम अपना विवेक जगा क्यूँ नहीं पाते ?
यदि हमारा विवेक थोडा सा जाग्रत हो जाता है तो हम उस पर कायम क्यूँ नहीं रह पाते ?
यदि हमे भूले से कोई ज्ञान दे जाता है तो भी क्यूँ हम उस पर भी संदेह करने लगते हैं ?

 
बहुधा हम अपने आप को दिलासा देते हैं की ये सब बहुत मुश्किल है अथवा तो ये तो भगवान् की माया है
हम कोई साधू महात्मा नहीं है जो दिन भर भगवान् का नाम जपते रहें और इस तरह संसार को छोड़े रहें व माया से बचे रहें
नहीं ऐसी बात नहीं है, ऐसी बात कदापि नहीं है क्यूंकि ये सच नहीं है । व्यक्ति अपना सामान्य जीवन जीते हुए भी इश्वर प्राप्ति कर सकता है 
तो फिर सच क्या है ? सच ये है की हममे अज्ञान इतनी अन्दर तक पैठा है जिसका हम अंदाजा तक नहीं लगा सकते
 यदि हम गंभीरता से सोचे तो हममे से अधिकतर ये पायेंगे की वाकई हम एक दिखावे की ज़िन्दगी से ज्यादा नहीं जी रहे जहाँ औरों के मुताबिक उन्हें अच्छा लगे इस मुताबिक हमे जीना पड़ता है ।
यदि गंभीरता से हम सोचें तो पायेंगे की राग-द्वेष में बंधकर कितना ज्यादा हमने अपने आपको अथार्त अपनी ज़िन्दगी को दूसरों के हाथ में सौंप रखा है अथार्त हम अपना जीवन अपने हिसाब से अथवा अपने जीवन के हिसाब से नहीं जीते बल्कि लोगों के साथ राग(प्रेम,दोस्ती,रिश्तेदारी) में अथवा द्वेष(शत्रुता,प्रतिद्वंदिता,साजिश,नफरत,भेदभाव) के हिसाब से जीते हैं
यदि हम सच्चाई से अपने आप से पूछे और ये हमारे लिए ही अत्यंत आवश्यक है क्यूंकि अज्ञान इसी तरह से जाता है और एक बार अज्ञान शुन्यता पर पहुँचता है की ज्ञान स्वयं व्याप्त होने लगता है तो अपने आप से पूछे की क्या हम अपनी आत्मा को भी अनसुना नहीं करते?
क्या हम अपने शास्त्रों,वेदों में पूरी निष्ठा रखते हैं ?
क्या ये सच नहीं है की हम भगवान् में ही पूरी निष्ठां नहीं रखते तभी तो धार्मिक ग्रन्थ नहीं पढ़ते,तभी तो धार्मिक चिंतन नहीं नहीं करते
क्या हमे ये मालूम है की जिस तरह कपड़ा गन्दा हो जाने के बाद साफ़ करने पर ही साफ़ होता है उसी तरह हमारी आत्मा भी सत्संग से ही और निखरती है और जितना ज्यादा हम इससे ज्यादा अपने मन,बुद्धि को अहमियत देंगे अथार्त संसार को अहमियत देंगे उतना ही हमारी आत्मा प्रकाशमय होने से रुकेगी व परिणामतः हम उतना ही अज्ञान में चलते चले जायेंगे
 क्या जितना ज्यादा हम स्वयं को नास्तिक करने में लगाते हैं अथार्त भगवत वचन में,भगवत आस्तित्व में भगवत कृपा में भगवत भजन में संदेह करने में लगाते हैं उतना ही आस्तिक होने में और इन सबमे रस लेने लगाते हैं ?
यदि नहीं लगा पाते तो क्या हम जानते हैं की ऐसा हमारी आत्मा के कम बलवान होने के कारण ही होता है ?
क्या हमे मालूम है हम जितना ज्यादा अपने आत्म स्वरुप को महत्व देंगे उतना ही आत्मा हमारी शक्तिशाली होती है ?
जितना हम अपने मन के वश में होते हैं हमारी आत्म-शक्ति छीन सी होती है और जितना हमारा मन हमारे नियंत्रण में होता है हमारी आत्म शक्ति उतना जाग्रत रहती है


