Monday 11 June 2012

ध्यानयोग 6

अधिकांशतः व्यक्ति ज्ञान के अभाव में अपना जीवन गुज़ार देता है
जीवन में हर तरह का अभाव मिटाया जा सकता है और हर तरह का अभाव(
सिवाय आध्यात्मिक ज्ञान के) निष्प्रभावी होता है अथार्त उसका व्यक्ति के स्वरुप आत्मा से कोई लेना देना नहीं होता 
आध्यात्मिक ज्ञान का अभाव ही असली अभाव होता है और
आध्यात्मिक ज्ञान हासिल करना ही प्रत्येक व्यक्ति का एकमात्र कर्त्तव्य है। यदि ये कहा जाए की व्यक्ति का मात्र एक ही असली कार्य  होता है,जीवन का उद्देश्य होता है और वो है आत्म-ज्ञान,परमात्म ज्ञान तो बिलकुल सही होगा 
साधारणतया व्यक्ति अपने चौबीस घंटों में शायद ही 5-10% समय निकाल पाता हो जीवन में कुछ नया जानने के लिए,उसमे भी
और भी कम प्रतिशत होता है विवेक ज्ञान को,आत्म-ज्ञान को जानने वालों का । यानी हम चौबीस घंटों में विवेक को शायद 10 % ही महत्व दे पाते हैं और फिर समय का चक्र घूमता है तो हम देखते हैं की बुढापे तक जब हमारा अधिकाँश समय निकल जाता है तो भी हम वोही रूटीन दोहरा रहे होते हैं
यानी की अधिकांशतः लोग अपने जीवन का 10 % 
ही विवेक ज्ञान में,उसके महत्व जानने में  निकाल पाते हैं
यहाँ एक प्रश्न ये उठता है की क्या ये 10 % ज्ञान भी जो हमने हासिल किया वो हमारे कुछ काम आया,क्या हमने उसका अनुसरण किया क्यूंकि यदि सही मायनों में किया होता तो क्या जीवन के उत्तरार्ध तक हम अपने जीवन का 10% ही समय विवेक ज्ञान को,आत्म-ज्ञान को देते रहते
। निश्चित ही नहीं क्यूंकि जैसे ही हम अनुसरण आरम्भ करते हम 90% समय विवेक ज्ञान को 10 प्रतिशत व्यावहारिक जगत को देने लगते हैं 
अथार्त 90% हम आत्मा को,परमात्मा को और 10% संसार को अथवा शरीर को महत्व देते
 
सच्चाई तो यही है की हमे 100 % आत्मा को और परमात्मा को ही महत्व देना चाहिए क्यूंकि उसके अतिरिक्त जो भी हमे दिख रहा है ये नश्वर जगत सब मिथ्या है

ये साधन मिले हुए हैं हमे साधना के लिए लेकिन हमने इनसे तादात्म्य स्थापित करके,इन्हें विषय सुख,और भोग विलास का हेतु मान लिया
इसीलिए हम जाने अनजाने अविवेक को महत्त्व देने लगते हैं और विवेक की बात हम मानने के बाद भी मान नहीं पाते,अनुसरण नहीं कर पाते
क्या इस तरह से जीवन जीने को हम सही मान सकते हैं ?
यानी अधिकांशतः लोगों का जीवन इस तरह होता है जैसे कोई बर्फ का टुकड़ा पाने के ऊपर हो
। हम अविवेक को मानकर ऐसा ही जीवन जीते हैं क्यूंकि बर्फ के टुकड़े का मात्र 10 % भाग ही पानी के ऊपर होता है और बाकी 90 % भाग पानी के भीतर
मतलब हम आम जीवन में 10 प्रतिशत ही विवेक से भरे होते हैं,हमारे अन्दर विवेक ज्ञान होता है और बाकी 90 % हम अविवेक को,आसक्ति को दिए रहते हैं


धन,मान,लोभ,लालच,क्रोध,काम,दंभ के गुलाम बने हुए हम असल में एक भिखारी की ज़िन्दगी जीते हैं क्यूंकि सारी ज़िन्दगी हम सिर्फ कामना करते हैं

