Wednesday 2 May 2012

ध्यानयोग


ध्यान सही मायने में किसे कहते हैं ध्यान क्या है इसे समझना अत्यंत आवश्यक है
हम खासकर जिन्होंने ध्यान का आनंद नहीं लिए ये नहीं जानते की जीवन तब तक अधूरा है या ये कहें की निरर्थक है जब तक हम ध्यान में नहीं डूबते

आज के समय में जब आदमी मशीन सा हो गया है,जब व्यक्ति की प्राथमिकता सिर्फ उत्पत्ति -विनाशशील वस्तुओं की उपलब्धि ही है
आदमी के पास व्यस्तता के इलावा समय नहीं है
आदमी की स्थिति ऐसी है जैसे कोई बस में या ट्रेन में चढ़ा हो और उसे बैठने के लिए कहा जाए और वो ये कहे की नहीं बहुत जल्दी में हूँ बैठ नहीं सकता

कहने का तात्पर्य ये है की व्यक्ति को जितना अपने प्रति अपने समय के प्रति अपने समय के सदुपयोग के प्रति सजग होना चाहिए उतना ही वो असजग है बल्कि ये कह सकते हैं की उसे ये बातें निराधार लगती हैं या फ़िज़ूल लगती हैं

इसके इलावा एक ऐसा भी वर्ग है जो ध्यान को अहमियत तो देता है लेकिन उसे किताबी ढंग से समझने का प्रयत्न करता है या आधे अधूरे ज्ञान से ही काम चला लेता है यानी उसने ध्यान मात्र नाम के लिए किया है
।ऐसा कई कारणों से हो सकता है जैसे अधैर्य,सही मार्गदर्शन न मिलना, ध्यान कोई बहुत बड़ा काम लगने लगना,ध्यान में मन न लगना,पूर्ण समय न देना आदि
ऐसे कई लोग हैं जो ध्यान की अहमियत को जानते हैं वो जानते हैं की ध्यान एक धैर्य पूर्वक की जाने वाली विधि है

ऐसे लोग प्रायः ध्यान का आनंद अथार्त आत्मिक आनंद उठाने में सफल होते हैं और वो हमेशा चाहेंगे की और लोग भी जाने की ईश्वर ने उन्हें कितनी शक्ति दी हुई है

ध्यान क्या है ?
ध्यान कैसे किया जाए ?
मन,बुद्धि को नियंत्रित कैसे किया जाए ?
ध्यान के क्या फायदे हैं ?
ध्यान क्यूँ किया जाए ?


इन सबका उत्तर यही है की मन,बुद्धि से अतीत होना ही ध्यान है,अपनी सहजावस्था को प्राप्त करना ध्यान है

जीवन में ध्यान से बढ़कर कुछ नहीं है क्यूंकि इसी से हमारे अंतकरण के विकार दूर होते हैं 
शरीर में ज़रा सी भी गन्दगी लगती है तो हम तुरंत नहाते हैं क्यूँ ? क्यूंकि हम जानते हैं की गन्दगी लगी है । लेकिन यदि हमे मालूम हो की गन्दगी लगी है फिर भी हम उसे साफ़ न करे तो ?
शरीर की गन्दगी से ज्यादा नुकसान अंतःकरण की गन्दगी पहुंचाती है, हमारे मन की गन्दगी पहुचाती है
यदि हम अपने अंतःकरण के विकारों को देख लें तो घबरा जायेंगे की हम में कितनी गन्दगी है और हम फिर भी हटाने के बजाय बढाए जा रहे हैं

ध्यान के द्वारा हम अपने को अन्दर से शुद्ध करते हैं,मानसिक रूप से शुद्ध करते हैं बिना सही ध्यान के व्यक्ति का जीवन एक माचिस की डिब्बी के समान निकल जाता है जिसमे तीलियाँ थी अथार्त शक्ति थी लेकिन वो कभी जलायीं नहीं गयीं यानी शक्ति का उपयोग ही नहीं किया गया या किया जा सका
ध्यान के द्वारा हम समाधि तक पहुँचते हैं जो हमारी आत्म स्थिति है, जिसके बाद हम असंभव से बस में दिखने वाले अपने मन,बुद्धि इन्द्रियों को न सिर्फ संयमित कर लेते हैं  बल्कि पूर्णतया नियंत्रित भी कर सकते हैं


ध्यान पर बहुत से महापुरुषों ने बहुत कुछ बोला है उन्हें पढने की,मनन करने की परम आवशयकता है

प्रायः सबने एक जैसी ही बात बोली है
श्रीमद भगवतगीता में बहुत अच्छे से ध्यानयोग पर लिखा है
संत कबीर दास जी ने भी ध्यान पर बोला है

