Wednesday 5 October 2011

Satsang vaani 9

प्रारब्ध 

प्रारब्ध चिंता मिटाने के लिये है, निकम्मा बनाने के लिये नहीं 

मनुष्य प्रारब्ध के अनुसार पाप-पुण्य नहीं करता क्योंकि कर्म का फल कर्म नहीं होता, प्रत्युत भोग होता है 

प्रारब्ध क काम तो केवल सुखदायी -दुखदायी परिस्थति को उत्पन्न कर देना है, पर उसमे सुखी दुखी होने अथवा न होने में मनुष्य स्वतंत्र है 

जो होता है वह ठीक ही होता है बेठीक होता ही नहीं  इसलिए करने में सावधान और होने में प्रसन्न रहना चाहिए 

एक करना होता है और एक होना होता है करना पुरुषार्थ के अधीन है और होना प्रारब्ध के अधीन है इसलिए मनुष्य करने (कर्त्तव्य) में स्वाधीन है और होने फलप्राप्ति में पराधीन है 


भगवत्प्रेम 

जब तक संसार में आसक्ति है तब तक भगवान् में असली प्रेम नहीं है 


कितने आश्चर्य की बात है की जो नित्य निरंतर विद्यमान रहता है वो (परमात्मा ) तो प्रिय नहीं लगता, पर जो नित्य निरंतर बदल रहा है वो (संसार) प्रिय लगता है 

संसार की सुखास्क्ति ही भगवत्प्रेम में ख़ास बाधक है अगर सुखासक्ति का त्याग कर दिया जाए तो भगवान् में प्रेम स्वतः जाग्रत हो जायेगा 

भगवान् में प्रेम होने के सामान कोई भजन नहीं है 

संसार से सर्वथा राग(आसक्ति) हटते ही भगवान् में अनुराग हो जाता है 


Destiny (Prarabdha)

Destiny is for removing anxiety, but is not for making a person an idler.

Man does not commit sin or virtue by destiny, as the fruit of action is not action, but its enjoyment.

Destiny creates favourable or unfavourable conditions for pleasure or pain, but man is free to be happy or unhappy.

whatever happens, happens rightly and never wrongly. So be cautious in what you do, and be happy with what happens.


One thing is to do and some other that happens, but both these are separate matters.To do is subject to effort and what happens is controlled by destiny. Therefore, man is free to act in the discharge of his duties, but in securing the fruit. he is dependent on others.


Divine love


So long as there is attachment to the world, there is no real love for God.

How surprising that the ever lasting changeless entity (God)  is not loved, but the ever changing world appears so dear.

The world's pleasure - giving propensity, is a special obstacle to God's love.If one renounces this propensity, then love love for God would automatically arise.

Love for God develops in a man, as soon as his attraction for the world is completely gone.

2 comments:

  1. Thanks Monika ji,aapne Gitapress se lie gaye sankalan ko padha,bahut abhaar,thank you.

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