अतः हमे सबसे पहले ये जानना और मानना आवश्यक है की भगवान् की अनुभूति के लिए हमारे सांसारिक और आध्यात्मिक सिद्धांत एक होने चाहिए और उसके लिए सबसे ज्यादा ज़रूरी मैं समझता हूँ जो है वो है संसार में हमारी आसक्ति का कम होना अथार्त हमे संसार का ज्ञान होना
दूसरा ज्ञान का महत्व 
तीसरा हमारे अन्दर श्रद्धा होनी चाहिए
और चौथी और महत्त्वपूर्ण बात की व्यक्ति का मन उसके नियंत्रण में होना चाहिए न की व्यक्ति अपने मन के और उसमे उत्पन्न होने वाली विभिन्न प्रकार की इच्छाओं के बस में हो

हम स्वयं परमात्मा परमेश्वर के शब्दों को भी देखें तो भगवद्गीता में उन्होंने विभिन्न स्थानों पर यही कहा है :



१. संसार में हमारी आसक्ति का कम होना अथार्त हमे संसार का ज्ञान होना


ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ 
भावार्थ :  जो ये इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं, यद्यपि विषयी पुरुषों को सुखरूप भासते हैं, तो भी दुःख के ही हेतु हैं और आदि-अन्तवाले अर्थात अनित्य हैं। इसलिए हे अर्जुन! बुद्धिमान विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता ॥ ५/२२ ॥ 
२.  ज्ञान का महत्व 
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥
भावार्थ :  क्योंकि हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर देता है, वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देता है॥ ४/३७ ॥ 
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥
भावार्थ :  इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मा में पा लेता है॥ ४/३८ ॥ 
३. श्रद्धा
  

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्धवा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥ 
भावार्थ :  जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के- तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है॥४/३९ ॥
अज्ञश्चश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥ 
भावार्थ :  विवेकहीन और श्रद्धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है॥४/४० ॥ 
४. मन पर नियंत्रण  


कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌ ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥
भावार्थ :  जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है॥३/६ ॥ 

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌ ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ 
भावार्थ :  श्री भगवान बोले- हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। परन्तु हे कुंतीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है॥६/३५॥



अथ चित्तं समाधातुं न शक्रोषि मयि स्थिरम्‌ ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥
भावार्थ :  यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापन करने के लिए समर्थ नहीं है, तो हे अर्जुन! अभ्यासरूप (भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन, मनन तथा श्वास द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविषयक शास्त्रों का पठन-पाठन इत्यादि चेष्टाएँ भगवत्प्राप्ति के लिए बारंबार करने का नाम 'अभ्यास' है) योग द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए इच्छा कर॥१२/९ ॥
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ 
भावार्थ :  यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के ही परायण (स्वार्थ को त्यागकर तथा परमेश्वर को ही परम आश्रय और परम गति समझकर, निष्काम प्रेमभाव से सती-शिरोमणि, पतिव्रता स्त्री की भाँति मन, वाणी और शरीर द्वारा परमेश्वर के ही लिए यज्ञ, दान और तपादि सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों के करने का नाम 'भगवदर्थ कर्म करने के परायण होना' है) हो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा॥१२/१०॥
 अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्‌ ॥
भावार्थ :  यदि मेरी प्राप्ति रूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है, तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग (गीता अध्याय 9 श्लोक 27 में विस्तार देखना चाहिए) कर॥१२/११ ॥
 

1 comment:

  1. ज्ञान का दीप जलाने वाली पोस्ट हम पूरी जिंदगी ही मोह माया में बिता देते हैं पूर्णतः अधात्मिक भावो से सजी पोस्ट बहुत अच्छी लगी

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