कुछ पा लिया तो उससे आगे कुछ पाने की कामना और हमे इस कुछ को प्राप्त कराने वाले साधन यही काम,क्रोध,दंभ,छल आदि होते हैं
। अपने आस-पास भिखारियों की भीड़ देखके हम ठिठकते नहीं,विवेक को महत्व नहीं देते बल्कि और लगन से कामना को बढाते हैं और लगन से,जोश से हम भीख मांगते हैं कुछ अच्छा हो जाने पर पद,प्रतिष्ठा धन,मान रुपी भीख मिल जाने पर दूसरों के अनुमोदन पर उत्साह पाकर हम और उत्साहित हो जाते हैं तथा और शक्ति से लगन से और बड़ी भीख मांगने लगते हैं
औरों को समझाना,राह दिखाना तो लगभग असंभव होता है क्यूंकि हमारा मन ये मानता ही नहीं की हम राह से भटके हुए हैं
। हमे लगता ही नहीं की हम कुछ ग़लत कर रहे हैं । 
 ऐसा हम क्यूँ करते हैं उसका उल्लेख पिछली पोस्ट में किया गया है जहाँ हम देखते हैं की मनुष्य के अविवेक प्रधान होने में रज गुण उत्तरदायी होता है
हैरत की बात यही रहती है की व्यक्ति का विवेक इतना भी काम नहीं करता की ये सब कुछ साथ नहीं रहना है इस तथ्य को वो मान नहीं पाता

परिणामतः अपने जीवन में पद,प्रतिष्ठा,रिश्ते-नाते,दोस्त-यार,धन,संपत्ति को ही समझने वाला मनुष्य,इन्ही में सुख मानता हुआ,सुख ढूंढता हुआ अपने जीवन के आखिरी में भी भिखारी ही बना रहता है अथार्त इन्ही में आसक्त रहता है 
। हम इस मांगने से निकल नहीं पाते
यही नहीं फिर मृत्यु के बाद नया जन्म लेने पर भी अज्ञान नहीं हट पाता हम फिर वोही दोहराते हैं,बिना सोचे समझे उसे ही दोहराए चले जाते हैं
। परमात्मा के दिए हुए इस अद्भुत चोले शरीर से हम परमात्मा का ज्ञान तक नहीं कर पाते । हम परमात्मा का ज्ञान कराने वाले सरल ह्रदय लोगों की बातों का अपने जीवन में अनुसरण नहीं कर पाते,कई बार तो विवेकपूर्वक सुन-समझ भी नहीं पाते । बस जीवन को मोह और अज्ञान वश ऐसे पकडे रहते हैं जैसे ये हमारे साथ हमेशा रहना है
बड़े से बड़े सुख से भी अंततः दुःख मिलता है जानकर भी आसक्ति नहीं छोड़ पाते,कामना के दास ही बने रहते हैं

समाधि में जाने के बाद व्यक्ति को पता चलता है की उसकी आसक्ति की, चाहना की,कामना की दौड़ निराधार थी
क्यूंकि उसका अपने स्वरुप से साक्षात्कार हो जाता है जो पूर्ण है,नित्य है,सदैव तृप्त है,सम है,शांत है,निर्विकार है उसका स्वरुप स्वरूपतः ब्रह्म है और अपने आप से अपने आप में ही संतुष्ट है

परमात्मा को दो तरह से ही जाना जा सकता है । एक सांख्य के द्वारा दूसरा योग के द्वारा
योग के बारें में तो इतनी पोस्ट्स से बात चल ही रही है लेकिन सांख्य के बारें में भी लगातार लिखा जा रहा है

अतः ये आवश्यक है की दोनों के अंतर को जान लिया जाए

सांख्य है सिर्फ जानना भर,परमात्मा का तत्व-ज्ञान द्वारा परमात्मा तक पहुंचना

और योग है प्राणों को व्यवस्थित करके एक निश्चित प्रक्रिया द्वारा परमात्मा तक पहुंचना

दोनों के द्वारा व्यक्ति परमेश्वर तक ही पहुँचता है

योग में भी हम आठ चरणों में आठवें चरण समाधि द्वारा उसी परमात्मा को प्राप्त करते हैं

