Monday 4 June 2012

ध्यानयोग 5

ध्यान को करते समय व्यक्ति को चाहिए की अपनी रीढ़ की हड्डी,गर्दन और सर सीधा रखे अथार्त एक ही सीध में रखे ।
ध्यान के लिए बैठते समय सीधे ज़मीन पर न बैठे बल्कि लकड़ी या कम्बल या ऐसा कोई कपडा आदि ले जिससे शरीर की ऊर्जा शरीर में ही रहे । ये जो भी हम बैठने के लिए इस्तेमाल करते हैं ये एक प्रतिरोधात्मक उपकरण हैं ऊर्जा के स्खलित न होने देने के ।
इसके बाद नासिका के अग्रभाग पर द्रष्टि जमाके ध्यान करना चाहिए । नासिका के अग्रभाग पर
द्रष्टि जमाके अथार्त अधखुली आखों से इसलिए कहा गया क्यूंकि इससे साधक निद्रावश न हो अथवा उसका मन इधर उधर न विचरे ।

छठे अध्याय में भगवान् ध्यान के लिए ये ही निर्देश दे रहे हैं ।
  


शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके॥11॥


उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे॥12॥


काया, सिर और गले को समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओं को न देखता हुआ॥13॥
 

ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित, भयरहित तथा भलीभाँति शांत अन्तःकरण वाला सावधान योगी मन को रोककर मुझमें चित्तवाला और मेरे परायण होकर स्थित होए॥14॥


हम ध्यान के वक़्त कुछ भी ध्यान करे अथार्त स्वयं का स्वरुप,भगवान् का चित्र या विग्रह या मात्र निर्विचार चेतना यानी विचारशून्यता में चलें जाए हम भगवान् का ही ध्यान करते हैं ।
 
इसीलिए भगवान् ने कहा है की योगी अपने चित्त को मुझमे लगाये ।

इसके साथ ही भगवान् ने आदर्श ध्यान हेतु पांच बातें और कही हैं
:

१. ब्रह्मचर्य का पालन करना

२. भयरहित होना
३.अंतःकरण का शांत होना
४.मन का स्थिर होना

५.भगवान् के परायण होना

यहाँ मेरा मानना है सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है की हमारा मन शांत हो,स्थिर हो  ।

क्यूंकि मन के स्थिर होने पर अंतःकरण भी शांत रहता है,भय भी नहीं उत्पन्न होता ।
वैराग्य के इलावा मन के स्थिर होने पर ही सही अर्थों में व्यक्ति की ब्रह्मचर्य में स्वाभाविक स्थिति होती है । शांत व स्थिर मन में श्रद्धा अपने आप बढ़ने लगती है जिससे व्यक्ति ईश्वर के परायण हो जाता है ।

परन्तु प्रश्न यही आ जाता है की साधक अपने मन को स्थिर कैसे करे,शांत कैसे करे ।


मन को स्वाभाविक रूप से शांत करने की,स्थिर करने की कई विधियां अब तक बताई गयी हैं ।


जिसमे मुख्य हैं :


१. वैराग्य भाव के जाग्रत रहने से ।


२. चित्त के निरुद्ध हो जाने से ।


३. स्वरुप को मन,बुद्धि का प्रकाशक जानने से ।


४. स्वयं के स्वरुप में स्थित हो जाने से ।

५.स्वयं को मन के पार ले जाने से अथार्त निर्विचार चेतना में पहुचने से ।

परन्तु फिर भी कई बार व्यक्क्ति का मन शांत नहीं हो पाता । इसके पीछे भी बहुत से कारण होते हैं जैसे साधक का संसार से राग न मिटना या साधक की अन्य साधकों की अपेक्षा साधना(ध्यान) में दृढ़ स्थिति न हो पाना यहाँ तक की ईश्वर है इसपर भी मन मस्तिष्क में संशय अत्यधिक रहना ।


इसी बात को महात्मा अर्जुन ने भगवान् से पूछा था जिसका मैंने पिछली पोस्ट में उल्लेख किया था ।



अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥
भावार्थ :  अर्जुन बोले- हे कृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात्‌ लगाए हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है॥३६ 
श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्‌ ॥
भावार्थ :  श्री भगवान बोले- रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है। इसको ही तू इस विषय में वैरी जान॥३७

अर्जुन का ये प्रश्न अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्यूंकि हम स्वयं इस पर सोचे की वाकई में व्यक्ति पर अच्छाई से ज्यादा बुराई का रंग आसानी से चढ़ता है ।
हम जीवन में आसुरी गुणों(काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद,अहंकार,ईर्ष्या,दंभ,हिंसा,अशांति आदि ) में बहुत जल्दी लिप्त हो जाते हैं दैवीय गुणों (सहिष्णुता,शान्ति,अहिंसा,करुणा,दया,प्रेम,शम,दम,नियम आदि ) की अपेक्षा ।
व्यक्ति संसार को भी सम देखने के बजाय गुण दोषमय ही देखता है और फिर इसी तरह से स्वयं के स्वरुप को भी ।
इस तरह से वो अपने चारो तरफ कहीं राग कहीं द्वेष उत्पन्न कर लेता है क्यूंकि ये राग द्वेष उसे लगता है उसके अंतःकरण में स्वाभाविक रूप से विद्यमान हैं ।
इस तरह से वो राग अथवा द्वेष से प्रेरित होकर ही कोई काम करता है । उसके मन में स्वाभाविक ही शुद्ध विचार नहीं आ पाते हैं । उसे स्वाभाविक ही अज्ञान अच्छा लगता है ।