संत विनोबा जी ने,संत ओशो जी ने भी ध्यान पर बहुत बोला है
। जगतगुरु कृपालु जी ने भी ध्यान को सरलता से समझाया है

साधक संजीवनी में परम श्रध्येय स्वामी रामसुख दास जी ने भी बहुत अच्छे से समझाया है
इन सभी ने और भी बहुत से परम आदरणीय लोगों ने लोगों के आत्म-सुख हितार्थ ध्यान पर बोला है,ध्यान के रहस्यों को खोला है ।व्यक्ति को आत्म साक्षात्कार के सम्मुख किया है

मेरा मानना है यहाँ पर एक ब्रेक लिया जाया यानी हम ध्यान को थोड़े देर के लिए छोड़ दें और उसके भी पहले के चरण पर चलें,इससे परिणाम और चमत्कारिक होंगे

यानी हम अपने आप को थोडा जाने खासकर ये की हमारे अन्दर की ऊर्जा जो अक्सर इन्द्रिय और उनके विषयों में अथार्त भोग विलास में लगती है वो अधोगमन को प्राप्त होती है या ऊर्ध्वगमन को
यहाँ मैं ओशो जी द्वारा कही कुछ बातें उद्धत करना चाहूँगा
जिससे व्यक्ति आसानी से अपने अन्दर की ऊर्जा को सही दिशा दे सकता है उसका सदुपयोग कर सकता है-मूलबंध ब्रह्मचर्य उपलब्धि की सरलतम विधि 

मूलबंध ब्रह्मचर्य उपलब्धि की सरलतम विधि

जीवन ऊर्जा है शक्ति है लेकिन साधारणतया तुम्हारी जीवन ऊर्जा नीचे की ओर प्रवाहित हो रही है इसलिए तुम्हारी जीवन ऊर्जा अंततः काम,क्रोध अथवा लोभ से सनी वासना बन जाती है

कामवासना अथवा भोग-विलास में खींचे रहना निम्तम चक्र है
तुम्हारी ऊर्जा नीचे गिर रही है और सारी ऊर्जा धीरे धीरे केंद्र पर इकट्ठी हो जाती है । इसलिए तुम्हारी सारी शक्ति कामवासना बन जाती है अंततः व्यर्थ हो जाती है ।
वह जो मूलाधारचक्र है - जहाँ से काम-ऊर्जा बनती है उसे बाँध लेना है उसे सिकोड़ लेना है
।इसलिए पतंजलि जी ने हठयोग में बहुत सी प्रक्रियाएं खोजी हैं 'मूल' को बाँधने की । मूल अगर बांध जाए तो ऊर्जा अपने आप ऊपर उठने लगती है क्यूंकि नीचे के द्वार बंद हो जाता है अवरुद्ध हो जाता है
जब भी तुम्हारे मन में कामवासना(काम,क्रोध,लोभ) उठे तो शांत होकर बैठ जाओ और जोर से श्वास को बाहर फेंको - उच्श्वास  । भीतर मत लो श्वास को क्यूंकि जैसे ही तुम भीतर गहरी श्वास लेते हो,श्वास काम ऊर्जा को नीचे की तरफ धकाती है । तो जब तुम्हे कामवासना पकडे,तब एक्झेल करो बाहर फेंको श्वास को । नाभि को भीतर खींचो,पेट को अन्दर लो और श्वास को बाहर फेंको,जितना फ़ेंक सको
जब सारी श्वास बाहर फिंक जाती है तो तुम्हार पेट और नाभि वैक्यूम हो जाता है,शुन्य हो जाता है
। ध्यान दो की जहाँ कहीं भी शुन्यता हो जाती है वहीँ आस-पास की ऊर्जा शून्य की तरफ प्रवाहित होने लगती है  । शून्य खींचता है, क्यूंकि प्रकृति शून्य को बर्दाश्त नहीं करती शून्य को भरती है । तुम्हारी नाभि के पास शून्य हो जाए, तो मूलाधार से ऊर्जा तत्क्षण नाभि की तरफ उठ जाती है
और तुम्हे बड़ा रस मिलेगा जब पहली बार अनुभव करोगे
 तुम पाओगे तुम्हारा सारा तन-मन गहन स्वास्थ्य से भर गया । उर्जा का रूपांतरण शुरू हुआ । तुम ज्यादा शक्तिशाली,सौमनस्यपूर्ण,उत्फुल्ल,सक्रिय और विश्रामपूर्ण मालूम पड़ोगे
इसलिए जो लोग मूलाधार से शक्ति को सक्रिय कर लेते हैं उनकी नींद कम हो जाती है ज़रूरत ही नहीं रह जाती है वे थोड़े घंटे सोकर उतने ही ताज़ा हो जाते हैं