सांख्य द्वारा विवेक से भर जाने से,ज्ञान द्वारा हम उसी परमात्मा तक पहुँचते हैं

संत ओशो जी कहते हैं सांख्य शुद्ध ज्ञान है
। योग साधना है
सांख्य कहता है करना कुछ भी नहीं है,सिर्फ जानना है,योग कहता है-करना बहुत कुछ है और तभी जानना फलित होगा

ये दोनों ही सही हैं
। ये निर्भर करेगा साधक पर । अगर कोई साधक ज्ञान की अग्नि इतनी जलाने में समर्थ हो की उस अग्नि में उसका अहंकार जल जाए,सिर्फ ज्ञान की अग्नि ही रह जाए,ज्ञाता न रहे,भीतर कोई अहंकार का केंद्र न रह जाए,सिर्फ जानना मात्र रह जाए,बोध रह जाए,'अवेयरनेस' रह जाए, तो कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है । जानने की अथार्त ज्ञान की इस अग्नि से ही सब कुछ हो जाएगा । जानने की स्थति को ही
बढ़ा लेना काफी है । जानने में रोज़ रोज़ अग्रसर होते जाना काफी है । होश बढ़ जाए अथार्त जाग्रति आ जाए तो पर्याप्त है

पतंजलि जी ने योग के आठ अंग कहे हैं यम,नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्याहार,ध्यान,धारणा और समाधि
।जिसमे अंतिम तीन अंग  बहुत महत्वपूर्ण हैं और समाधि में जाके जब हम अहंकारशून्य हो जाते हैं हमारा होनापन,मैं-पन नहीं रहता हम परमात्मा को प्राप्त करते हैं । योग प्राण पर ही सारा काम करता है इसलिए योग की मौलिक प्रक्रिया है प्राणायाम

योग और सांख्य को संयुक्त मानकर चलना चाहिए दोनों को जारी रखना चाहिए क्यूंकि इससे गहरे परिणाम होते हैं जल्दी होते हैं और शक्ति भी कम व्यय होती है

अथार्त एक तरफ ध्यान रखना है की जागरण बढ़ता जाए और दूसरी तरफ ध्यान रखना है की ऊर्जा संगृहीत होती चली जाए
। योग का प्रयोग करें और सांख्य का ध्यान रखें

इसलिए शुरू से ही ध्यानयोग की इस श्रंखला में मैंने दोनों को समाहित किया है जिससे और स्वाभाविक रूप से हम ध्यानयोग को समझ सकें उसका आनंद ले सकें
।परन्तु व्यक्ति अपने अनुसार केवल सांख्य अथवा केवल योग द्वारा भी अपनी साधना को कर सकता है,ध्यानयोग में आगे बढ़ सकता है

संत ओशो बताते हैं की मन को हम इसलिए जोर से पकडे हैं क्यूंकि हमे डर है की अगर मन नहीं रहा तो हम नहीं रहेंगे । असल में हमने जाने-अनजाने मन को अपना होना समझ रखा है । उससे तादात्म्य कर लिया है । समझ लिया है की मैं मन हूँ । जब तक हम स्वयं को मन समझेंगे हम समस्त बीमारियों को पकड़े रहेंगे । जहाँ मन है वहां समस्याएं ही समस्याएं हैं,जैसे पेड़ों पर पत्ते लगते हैं वैसे ही मन में समस्याएं लगती हैं । समाधान मन में कभी उत्पन्न नहीं हो सकता क्यूंकि मन के तल पर समाधान कभी भी नहीं है,समाधान तो वहां है जहाँ मन खो जाता है
अतः एक तो ये समझना है दृढ रूप से की स्वरुप मन नहीं है बल्कि मन को जानने वाला है

और दूसरी बात ये की ध्यान है मन के पार जाना अथवा मन का शून्य हो जाना

सांस को व्यवस्थित पूरक (लेने में),कुम्भक(रोकने में ) रेचक (छोड़ने में ) द्वारा भी किया जा सकता है

जिसका अनुपात 1:4:2 होता है  


यानी सांस को यदि हम पांच सेकण्ड लें तो बीस सेकण्ड रोकें  और दस सेकण्ड में छोड़ें यानी 1:4:2 के हिसाब से 5:20:10



उसी तरह से यदि हम सांस को मात्र देख रहें हैं तो भी ध्यान को प्राप्त हो सकते हैं क्यूंकि इससे भी हमारा चित्त निरुद्ध होता है