इस पर भगवान् का उत्तर तकनीकी द्रष्टि से भी साधक की जिज्ञासा को,उसके अज्ञान को पूर्ण रूप से दूर करता है ।


भगवान् कहते हैं रजोगुण से उत्पन्न होने वाला ये काम ही क्रोध है यह भोगों से कभी नहीं अघाता,हे अर्जुन ! तू इसे ही कारण जान चित्त की चंचलता के पीछे ।

हम जानते हैं की सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण -ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं॥१४/५ ॥

इसमें सत्वगुण निर्मल रूप होने से प्रकाश करने वाला और विकार रहित होने से ज्ञान में लगाता है ,रजोगुण रागरूप होने से कामना और आसक्ति में  लगाता है तथा तमोगुण अज्ञानरूप होने से अज्ञान और प्रमाद में ही लगाता है ।


यहाँ भगवान् ने रजोगुण को कारण बताया है काम (इच्छा) की उत्पत्ति का ।

और इसे ही यदि व्यक्ति नियंत्रण में कर ले तो आसानी से उसका मन शांत हो सकता है ।

इसका उपाय भी भगवान् चौदहवें अध्याय में बताते हैं :


हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण होता है अर्थात बढ़ता है॥10॥


अथार्त यदि व्यक्ति अपने सत्वगुण को बढाए जो की रजोगुण और तमोगुण को दबाकर(नियंत्रित करने से ) होता है तो व्यक्ति में सदैव ज्ञान की प्रधानता रहेगी और वो इस तत्त्व को कभी नहीं भूलेगा की उसका स्वरुप सम है,अविकारी(विकार रहित) है ,ये सृष्टि गुण-दोषमय होने के बावजूद भी सम ही है,सबकुछ सम है और कहीं भी कुछ भी विकार युक्त नहीं है ।


इसी बात को भगवान् ने तीसरे अध्याय में भी अलग तरह से बताया है ऐसे भी समझा जा सकता है की

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥

भावार्थ :  वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है॥27॥
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥
भावार्थ :  परन्तु हे महाबाहो! गुण विभाग और कर्म विभाग (त्रिगुणात्मक माया के कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय- इन सबके समुदाय का नाम 'गुण विभाग' है और इनकी परस्पर की चेष्टाओं का नाम 'कर्म विभाग' है।) के तत्व (उपर्युक्त 'गुण विभाग' और 'कर्म विभाग' से आत्मा को पृथक अर्थात्‌ निर्लेप जानना ही इनका तत्व जानना है।) को जानने वाला ज्ञान योगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता। ॥28॥
अथार्त प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः (सभी कार्य प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते है ) और गुणा गुणेषु वर्तन्त (गुण ही गुणों में बरत रहे हैं ) ।
यहाँ त्रिगुणात्मक माया से तात्पर्य सत्व,रज और तम गुणमयी माया से ही है अथार्त इन गुणों से ही है ।

यानी व्यक्ति का स्वरुप सत्व,
रज और तम इन तीनो से परे है अलग है वो मायातीत है इसलिए ज्ञानी सत्वगुण को भी स्वयं का गुण नहीं मानता क्यूंकि स्वयं अथार्त स्वरुप तो गुनातीत है । स्वरुप अथार्त आत्मा का वास्तविक तत्त्व तो तुरीयातीत रहना है,ब्रह्ममय रहना है क्यूंकि स्वरुप ब्रह्म ही है ।

इस बात को तत्त्व से जानते ही साधक का मन इन गुणों में नहीं आता ।उसमे भी वो रजोगुण में कभी लिप्त नहीं होता क्यूंकि वो जानता है की रजोगुण उसे कामनाओं में लगाएगा और कामनाओं का कोई अंत नहीं । साधक निश्चित रूप से अधिकाधिक स्वयं को सत्वगुण में रमायेगा क्यूंकि सत्वगुण पर्याप्त ज्ञान प्रदान करता है जिससे व्यक्ति को ध्यान में आसानी से जा सकता है और वहां समाधि में स्थित होने पर वो सत्वगुण से भी अलग होप जाता है गुनातीत हो जाता है ।

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥


सर्वव्यापी अनंत चेतन में एकीभाव से स्थिति रूप योग से युक्त आत्मा वाला तथा सब में समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में कल्पित देखता है॥29॥

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
  जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्मरूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अन्तर्गत देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता॥30॥

छठे अध्याय में परमात्मा,परमेश्वर द्वारा कहे ये श्लोक ध्यान की उपलब्धि समाधि के लिए सार तत्व 
हैं ।  कैसे ?
इस पर आगे लिखा जाएगा ।