उर्जा का ऊर्ध्वगमन बड़ा अनूठा अनुभव है और पहला अनुभव होता है मूलाधार से जब उर्जा का नाभि की तरफ संक्रमण होता है

यह मूलबंध की सहजतम प्रक्रिया है की तुम श्वास को बाहर फ़ेंक दो नाभि शून्य हो जायेगी उर्जा उठेगी नाभि की तरफ - मूलाधार का द्वार अपने आप बंद हो जायेगा
। वह द्वार खुलता है उर्जा के धक्के से । जब उर्जा मूलाधार में नहीं रह जाती,वह धक्का नहीं पड़ता,द्वार बंद हो जाता है ।इसे कभी भी कहीं भी कर सकते हो । रोजाना दस-पंद्रह मिनट करने पर ही कुछ ही दिनों में परिणाम दिखने लगेगा और कुछ ही महीनो में पाओगे कामवासना तिरोहित हो गयी ; काम उर्जा रह गयी,वासना तिरोहित हो गयी


पुनः ध्यान पर आते हैं ओशो बताते हैं की ध्यान क्या है

निर्विचार चेतना है ध्यान । और निरविचारणा के लिए विचारों के प्रति जागना ही विधि है
विचारों का सतत प्रवाह है मन,साधारणतया इसी प्रवाह के प्रति मूर्छित होना अजाग्रत होना हमारी स्थिति है
। इस मूर्छा से पैदा होता है तादात्म्य । मैं मन ही मालूम होने लगता हूँ । जागें और विचारों को देखें । विचारों से स्वयं का तादात्म्य टूटना ही ध्यान है क्यूंकि इसी से निर्विचार चेतना का जन्म होता है । ऐसे ही जैसे आसमान से बदल हट जाएँ तो आसमान दिखाई पड़ता है । विचारों में रिक्त चित्ताकाश ही स्वयं की मौलिक स्थिति है वही  समाधि है
ध्यान है विधि
। समाधि है उपलब्धि
लेकिन ध्यान के सम्बन्ध में सोचें मत
। ध्यान के सम्बन्ध में विचारना भी विचार ही है । इसलिए ध्यान करते समय ध्यान को करें अथार्त निर्विचार हो जाएँ उसे सोचे मत
मन का काम है सोना और सोचना
। जागने में उसकी मृत्यु है और ध्यान है जागना । इसलिए मन कहता है - चलो,ध्यान के सम्बन्ध में ही सोचें । यह उसकी आत्मरक्षा का अंतिम उपाय है
इससे सावधान रहना है
। सोचने की जगह देखने पर बल देना है,साक्षी रहना है  । विचार नहीं दर्शन - बस यही मूलभूत सूत्र है । दर्शन बढ़ता है तो विचार छीण होते हैं
साक्षी जागता है, तो स्वप्न विलीन होता है

ध्यान आता है तो मन जाता है,मन है द्वार संसार का
। ध्यान है द्वार आत्म साक्षात्कार का,मोक्ष का,स्वस्वरूप का

यहाँ मैं एक बात पर जोर देना चाहूँगा और वो है मन,बुद्धि का हमारे नियंत्रण में होना


बहुधा ध्यान के समय यही दिक्कत सभी को आती है की ध्यान कैसे करें,विचारशून्य कैसे हों जब हमारा मन ही शांत नहीं हो पा रहा अथार्त हमारा मन हमे तटस्थ नहीं होने दे रहा
। ऐसी स्थिति में ये जान लें जैसे की पिछली पोस्ट में भी उल्लेख है की हमारा स्वरुप मन,बुद्धि नहीं आत्मा है और आत्मा ही प्रकाशक है मन,बुद्धि,इन्द्रियाँ आदि प्रकाश्य हैं । आत्मा की सत्ता से ही मन,बुद्धि काम करते हैं इसलिए अपने स्वरुप को अथार्त आत्मा को हमे इनसे ऊपर इनसे शक्तिशाली समझना चाहिए क्यूंकि वास्तविकता भी यही है ।आत्मा चेतन है मन,बुद्धि इन्द्रियां शरीर जड़ है ये सिर्फ आत्मा के कारण ही चेतनामय लगता है

श्रीमद भगवद्गीता में भगवान् ने बताया है की मन को नियंत्रित करके मन की इच्छाओं को भी नियंत्रित किया जा सकता है :

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥

भावार्थ :  इन्द्रियों को स्थूल शरीर से पर यानी श्रेष्ठ, बलवान और सूक्ष्म कहते हैं। इन इन्द्रियों से पर मन है, मन से भी पर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है॥३/४२॥
एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्‌ ॥

भावार्थ :  इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म, बलवान और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल अथार्त वश में कर ॥३/४३॥


व्यक्ति  जब अपने स्वरुप(आत्मा) में स्थित हो जाता है वही ध्यान है